अदब की बात, मैं क्यों पीता हूँ…मैं क्यों खाता हूँ…ऐसे मैं क्यों लिखता हूँ : सआदत हसन मंटो

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मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ… मैं क्यों पीता हूँ… लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ़ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपये ख़र्च करने पड़ते हैं और जब लिखता हूँ तो मुझे नक़दी की सूरत में कुछ ख़र्च करना नहीं पड़ता। पर जब गहराई में जाता हूँ तो पता चलता है कि यह बात ग़लत है इसलिए कि मैं रुपये के बलबूते पर ही लिखता हूँ।
अगर मुझे खाना-पीना न मिले तो ज़ाहिर है कि मेरे अंग इस हालत में नहीं होंगे कि मैं कलम हाथ में पकड़ सकूँ। हो सकता है, फ़ाकाकशी की हालत में दिमाग़ चलता रहे, मगर हाथ का चलना तो ज़रूरी है। हाथ न चले तो ज़बान ही चलनी चाहिये। यह कितनी बड़ी ट्रेजडी है कि इनसान खाये-पिये बग़ैर कुछ भी नहीं कर सकता।
लोग कला को इतना ऊँचा रुतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें आस मान से मिला देते हैं। मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज़ है? मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है। मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के क़ाबिल हो सकूँ। रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मा’लूम होता है, लेकिन क्या किया जाय कि ख़ुदाबंद तआला को यही मंज़ूर है। वह ख़ुद को हर चीज़ से निरपेक्ष कहता है, यह ग़लत है। वह निरपेक्ष हरगिज़ नहीं है। उसको इबादत चाहिये। और इबादत बड़ी ही नर्म और नाज़ुक रोटी है बल्कि यूँ कहिये, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है।
मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ ख़ाविन्द से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती। लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने ख़ाविंद से लड़कर और ख़ुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं ख़ाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब-व-ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है। किसी लड़के को लड़की से इश्क़ हो जाय तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ़ ज़रूर खींचेगा जो ज़ाहिर करे कि उस पर सैकड़ों लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा। इस बज़ाहिर कामयाब आशिक़ की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियाँ भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूँगा और दूसरों को सुनाऊँगा।
चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मीनान से सो जाती है, मेरे अफ़सानों की हीरोइन नहीं हो सकती। मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है। जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख़्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आ रहा है। उसके भारी-भारी पपोटे, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गयी है, मेरे अफ़सानों का मौज़ूअ (विषय) बन सकते हैं। उसकी गलाज़त, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ – ये सब मुझे भाती हैं – मैं उसके मुतल्लिक़ लिखता हूँ और घरेलू औरतों की शस्ताकलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफ़ासतपसंदी को नज़रअंदाज कर जाता हूँ।
सआदत हसन मंटो लिखता है इसलिए कि यह ख़ुदा जितना बड़ा अफ़सानासाज और शायर नहीं, यह उसकी आज़िजी जो उससे लिखवाती है। मैं जानता हूँ कि मेरी शख़्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है। अगर यह ख़ुशफ़हमी न हो तो ज़िन्दगी और भी मुश्किल बन जाये। पर मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूँढ़ नहीं पाया हूँ। यही वज़ह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पाग़लखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ। मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता। मैं अपनी ज़िन्दगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेज़ियों की भेंट चढ़ा चुका हूँ। मैं समझता हूँ कि ज़िन्दगी अगर परहेज़ से गुजारी जाये तो एक क़ैद है। अगर वह बदपरहेज़ियों से गुज़ारी जाये तो भी एक क़ैद है। किसी न किसी तरह हमें इस ज़ुराब के धागे का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है, और बस।
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♡ वाॅल साभार नवनीत पांडे