आज एक और ईदी अमीन कौन बनेगा ?

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Abhay Vivek Aggroia
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चार अगस्त, 1972, को युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने युगांडा में वर्षों से रह रहे 60000 एशियाइयों को अचानक देश छोड़ देने का आदेश दे दिया था . उन्हें देश छोड़ने के लिए सिर्फ़ 90 दिन का समय दिया गया था. हर व्यक्ति को अपने साथ सिर्फ़ 55 पाउंड और 250 किलो सामान ले जाने की इजाज़त थी. ईदी अमीन ने सैनिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि अल्लाह ने उनसे कहा है कि वो सारे एशियाइयों को अपने देश से तुरंत निकाल बाहर करें.अमीन ने कहा, ”एशियाइयों ने अपने आप को युगांडावासियों से अलक-थलग कर लिया है और उन्होंने उनके साथ मिलने जुलने की कोई कोशिश नहीं की है. उनकी सबसे ज़्यादा रुचि युगांडा को लूटने में रही है. उन्होंने गाय को दुहा तो है, लेकिन उसे घास खिलाने की तकलीफ़ गवारा नहीं की है.’
बहुत से एशियायियों को अपने दुकाने और घर ऐसे ही खुले छोड़ कर आना पड़ा. उन्हें अपना घर का सामान बेचने की इजाज़त नहीं थी.
असम में एक बहुत बड़ा नरसंहार ग्राम नेल्ली ज़िला नौगाँव में हुआ था. यह घटना 18 फरवरी 1983 को हुई थी. इसमें 13 असमिया गाँव के लोगों ने असलहों और अन्य हथियारों से लैस होकर नेल्ली गाँव की मुस्लिम बस्ती पर हमला किया था.


यह नरसंहार सवेरे 8 बजे शुरू होकर 3 बजे तक चला था. सरकारी आंकड़े के अनुसार 1800 लोग मारे गए थे जबकि गैर-सरकारी आंकड़ा 3000 का है. इस जनसंहार के बाद पूरे असम में बांग्लाभाषियों में बहुत दहशत फ़ैल गई थी.उस समय असम में आसू (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) और एजीपी (ऑल असम गण संग्राम परिषद) की तरफ़ से गैर असमियों के ख़िलाफ़, आंदोलन ज़ोरों पर था जो कि 1979 से चल रहा था.इस आन्दोलन का मुख्य मुद्दा था कि असम से बाहरी लोगों को बाहर कर दिया जाए. इनमें सबसे ज़्यादा बांग्लाभाषी मुसलमान थे. राजीव गाँधी ने उनके आगे घुटने टेक गए थे .
जिसके बाद NCR की कारवाही शुरू हुई .
बीजेपी , आरएसएस और मोदी इसको अपने हिंदुत्व के एजेंडा में इसे इस्तमाल कर रहे हैं.
एस. आर. दारापुरी, आईपीएस (सेवानिवृत्त) बीबीसी हिंदी के लिए: उनके अनुसार :एनआरसी के संबंध में काम कर रही कई संस्थाओं के सदस्यों से भी मिले. हम लोग एनआरसी समन्वयक के कार्यालय में अतिरिक्त समन्वयक कलिता से भी मिले.
इस फैक्ट फाइंडिंग अभियान के दौरान कई लोगों से बातचीत करके हम इन निष्कर्षों तक पहुंचे:-
1. एनआरसी प्रक्रिया का सभी पक्षों ने स्वागत किया है क्योंकि लोग बांग्लादेशी के टैग से मुक्त होना चाहते हैं.

2. एनआरसी तैयार करने हेतु अपनाई गई प्रक्रिया में बहुत सारी कमियां रही हैं.

3. एनआरसी सेवा केंद्रों पर काम करने वाले अधिकतर कर्मचारी असमिया हैं. उनके बांग्लाभाषियों के लिए पूर्वाग्रह के कारण उनके मामलों को सहानुभूतिपूर्वक न देखकर छोटी-छोटी त्रुटियों के कारण प्रस्तुत अभिलेखों को रद्द कर दिया गया है.

4. असम में 1997 में चुनाव आयोग की ओर से अपनाई गई डी-वोटर की अवधारणा अवैधानिक है. यह सर्वविदित है कि कोई व्यक्ति या तो वोटर हो सकता है या वोटर नहीं हो सकता. हमारे संविधान में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है. हैरानी की बात है कि इसे अब तक किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई.

5. नागरिकों को डी-वोटर घोषित करके या विदेशी ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी होने की राय व्यक्त करने पर गिरफ़्तार करके जेल में डालना ग़लत है. इस समय असम में लगभग 1900 लोग जेलों में बंद हैं जिनमे आधी शादीशुदा औरतें हैं. उनके साथ छोटे छोटे बच्चे भी हैं. इन जेलों की व्यवस्था नरक जैसी है.

6.2016 में असम में भाजपा की सरकार बनने पर विदेशी ट्रिब्यूनल में ज्यूडिशिएल अधिकारियों की जगह पांच साल की प्रैक्टिस वाले 30 वकीलों को नियुक्त किया गया है जिनमें कई का संबंध कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से है.

7.गुवाहाटी उच्च न्यायालय में विदेशी क़रार दिए गए नागरिकों के मामलों को कई वर्षों से एक ही जज उज्जल भुयां सुनते आ रहे हैं जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं. यह आश्चर्य की बात है कि इस बेंच पर रोटेशन से जज क्यों नहीं बदला गया. शिकायत होने पर अब 4 जुलाई को उन्हें हटा दिया गया है.

8. नागरिकता सिद्ध करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत सचिव द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र को भी सुबूत के तौर पर मान्यता देने की बात कही थी लेकिन एनआरसी में इसे वैध न मान कर अन्य सबूत मांगे गए.

9.कई नागरिकों ने शिकायत की कि उन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल में पेश होने का नोटिस या तो मिला ही नहीं या फिर बहुत देरी से मिला जिस कारण वे उपस्थित नहीं हो सके और उनके मामले का निस्तारण एक्स पार्टी हो गया.
BBC से साभार
—————-अभय ————-.
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असली मिल सकती है
====अभय===
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=======अभय=======
पहल करें ——पहिये का रुख बदलने का
मुश्किल है ————-नामुमकिन तो नही
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