आईये आज आपको लिये चलते हैं आदर्श ग्राम की ओर…..

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Santosh Kumar Singh
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गांव की कहानी के कारवां को आगे बढ़ाते हुए आईये आज आपको लिये चलते हैं आदर्श ग्राम नवानी की ओर..कहानी कलमबद्ध किया है..डॉ रीता सिंह ने..लिखती हैं….

मधुबनी जिले के झंझारपुर प्रखण्ड का नवानी गाँव। शादी के चार दिन बाद में गाँव गई। गाडी गाँव के चौक पर रुका। एक नन्हीं बालिका भागती हुई आई और मेरे घूंघट को गले तक खींच दिया। पहला परिचय गाँव से।
मैंने 2001 में मुसहर जाति पर शोध कार्य प्रारम्भ किया तब अपने इस गाँव के इस जातीय मतभेद को नजदीक से देखा।

पर यही सत्य नहीं था। इस गाँव का एक दूसरा पहलू भी था। इसका एक स्वर्णिम इतिहास भी है। एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने मुझसे पूछा। आपका घर कहाँ है? मैंने बताया मेरा ससुराल “नवानी है।
आपको पता नहीं है आप किस मिट्टी से जुडी हैं। वह हजारों संस्कृत विद्वानों का गुरु स्थान रहा है। न्याय दर्शन की शिक्षा का यह एक मात्र केंद्र था।
सर्वतंत्र स्वतन्त्र बच्चा झा जी की यह जन्मस्थली है। वाराणसी मे श्री विशुद्धानन्द सरस्वती और बालशास्त्री महोदय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद गाम आकर शारदा भवन विद्यापीठ की स्थापना की।
मैं मन्त्रमुग्ध सुन रही थी। ऐसे ऐतिहासिक ग्राम की बहू होना सचमुच सौभाग्य की बात थी। नवानी को आदर्श ग्राम निर्मित करने के लिए वहाँ के सांसद के लिए इसे गोद ले लिए गया था।
मैंने नवीन स्वरूप में सभी कुछ देखा। गाँव के सभी समुदाय से मिली।ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, मल्लाह, पासवान, मुसहर सभी से। गाँव में युवा ऊर्जा कम थे। पुरानी संस्कृति कहानियों में थे
इसी बीच मुख्यमंत्री की शराबबंदी ने हमारे प्रयास को मजबूती दी।
इस बीच गाँधीवादी विचारधारा पर काम कर रही छत्तीसगढ़ की एक कम्पनी से सम्पर्क हुआ। कम्पनी से गाँव का सर्वेक्षण किया। महात्मा गांधी ग्राम समृद्धि योजना के तहत आर्थिक उत्थान की योजना बनाई। गाँव के गांधीवादी बुजुर्गों से स्वागत किया। प्रथम स्तर पर बांस की खेती और मछली उत्पादन को माध्यम बनाया गया। एक हजार बांस का पेड़ लगाया गया। मछली उत्पादन की नई तकनीक से मछली उत्पादन शुरू किये गए। बाहर गए युवाओं से हमने सम्पर्क किया। उन्होंने भी सकारात्मक रुख दिखाया। वह बांस आधारित उधोग के लिए गाँव आने को तैयार हुए। अगला कदम बीज निर्माण के लिए किसानों को सूचीबद्ध करने का था। पर कुछ ग्रामीणों की छोटी बुद्धि ने गाँव को फिर पीछे कर दिया। ग
सभ्य और सुसंस्कृत गाँव में एक लाख की पूंजी के बांस की खेती और कई एकड़ की सफल मछली की खेती समाप्त हो गई। गाँव अपनी पुराने ढ़रे पर चल रहा है। शराब की जगह नशे की गोली मिली ताड़ी और गांजे ने ले ली है। महात्मा गांधी की आत्मा ने दम तोड़ दिया। हम भी अपने खोल में वापस सिमट आए। आखिर हम बहू ही तो हैं। कितना उड़ सकते हैं। अब भी सम्भावनाएं अपार हैं।

डॉ. रीता सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय…..
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