अल्लाह का क़ानून : यही अल्लाह का निज़ाम भी है

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Joher Siddiqui
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अल्लाह का क़ानून!

मुझे ऐसा लगता है, अल्लाह के बनाये क़ानून में हमें ज़बर्दती नहीं करनी चाहिए, यहाँ पर क़ानून का मतलब शरीयत के साथ साथ नेचर से भी है।

मसलन…

अल्लाह का क़ानून है, बादल होगा तभी बारिश होगी, हालांकि हमारा अक़ीदा है, अल्लाह बिना बादल के भी बारिश करा सकता है, लेकिन सच्चाई यही है अल्लाह ऐसा नहीं कराता है।

अल्लाह अगर चाहे तो बिना पानी के प्यास भुझा दे, बिना खाना के भूख मिटा दे, लेकिन अल्लाह ऐसा भी नहीं करता है, अल्लाह ने एक क़ानून बनाया है, वसीला का क़ानून, बारिश के लिए बादल वसीला है, प्यास के लिए पानी, भूख के लिए खाना।

ये भी सच है, अल्लाह अगर चाहता तो अपनी मख़लूक़ात से खुद हमकलाम होता, किसी नबी या अम्बया को नहीं भेजता, लेकिन अल्लाह ने ऐसा नहीं किया, अपनी बात को अपनी मख़लूक़ात तक पहुचाने के लिए नबियों अम्बियाओं को ज़रिया बनाया।

हज़रत सय्यदना पीर मेहर अली शाह रहमतुल्लाह अल्है फ़रमाते हैं, जो मैं अल्लाह से माँगता हूँ, वो वली से नहीं माँगता और जो वली से माँगता हूँ, वो अल्लाह से नहीं माँगता हूँ।

मुझे ऐसा लगता है, हज़रत सय्यदना पीर मेहर अली शाह रहमतुल्लाह अल्है की इस बात को समझना आज के दौर में बहुत मुश्किल है। हज़रत सय्यदना पीर मेहर अली शाह रहमतुल्लाह अल्है इस्लामी तारीख़ में क्या मुक़ाम रखते हैं, ये इस्लाम के जानकारों के लिए कोई नई बात नहीं होगी।

जहाँ तक मुझे समझ आता है, नबी या वाली से मांगना सबब है और अल्लाह का देना तासीर। इसे इस तरह भी समझा जा सकता हैं, हालांकि ज़बर्दती नहीं हैं।

हम पानी पीते हैं, लेकिन प्यास अल्लाह बुझाता है, यही हमारा अक़ीदा है, हम नहीं कह सकते पानी ने प्यास बुझाई है, क्योंकि प्यास बुझाना अल्लाह की तासीर है, और पानी उसका सबब है। यही अल्लाह का निज़ाम भी है।

यहाँ पर समझिये अल्लाह के लिए जो अक़ीदा रखते हैं वो पानी के लिए नहीं रखते हैं, और जो पानी के लिए अक़ीदा रखते हैं वो अल्लाह के लिए नहीं रखते हैं। अगर पानी के लिए वो अक़ीदा रखेंगे तो शिर्क हो जाएगा और अल्लाह के लिए वो अक़ीदा रखेंगे तो कुफ़्र हो जाएगा।

अल्लाह के नबी से माँगते वक़्त या अल्लाह के वाली से मांगते वक़्त भी माँगने वालों का अक़ीदा यही होता है, जहाँ तक मैंने पढ़ा और समझा है।।

ख़ैर, इस पोस्ट को किसी भी स्कूल ऑफ थॉट से जोड़कर मत समझिये, कुछ पढ़ता हूँ तो अपनी समझ साझा करना अच्छा लगता है।

मुझे एक और बात समझ नहीं आती है, जो मैं फेसबुक पर अक्सर देखता हूँ, हम यहाँ तुरंत इतने आहत कैसे हो जाते हैं कि बिना जानकारों की राय लिए एक नज़रिया बना लेते हैं, और तुरन्त शिर्क, कुफ़्र जैसा संगीन आरोप लगा देते हैं। जबकि हमें पता होना चाहिए, अगर किसी ने शिर्क/ कुफ़्र नहीं किया और दूसरे ने उसे शिर्क/कुफ़्र करने वाला कह दिया तो शिर्क/ कुफ़्र का फतवा वापस लगाने वाले कि तरफ लौट जाता है।

और शिर्क, कुफ़्र का फतवा लगाना, अवाम का काम नहीं है, ये आलिमों मुफ़्तियों का काम है, अवाम को इस तरह की बातों से दूर ही रहना चाहिए।।