अरब कुछ तो शर्म करो, इतिहास अमरीका और इस्राईल को कभी माफ़ नहीं करेगा!!रजब तैयब अर्दोग़ान!!

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तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान की उन बातों से हम पूरी तरह सहमत हैं जो उन्होंने लंदन यात्रा के दौरान ग़ज़्ज़ा पट्टी की सीमा पर इस्राईली सैनिकों के हाथों फ़िलिस्तीनियों के नरसंहार की आलोचना में कहीं।

उन्होंने कहा कि इतिहास अमरीका और इस्राईल को अमरीकी दूतावास बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित करने की भयानक ग़लती पर कभी माफ़ नहीं करेगा। हम तुर्क राष्ट्रपति के इस बयान में एक बात और जोड़ना चाहते हैं कि इतिहास अरब नेताओं को भी माफ़ नहीं करेगा और उन अरब नेताओं को तो बिल्कुल भी नहीं जो अपने देश में इस्राईली दूतावासों की मेज़बानी कर रहे हैं और छुपकर या खुलकर इस्राईल से दोस्ती की पेंग बढ़ा रहे हैं और जिन्होंने इस नरसंहार पर वह ख़ामोशी अख़तियार कर ली है जो क़बरिस्तान में छायी रहती है बल्कि शायद बैतुल मुक़द्दस के यहूदीकरण के अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के पाप में शामिल हो गए हैं।

यह बात भी ध्यान योग्य थी कि अर्दोग़ान ने दो बार इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी की अपात बैठक बुलाई। एक बार तब जब अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने पिछले साल घोषणा की थी कि वह अपना दूतावास तेल अबीब से बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित करना चाहते हैं। दूसरी बार उन्होंने इस मौक़े पर अपात बैठक बुलाई है और इस बैठक के लिए शुक्रवार का दिन निर्धारित किया है। अर्दोग़ान ने सऊद अरब, जार्डन और कुवैत के शासकों सहित अरब राष्ट्राध्यक्षों को फ़ोन करके बैठक में शामिल होने की दावत दी है।

बड़े खेद की बात यह रही कि अरब लीग ने राजदूतों के स्तर की बैठक बुलाई जिसे बाद में मंत्री स्तर की बैठक में बदल दिया गया। यह अवैध अधिकृत बैतुल मुक़द्दस के लिए खुला हुआ अपमान है और यह अरब राष्ट्रों की बेइज़्ज़ती है जो बैतुल मुक़द्दस की घटनाओं से आक्रोश में हैं। जब बैतुल मुक़द्दस का यहूदीकरण और उसे ग़ैर क़ानूनी इस्राईली सरकार की राजधानी घोषित कर दिया जाना एसा मुद्दा नहीं है जिस पर अरब लीग की अपात शिखर बैठक बुलाई जाए तो फिर वह कौन सा मुद्दा हो सकता है जिसके लिए अरब लीग की शिखर बैठक होगी?

इस्तांबूल में तुर्क राष्ट्रपति ने ओआईसी की जो शिखर बैठक बुलाई है वह अधिकतर अरब नेताओं की अरबी और इस्लामी प्रवृत्ति का इमतेहान भी है। वैसे हमें नहीं लगता कि इनमें से अधिकतर नेता इस परीक्षा में सफल हो पाएंगे। कारण यह है कि बैतुल मुक़द्दस का मामला उनकी नज़र में प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है क्योंकि वातावरण यह है जिसमें अतिग्रहणकारी इस्राईल से उनकी दोस्ती बहुत तेज़ गति से परवान चढ़ रही है।

हमारी कामना तो यही है कि जिन देशों ने अपनी राजधानियों में इस्राईली दूतावास खुलने की अनुमति दी है वह तत्काल इस्राईली कूटनयिकों को बाहर निकालें और अपने कूटनयिकों को तेल अबीब से वापस बुलाएं। उन्हें चाहिए कि इस संदर्भ में दक्षिण अफ़्रीक़ा, एयरलैंड, तुर्की और नार्वे को उदाहरण बनाएं जिन्होंने ज़ायोनियों के हाथों फ़िलिस्तीनियों के नरसंहार पर विरोध जताते हुए तथा अमरीकी दूतावास बैतुल मुक़द्दस स्थानान्तरित किए जाने के ख़िलाफ़ अपने राजदूतों को वापस बुला लिया।

फ़िलिस्तीन मुद्दे के समर्थन में क़दम उठाकर तुर्क राष्ट्रपति ने अरब जगत का दिल जीत लिया है। उन्होंने 3 हज़ार से अधिक घायल ग़ज़्ज़ा वासियों को अपने यहां लाकर उपचार करने के लिए अपने विमान भी भेजे जबकि अरब नेताओं ने तो मुंह घुमा लिया है। मिस्र ने तो ग़ज़्ज़ा वासियों पर अपने दरवाज़े बड़ी मज़बूती से बंद कर रखे हैं।

कुछ लोग शायद यह भी कहें कि तुर्क राष्ट्रपति ने चुनाव में फ़ायदा हासिल करने के लिए इस्राईली दूतावास को तुर्की से निकाला है और ओआईसी की बैठक बुलाई है लेकिन अगर उन्होंने इसी नीयत से किया है तब भी इसमें बुराई क्या है? यही काम अरब नेता नहीं कर रहे हैं जिसके दो कारण हैं। पहला कारण यह है कि इन नेताओं के निकट अपने देशों की जनता की इच्छा का कोई सम्मान नहीं है बल्कि वह जनता नाम की किसी चीज़ को मानते ही नहीं और दूसरे यह कि उनके देशों में सिरे से चुनाव होते ही नहीं।

धीरे धीरे हम में से अब बहुत से लोगों की समझ में यह बात आने लगी है कि क्यों इराक़ पर हमला किया गया, क्यों लीबिया को निशाना बनाया गया, क्यों सीरिया को तबाह किया गया, क्यों यमन को बांटा गया है और यह सब कुछ अरब और मुस्लिम देशों के माध्यम से तथा अमरीका के समर्थन से क्यों हुआ? असली लक्ष्य यह था कि यह देश क्षेत्रीय और अतर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी भी प्रकार का प्रभाव न डाल सकें और अमरीका के घटकों को नेतृत्व की अगली पंक्ति में स्थान मिले। इसी साज़िश ने अरबों को गहराई में गिरा दिया है।

हमारी यह भी इच्छा थी कि राष्ट्रपति अर्दोग़ान अमरीका और इस्राईल के राजदूतों को निकालने पर न रुकते बल्कि दोनों के दूतावास बंद कर देते। हमारी यह भी इच्छा थी कि राष्ट्रपति अर्दोग़ान सीरिया के राष्ट्रपति को इस्तांबूल शिखर में भाग लेने के लिए आमंत्रित करते और सीरिया के बारे में सदभावना दिखाते हुए सीरिया की धरती से अपने सैनिकों को वापस बुला लेते ताकि इस्लामी जगत के ख़िलाफ़ साज़िशें रचने वालों के मुंह पर ज़ोरदार थप्पड़ पड़ता और इन साज़िशों का सामना करने के लिए एक मज़बूत एलायंस तैयार हो जाता जो अमरीका और इस्राईल की सारी योजनाओं पर पानी फेर देता।

हमें पता है कि हम जिन बातों की इच्छा ज़ाहिर कर रहे हैं वह असंभव हैं विशेषकर इस समय जब जरब जगत और इस्लामी जगत पतन की ओर बढ़ रहा है। हमें यह भी पता है कि कुछ लोग आरोप लगाएंगे कि हम लेख नहीं राजनैतिक उपन्यास लिखने बैठ गए हैं जिसका ज़मीनी सच्चाई से कोई लेना देना नहीं है लेकिन हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता हम इसके बावजूद आशा का दामन नहीं छोड़ेगें क्योंकि हमारा मानना यह है कि हितों के बदलने के साथ साथ नीतियां भी बदलती हैं इसी तरह गठबंधन भी बदल जाते हैं। हमें यह भी विश्वास है कि इस्लामी जगत अपनी वर्तमान दुर्दशा से बाहर निकलेगा और अपनी गरिमा और मर्यादा को वापस लेगा और शायद यह वह समय ज़्यादा दूर नहीं है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार