अमरीका को ठेंगा दिखाना चाहता है पाकिस्तान, मगर विकल्प क्या है?

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संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मुनीर अकरम ने अपने एक लेख में कई बिंदुओं का उल्लेख करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया है कि पाकिस्तान अपनी अर्थ व्यवस्था दुरुस्त करे और इसके लिए वह चीन से अपने सहयोग को बढ़ाए।

सवाल यह है कि इस समय जब अमरीका से पाकिस्तान के संबंध काफ़ी तनावपूर्ण हो गए हैं तो पाकिस्तान के पास क्या विकल्प हैं।

पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार तेज़ी से कम हो रहा है और इसे ख़त्म होने से बचाने के लिए और अर्थ व्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए पाकिस्तान को एक और बेल आउट पैकेज के लिए आईएमएफ़ के पास जाना पड़ सकता है। लेकिन आईएमएफ़ से कर्ज़ा हासिल कर पाना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा।

इस संदर्भ में एक घटना यह हुई कि आईएमएफ़ में अमरीका के पूर्व प्रतिनिधि मार्क सोबल ने अपने एक ब्लाग में पाकिस्तान को आईएमएफ़ के संभावित कार्यक्रम के लिए कड़ी शर्तों का समर्थन किया है जिसमें रूपए के मूल्य में गिरावट, ऊंची ब्याज दर, ज़्यादा टैक्स और प्रशासनिक सुधार, बिजली की दरों में वृद्धि, कृषि पर टैक्स, सरकारी संस्थाओं का निजीकरण और रक्षा बजट में कटौती शामिल हैं।

सोबल का यह भी कहना है कि आईएमएफ़ को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके संसाधन अस्थायी चीनी क़र्ज़ों से बेल आउट देने के लिए प्रयोग न हों। सीपेक के सभी क़र्ज़ों से संबंधित समग्र डेटा, उसकी सभी शर्तें, उसकी मैच्युरिटी की अवधि और उसमें शामिल पक्षों का ब्योरा, फ़ंड की उंगलियों पर होना चाहिए।

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने भी इस मांग को दोहराया। अमरीकी चैनल एनबीसी को एक साक्षात्कार में उनका कहना था कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि आईएमएफ़ के टैक्स डालर्ज़ और अमरीकी डालर्ज़ को चीनी बांड होल्डर और ख़ुद चीन को बेल आउट देने के लिए प्रयोग किया जाए।

इससे साफ़ ज़ाहिर है कि अमरीका पाकिस्तान में चीनी परियोजनाओं के बारे में क्या विचार रखता है।

पाकिस्तान में यह विचार प्रबल रूप से मौजूद रहा है कि यदि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका कोई सफलता हासिल करना चाहता है तो इसके लिए उसे पाकिस्तान की मदद की ज़रूरत होगी लेकिन इस बीच अमरीका ने यह किया है कि तालेबान से बातचीत शुरु कर दी है और कहा जाता है कि दोनों पक्ष लचक दिखाने के मूड में भी आ गए हैं। अगर यह वार्ता इसी तरह आगे बढ़ी तो अमरीका को पाकिस्तान की ज़रूरत नहीं रह जाएगी।

इन हालात में पाकिस्तान को चीन से मिलने वाली मदद एक अच्छा विकल्प महसूस होती है। पाकिस्तान को यह भी लगता है कि इस तरह पाकिस्तान में विदेशी निवेश भी बढ़ रहा है।

पाकिस्तान की यह भी इच्छा है कि चीन के वह उद्योग एशिया में किसी अन्य देश में जाने के बजाए पाकिस्तान में आ जाएं जै ग़ैर कांम्पीटीटिव हैं।

यह सब तो ठीक है लेकिन इस बीच पाकिस्तान में कुछ गलियारों को यह चिंता है कि पाकिस्तान चीन से बहुत क़रीब होकर कहीं अपनी पोज़ीशन को कमज़ोर और चीन पर ख़ुद को बहुत अधिक निर्भर न कर ले।

पाकिस्तान की नई सरकार सत्ता संभालने जा रही है और उसके सामने निश्चित रूप से चुनौतियां बहुत ज़्यादा हैं। इमरान ख़ान ने जनता से जो वादे किए हैं उनका बोझ भी काफ़ी ज़्यादा है इन हालात में देश चलाना काफ़ी कठिन काम होगा लेकिन यह भी तय है कि कठिनाइयों से जूझकर ही लोगों की क़द बढ़ता है और समस्याओं के भारी दबाव के बीच से ही बुलंद हौसले वाले लोग निकलते हैं। शर्त यह है कि पूरी निष्ठा, तनमयता और लगन से काम किया जाए। आम लोग यदि सरकार को मेहनत और लगन से काम करता देखेंगे तो निश्चित रूप से वह भी सहयोग करेंगे। इसके साथ ही यह भी बहुत ज़रूरी है कि नीतियां बहुत सोच समझ कर बनाई जाएं। तत्काल नतीजा देने वाली नीतियों के साथ ही दीर्घकालिक योजनाएं भी बनाई जाएं और संयम के साथ काम किया जाए।