अनमोल मोती – ख़ामोश रहना अकलमंदी और समझदार होने की अलामत होती है

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*-:: अनमोल मोती*-::

☄1. ख़ामोशी भी बाज़ औकात बेहतरीन जबाब होता है. ये ज़रूरी नहीं के खविन्दने ज़रासी बात कही तो बीवीको भी जबाब देना ज़रूरी है. या बीवी ने कोई बातकी तो खाविंद के लिए उसका जवाब देना फ़र्ज़ है. कई मर्तबा मुख़ातिब की बातका बेहतरीन जवाब ख़ामोशी होता है. तो हम इस बात को ना भूले के खामोश रहने से भी इन्सानका पैगाम दूसरे तक पहुँच जाता है.

☄2. खामोश रहना तदब्बुर, अकलमंदी और समझदार होने की अलामत होती है. जबके हर वकत टरटर करते रहना ये इन्सानकी बेवक़ूफ़ीकी अलामत है. ज़बान की लग़्ज़िश पाँवकी लागिश्से भी खतरनाक होती है. पाँव फिसल गया तो बन्दा फिर उठ सकता है, लेकिन ज़बान फिसल गई तो वोह लफ्ज़ वापस नहीं आ सकते. इस लिए जिस बंदेकी ज़बान बेकाबू हो तो उसकी मौतका फैसला वोही करती है.

☄3. हज़रत याह्या इब्ने माज़ राज़ी रहमतुल्लाह तआला अलयहे फरमाते है के दिलकी मिसाल हाँड़ी के मानिंद है, और ज़ुबान की मिसाल चमचे की मानिंद है. हांडी से तो वोही सब कुछ निकलता है जो हांडी में मौजूद होता है. तो जब किसी इन्सान की जबानसे गन्दी बाते निकले, ग़ीबत निकले, जुठ निकले तो समज लेना के उसके दिल मे यही सब बुराइया भरी पड़ी है.

☄ 4. मुहक्किने यह भी लिखा है के औरतों की जुबां ऐसी तलवार है जो कभी जंग आलूदा नहीं हुवा करती. आम तोर पर यह बात मुशाहीदे मे आई है के औरतों की ज़ुबान काबूमें नहीं रहती और मर्दोके हाथ काबूमें नहीं रहते. मर्दो मे यह बीमारी है के ज़रा-ज़रा सी बात पर हाथ उठा लेते है और इस बात को भूल जाते है के हम अपनों पर हाथ उठा रहे है.

☄5. यह बात जहन मे रखे के जब भी आपनो से कोई कुसूर होता है उसमे अपना भी कुछ न कुछ कुसूर होता ही है. लोग बीवी पर, बच्चो पर हाथ उठाते है, यह हाथ का उठाना कोई अच्छी बात नहीं। हाथ इन्सान का उस वकत उठता है के जब वोह हार मान लेता है के में ज़बानके साथ समझाने से क़ासिर हु. किसी अपनों पर हाथ का उठाना मर्दानगी नहीं बल्कि दीवानगी है. शरीयत ने बहुत आखिर मे जाकर यह बात कही के अगर किसी आदमी की बीवी कोई फहश काम कर ले, तो उसे जुबानसे समझाए, अगर फिरभी बाज़ ना आए तब जाकर शरीयत ने कहा है के तुम उसे दो-चार थप्पड़ मर सकते हो.

☄ 6. मगर जल्दी हाथ उठा लेना मर्दो की कोताही है. और ज़ुबान जल्दी चला देना यह औरतोंकी कोताही है. और कई घरो मे तो ऐसा भी होता है के न औरत की ज़ुबान रूकती है न मर्द का हाथ रुकता है. फिर यह लोग सुकून वाली ज़िंदगी कैसे गुज़ार सकेंगे.