अल्लाह तआला ने कुरआन शरीफ़ में कितनी जगह, नमाज़ का ज़िक्र फ़रमाया है, जानिये

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‎Sikander Kaymkhani‎
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कुरान शरीफ में कम से कम 70 जगह नमाज़ का ज़िक्र आया है, जिनमे से कुछ जगहों पर खुले लफ़्ज़ों में नमाज़ के बारे में कहा गया है।

किसी आयत में नमाज़ पढने का हुक्म दिया गया है, किसी में नमाज़ की फज़ीलत व अहमियत बताई गई है, तो वहीं किसी आयत में नमाज़ ना पढ़ने पर सज़ा का एलान किया गया है।

हम यहाँ पर कुरआन पाक के कुछ आयतों का तर्जुमा आप के सामने पेश कर रहे हैं।
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ
“और नमाज़ कायम रखो और ज़कात दिया करो और रुकू करने वालों के साथ मिलकर रुकू किया करो”
अल-क़ुरआन
(सूरह बकरा आयत नंबर 43)

दूसरी आयत में है।
فَإِذَا قَضَيْتُمُ الصَّلَاةَ فَاذْكُرُوا اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَى جُنُوبِكُمْ فَإِذَا اطْمَأْنَنتُمْ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ إِنَّ الصَّلَاةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ كِتَابًا مَّوْقُوتًا
“ऐ मुसलमानों जब तुम नमाज़ अदा कर चुको तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को खड़े और बैठे और अपने पहलुओं (लेटे हुए) हर हाल में याद किया करो, फिर जब तुम इत्मिनान पालो तो नमाज़ को कायम करो, बेशक नमाज़ मोमिनों पर मुकर्र वक़्त के हिसाब से फ़र्ज़ है”
अल-क़ुरआन
(सूरह निसा आयत नंबर 103)

एक और आयत में है।
إِنَّنِي أَنَا اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدْنِي وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي
“बेशक मैं ही अल्लाह हूँ मेरे सिवा कोई मआबूद नहीं सो तुम मेरी इबादत करो, और मेरी याद की खातिर नमाज़ कायम किया करो
अल-क़ुरआन
(सूरह ताहा आयत नंबर 14)

इसी तरह एक और जगह अल्लाह तआला का फरमान है।
وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا نَّحْنُ نَرْزُقُكَ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَى
“और आप अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म फरमाएं, और इस पर साबित कदम रहें, हम आपसे रिज़्क़ तलब नहीं करते, बल्कि हम आप को रिज़्क़ देते हैं, और बेहतर अंजाम परहेज़गारी का ही है।
अल-क़ुरआन
(सूरह ताहा आयत नंबर 132)

इसी तरह एक और जगह अल्लाह तआला का फरमान है।

الَّذِينَ إِن مَّكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنكَرِ وَلِلَّهِ عَاقِبَةُ الْأُمُورِ

“अहल-ए-हक़ वह लोग हैं कि अगर हम उन्हें ज़मीन में इक्तिदार दे दें तो वो नमाज़ को कायम करें, और ज़कात अदा करें, और पूरे समाज में भलाई का हुक्म करें, और लोगों को बुराई से रोक दें, और सब कामों का अंजाम अल्लाह ही के इख़्तियार में है
अल-क़ुरआन
(सूरह हज 41)