अगले प्रधानमंत्री के लिये देश को बहुत बदतर हाल में छोड़कर जाएंगे मोदी

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कमल मोरारका
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इस देश में 19 महीने तक आपातकाल रहा. इंदिरा गांधी पर आपातकाल हटाने का कोई दबाव भी नहीं था. हां, मीडिया पर सेंशरशिप था. संजय गांधी उनके पुत्र थे. उनके पास कोई आधिकारिक पद नहीं था. चर्चा थी कि सब जगह संजय गांधी की चलती है. वे जो बोल देते हैं, वही अंतिम होता है. आज संजय गांधी से दस गुना अधिक पावर का इस्तेमाल अमित शाह कर रहे हैं. अमित शाह एक्स्ट्रा कंस्टीट्‌यूशनल अथॉरिटी बन गए हैं. हर अफसर से सीधे बात करते हैं. आज तो आपातकाल नहीं है, सेंशरशिप भी नहीं है. फिर भी अखबार सरकार के खिलाफ नहीं लिख पाते. सब का मुंह पैसे से बंद है.

सीबीआई के रूप में सरकार के पास एक सबसे शक्तिशाली यंत्र है. सीबीआई सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट करती है. यह एक ऐसा हथियार है, जिसका उपयोग, दुरुपयोग केंद्र में जिसकी भी सरकार होती है, वो अपने विरोधी के लिए करते हैं. जाहिर है, हर आदमी कभी न कभी सत्ता में रहा है, तो आप उसे डराने के लिए कभी भी कोई जांच शुरू करवा सकते हैं. ऐसा पहले भी हुआ है. एचडी देवेगौड़ा के जमाने में लालू यादव के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए रविवार के दिन तत्कालीन सीबीआई डायरेक्टर जोगिंदर सिंह ने कार्यालय खुलवाया था. सीबीआई का दुरुपयोग ज्यादा हुआ है. मतलब दुरुपयोग की चर्चा ज्यादा हुई है. सीबीआई 365 दिन काम करती है. आज जो हो रहा है वो अप्रत्याशित है.

यह न कभी हुआ था, न कोई सोच सकता है कि ऐसा हो भी सकता है. सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा बहुत अच्छे पुलिस ऑफिसर हैं. गुजरात कैडर के जिस राकेश अस्थाना को मोदी जी ने नंबर दो बनाया, वो उस पोस्ट के लायक नहीं हैं. उनके खिलाफ आरोप भी लगे थे, एफआईआर भी दर्ज हो रही थी, लेकिन वे इसलिए नंबर दो बना दिए गए, क्योंकि मोदी जी के नजदीकी थे. नंबर वन और नंबर टू के बीच में जो समन्वय होना चाहिए, वो पहले दिन से नहीं था. अगर सबसे मजबूत इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी की खुद की हालत इतनी खराब है, तो देश क्या करेगा. हमलोग तमाशबीन बन गए हैं.

अंदरखाने की जो चर्चा है, मैं उस पर बोलना भी नहीं चाहता, क्योंकि वह और खतरनाक है. अब मोदी जी के फिर से पीएम बनने के अवसर कमजोर होते जा रहे हैं. जो नया प्रधानमंत्री बनेगा चुनाव के बाद, उसे काफी मेहनत करनी पड़ेगी, चाहे वो नया पीएम कांग्रेस से हो या भाजपा से या किसी और दल से. हां, मोदी जी फिर से पीएम बनें, तो वे इसे ऐसे ही चलाएंगे.

2014 में देश की जो हालत यूपीए छोड़कर गई थी, उससे कहीं बदतर हाल में मोदी छोड़कर जाएंगे देश को. यह एक बात है कि अर्थव्यवस्था गड़बड़ हो गई, इसके कई कारण है, जिन पर आपका वश नहीं है. पेट्रोल के दाम बढ़े हुए हैं और करेंट अकाउंट डेफिसिट ज्यादा है. इसलिए रुपए की वैल्यू कम है. यह एक अलग समस्या है. रिजर्व बैंक गवर्नर, चीफ इकोनोमिक एडवाइजर जैसे अर्थशास्त्री इस समस्या ने निपट सकते हैं. तब शायद कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत पड़ सकती है. असल में कड़े कदम अभी उठाने चाहिए. लेकिन मुझे लगता नहीं कि इस सरकार को अर्थशास्त्र की समझ है.

अरविंद सुब्रमण्यम के जाने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार तक नहीं रखा सरकार ने. रिजर्व बैंक गवर्नर अपनी धुन में रहते हैं, वित्त मंत्री अर्थशास्त्र में निपुण नहीं हैं. फिर कैसे और कौन देख रहा है वित्त मामलों को? एक हसमुख अधिया साहब हैं, वित्त सचिव. प्रधानमंत्री के चहेते हैं. वो नीरव मोदी मामले में पकड़े गए. नीरव मोदी से उपहार ले लिया उन्होंने. अधिया साहब को कैबिनेट सेके्रटरी बनाने की बात थी, लेकिन मोदी जी ने सही फैसला लेते हुए उन्हें कैबिनेट सचिव नहीं बनाया.

दूसरी तरफ, मौजूदा सरकार नौकरशाही के चले आ रहे मानदंड को एक-एक करके तोड़ रही है. एक बार सरकार ने कहा कि ज्वाइंट सेक्रेटरी लेवल के दस अधिकारियों को बाहर से लाएंगे. इनकी मंशा रही होगी कि संघ टाइप लोगों को लाएंगे. लेकिन अब उस विचार को ड्रॉप करना पड़ा. जाहिर है, इस काम के लिए एक सिस्टम बना हुआ है. यह संघ लोक सेवा आयोग का काम है. अगर बाहर से भी अधिकारी लेने हैं, तो उनके चयन का काम संघ लोक सेवा आयोग को करना चाहिए. क्या ऐसे अधिकारियों का नाम अमित शाह तय करेंगे?

इस देश में 19 महीने तक आपातकाल रहा. इंदिरा गांधी पर आपातकाल हटाने का कोई दबाव भी नहीं था. हां, मीडिया पर सेंशरशिप था. संजय गांधी उनके पुत्र थे. उनके पास कोई आधिकारिक पद नहीं था. चर्चा थी कि सब जगह संजय गांधी की चलती है. वे जो बोल देते हैं, वही अंतिम होता है. आज संजय गांधी से दस गुना अधिक पावर का इस्तेमाल अमित शाह कर रहे हैं. अमित शाह एक्स्ट्रा कंस्टीट्‌यूशनल अथॉरिटी बन गए हैं. हर अफसर से सीधे बात करते हैं.

आज तो आपातकाल नहीं है, सेंशरशिप भी नहीं है. फिर भी अखबार सरकार के खिलाफ नहीं लिख पाते. सब का मुंह पैसे से बंद है. अखबार मालिक पैसे के लालची हैं. पैसा लेकर और डर कर नहीं लिख पाते. अमित शाह जो नंगा नाच कर रहे हैं, उससे प्रशासनिक सेवा में बहुत रोष है. लेकिन बोल कोई नहीं पा रहा है, क्योंकि सबको नौकरी करनी है. लेकिन चुनावी प्रक्रिया शुरु होते ही यह गुस्सा फट पड़ेगा.

आलोक वर्मा पहले दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बनाए गए थे. इनसे पहले बी एस बस्सी थे. बस्सी, अरविंद केजरीवाल से बदतमीजी कर रहे थे. अमित शाह और अरुण जेटली की शह पर वे ऐसा कर रहे थे. जब उनकी जगह आलोक वर्मा आए तब से दिल्ली पुलिस और आम आदमी पार्टी की सरकार के बीच खटपट बंद हो गई. वर्मा एक निपुण ऑफिसर हैं. फिर वे सीबीआई निदेशक बनाए गए. लेकिन अस्थाना को उनके पीछे लगा दिया गया.

चर्चा तो यह भी थी कि सरकार गोगोई को मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाएगी, लेकिन मोदी जी को सद्बुद्धि आई. नहीं तो एक और मुश्किल होती. देश का नुकसान करना आसान है और नुकसान करने के लिए कोई बड़ी कैबिनेट मिटिंग बुलाने की जरूरत नहीं होती है. आपके एक छोटे से गलत निर्णय से देश का नुकसान हो जाता है.

प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व सही होना चाहिए. जवाहरलाल नेहरू की तो बात ही अलग थी. इंदिरा गांधी ने भी इमरजेंसी वाली गलती के अलावा सब ठीक ही किया. बांग्लादेश युद्ध में जीत, गरीबी हटाओ जैसे नारे आदि के बाद वे चुनाव भी जीतीं. राजीव गांधी के पास अनुभव नहीं था. पांच साल में कुछ कर नहीं पाए. लेकिन उनके इरादे अच्छे थे, आधुनिक आदमी थे, आधुनिक काम चाहते थे, हो नहीं पाया.

सरकार की साख ढाई साल में इतनी गिर गई कि 1989 के चुनाव में 400 सीट से काफी नीचे आ गए. फिर वीपी सिंह आए, चंद्रशेखर जी आए. नरसिम्हा राव जब आए, तब तक खजाना खाली हो गया था. उनके पास डिवैल्यूशन करके लिबरलाइजेशन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. हमारे उद्योगपति भी चाहते थे कि कंट्रोल राज खत्म कर दो. खोल दिया तो आज देश में चीन के इतने सामान आ रहे हैं कि आप उससे कंपीट कर ही नहीं सकते.

इतने बड़े देश की अर्थव्यवस्था बहुत नाजुक चीज होती है. सोच-समझ कर काम करना चाहिए. उसके लिए बुद्धिमान लोगों की जरूरत है. मौजूदा सरकार में तो सब बुद्धिहीन बैठे हुए हैं. जो बुद्धिमान हैं, उन्हें किनारे लगा दिया गया है. कुल मिलाकर आर्थिक स्थिति गंभीर है. चार साल में शासन, प्रशासन, स्टेट का नैतिक स्तर गिर गया. कोई भी नया प्रधानमंत्री आया, तो उसे देश संभालने में बहुत मुश्किल आएगी, मोदी आए तो ऐसे ही चलता रहेगा.

मुरली मनोहर जोशी, आडवाणी जी को बुद्धि लगानी चाहिए कि अगर आगे भी भाजपा की सरकार आई तो जो गलती हुई है, उसे कैसे सुधारना है. कैसे स्थिति को पटरी पर वापस लाना है. पटरी पर भी आकर हम कोई अमेरिका नहीं बन जाएंगे, जैसा ख्वाब ये रोज दिखाते हैं. हम सौ करोड़ लोग हैं. गरीबी, भुखमरी है.

दवा-दारू का पैसा नहीं है लोगों के पास, अस्पताल नहीं है यहां. खाद्य सुरक्षा नहीं है. किसान मेहनत करके खाद्यान्न उगाते हैं. सरकार का इसमें क्या रोल होना चाहिए? सरकार तो किसानों को मारने में लगी हुई है. सरकार इन्हें उचित मूल्य नहीं दे रही है.

मूल समस्याओं पर ध्यान देने की जगह सरकार मूर्ति बनाएगी, रिबन काटेगी, एक ही फ्लाईओवर का तीन बार उद्घाटन करेगी. पुरानी योजनाओं का नाम बदलेगी. भाजपा की पुरानी बीमारी है कि मुसलमान अच्छे नहीं लगते. ये मुगल को भी मुसलमान गिनते हैं. अरे मुगल तो राजा थे. राजा को हिन्दू-मुसलमान से क्या मतलब. मुगलसराय का नाम बदल दिया.

ये बहुत छोटे स्तर पर काम करने वाले लोग हैं. साढ़े चार साल में एक चीज मोदी जी ने पक्का प्रमाणित कर दिया है कि ये लोग केंद्र सरकार चलाने के काबिल नहीं हैं. इससे ज्यादा बुद्धि की बलिहारी क्या होगी कि इस देश को अमित शाह चला रहे हैं.

मोदी चलाएं तो एक बात है, लेकिन अमित शाह चला रहे हैं. मतलब मामला खत्म है. मुझे समझ नहीं आया कि आरएसएस क्यों नहीं बीच में बोल रहा है. आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी जी को तो मूकदर्शक बना दिया है इन्होंने. सरकार ने प्रशासनिक ढांचा इतना बिगाड़ दिया है कि उसकी कीमत तो अदा करनी ही पड़ेगी. लेकिन जो अगला प्रधानमंत्री आएगा, उसके लिए बड़ा संकट है.

कमल मोरारका