अल्लामा इक़बाल ने मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा पे नज़्म लिखी, आख़िर क्यों?

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Abdul H Khan
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अल्लामा इक़बाल ने ताजमहल पे कोई नज़्म नहीं लिखी, मस्जिद-ए-अक़्सा पे कोई नज़्म नहीं लिखी, यहाँ तक कि मस्जिद-ए-नबवी पे भी कोई नज़्म नहीं लिखी, पर इक़बाल ने मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा पे नज़्म लिखी। आख़िर क्यों?

इक़बाल का मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा पे नज़्म लिखने का मक़सद इस मस्जिद के आर्किटेक्चर या इसकी ख़ूबसूरती को बताने के लिए नहीं था बल्कि अल्लामा ने इसे एक सिम्बल के तौर पे लिया जो मुसलमानों के उरूज और ज़वाल की सबसे बड़ी दास्तान है। ये इंसानी तारीख़ की बुलंदी और गिरावट की नक्काशी करती है। और ये जो क़ुर्तुबा है वो मुस्लिम सभ्यता का उरूज था, वो सभ्यता जिसका विस्तार यूरोप से लेकर एशिया तक हो चुका था, जो दुनिया की तारीख़ में कोई भी क़ौम ने आजतक ये मुक़ाम हासिल नहीं कर पाया। क़ुर्तुबा शहर उस वक़्त पूरी दुनिया का केंद्र रहा करता था, नई-नई तहजीबें भी यहीं से जन्म ले रही थीं।

ये मुस्लिम तहज़ीब ओ शकाफ़त का, मुसलमानों के इल्म-ओ-फुनून का जो एक मेअयार है, इस्लामी तहज़ीब की जो बुलंदी है, उसका ये एक बेहतरीन नमूना है। इसीलिए इक़बाल ने इसे एक सिम्बल बनाकर इस क़ौम को अपना पैग़ाम दिया था। इक़बाल की ये नज़्म कौमों को उनके माज़ी से उनकी हाल और उनकी मुस्तकबिल के दरमियान एक रिश्ता क़ायम करती है।

“जिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगी
रूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाब

सूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौम
करती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाब।”
https://youtu.be/1lvF_xHDX9Y
~Majid Majaz~