असलम मेरे अब्बा का नाम है, मेरा नाम अशरफ़ है!

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Sara Nilofar
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स्कूटी को मैंने बड़ी ही स्टाइल से उस छोटी सी दुकान के सामने रोका।
टायर में हवा भरवानी थी। एक 17-18 साल का लड़का दुकान से बाहर आया और ट्यूब में हवा भरने के बाद…… मैंने उससे गुस्से में कहा “अरे तुम ही हो असलम पंचर वाला ! तुम लोगों को सिवाय टायर पंचर के कोई दूसरा काम-धंधा नहीं दिखता है। कौम को बदनाम करके रख दिए…… ढंग से पढ़ाई लिखाई क्यों नहीं करते हो?”

मेरी बात सुनकर लड़के ने बेरुखी कहा कि “असलम मेरे अब्बा का नाम है। मेरा नाम अशरफ है। अब्बा अभी खाना खाने गए हैं। इसलिए मैं दुकान देख रहा हूं ।….मैं पढता हूं और कैंपियन स्कूल का 11 वीं का टॉपर हूं। 11 वीं में मेरे 92 परसेंट मार्क्स आए थे। आप कहे तो मैं मार्कशीट दिखा सकता हूं। “

अभी मैं उससे बात कर ही रही थी। तभी उसके अब्बा यानी असलम पंचर वाला आ गए।

उन्होंने कहा कि “अशरफ बेहद जहीन है। और आगे पढ़कर मेकेनिकल इंजीनियर बनना चाहता है। लेकिन पैसे की बड़ी तंगी हैं। किसी तरह इसे महंगे प्राइवेट स्कूल में तालीम दिलवा रहे हैं।“

मैंने कहा की “शहर के मुसलमानों के कौमी लीडर सैयद अकरम साहब के पास जा सकते थे। सुना है कि वह कौम के लिए काफी खर्च करते हैं।”

असलम पंचर वाला ने जवाब दिया की “जनाब सैयद अकरम साहब सिर्फ वही खर्च करते हैं। जहां वह सियासतदानों को दिखा सके, की उनका असर बहुत से मुसलमानों पर है। बड़ी मुस्लिम फॉलोइंग देख कर सियासतदान बड़े-बड़े ठेके देते हैं. और सैयद अकरम साहब बदले में कौम को एक पार्टी विशेष के फेवर में वोट डालने को कहते हैं। दरअसल सैयद अकरम साहब “सत्ता के दलाल” हैं। उन्हें कौम की बदहाली से कोई मतलब नहीं।”

बातचीत चल ही रही थी लड़के की अम्मी भी वहां आ गई। अशरफ की अम्मी ने कहा :”बिटिया, बच्चे की तालीम के लिए हम कहां- कहां नहीं गए…हर किसी से मदद मांगी। लेकिन कहीं से मदद नहीं मिली। थक हार कर मैंने सिलाई को आमदनी का जरिया बनाया ।”

मैंने लड़के की अम्मी को गौर से देखा बेहद कमजोर नजर आ रही थी. क्षमता से ज्यादा काम करने से तंदुरुस्ती गिर चुकी थी । आंखों पर मोटा चश्मा चढ़ गया था। मुझे एहसास हुआ एक मां अपने बच्चे की मुस्तकबिल के लिए कितना कुछ कुर्बान करती है।

अब सन्नाटा छा गया था।

मैंने नजर उठाकर देखा लड़के की अम्मी के चेहरे पर एक हौसला था गरीबी से लड़ने के लिए….अपने बच्चे को आला तालीम दिलवाने के लिए।

असलम के चेहरे पर निराशा और बेबसी के भाव थे।

और लड़के अशरफ के चेहरे पर कौम के लीडरों के लिए नफरत और गुस्से के भाव

और मैं ….

मेरा सिर शर्म से झुक गया था। एक ही बात जेहन में आ रही थी “असलम हम शर्मिंदा हैं। जो मदद नहीं कर पाए.. यहाँ तक की जकात के पैसे को भी मुस्तहिक शख्स तक नहीं पंहुचा पाए ।”

और एक ही चेहरा जेहन में घूम रहा था … कमजोर लेकिन जद्दोजहद करती हुई लड़के की अम्मी का ….