#आरएसएस के “हिंदू राष्ट्र’ अभियान में प्रमुख खुफ़िया एजेंसी आईबी की भूमिका : देखें वीडियो

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SM Mushrif, former Inspector General of Police Maharashtra, addressing a public meeting in Malegaon on May 6, 2016. (ummid.com photo)

मैं महाराष्ट्र के जिला कोल्हापुर में एक कस्बे कागल का निवासी हूं . एक ऐसा कस्बा जो जिला मुख्यालय से निकट और राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने की जगह से अपने देहाती अंदाज के साथ नगरीय जीवन का एक हल्का सा रंग लिये हुए है.

सन 1960 व 1970 के दशकों में, जब मैं एक विद्यार्थी था, देश भर में और खास तौर से महाराष्ट्र साहित्य मध्य और उत्तरी राज्यों में सांप्रदायिक दंगों के समाचार लगातार आते रहते थे. जब राज्य के अधिकांश भाग संाप्रदायिक दंगो से झुलस रहे थे, कोल्हापुर उनसे बचा रहता था. कोल्हापुर राज्य के पूर्व महाराजा छत्रपति साहू की दूरदृष्टि, उदारता और उनकी प्र्रगतिशील सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक नीतियों की वजह से ये क्षेत्र शांति व सौहादर्‌र का दीप बना रहता. वही थे जिन्होंने सन 1902 में, देश के इतिहास में पहली बार धर्म, जाति और बिरादरी से ऊपर उठकर समाज के सभी पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया. अतः पूरे कोल्हापुर में वातावरण इतना शांतिमय और सौहादर्‌रपूर्ण रहा कि मेरी पीढ़ी के लोगों को सांप्रदायिक दंगों का ताप और उसके भयानक परिणाम का अहसास तक नही हुआ.

मैं सन्‌ 1976 में पुलिस सेवा में आया और सीधे उप अधीक्षक पुलिस के पद पर मेरी नियुक्ति हुई. थोड़ी सी अवधि में ही, सन्‌ 1981 सीनियारिटी के साथ आईपीएस मे ले लिया गया और सन 2005 में, जबकि मैं एक रेंज का पुलिस महानिरीक्षक था, अपनी इच्छा से मैने रिटायरमेंट ले लिया और उसके बाद स्वयं को सामाजिक कामों के लिए समर्पित कर दिया.

मैं सौभाग्यशाली रहा कि पुलिस सेवा के दौरान मुझे ज्यादातर प्रशासकीय पदों पर काम करने का अवसर मिला. जिन नगरों या जिलों में मैंने काम किया, उसमें से ज्यादातर सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील या अति संवेदनशील थे, इसलिए मुझे सांप्रदायिक समस्याओं को स्वंय देखने और समझने के काफी अवसर मिले.

मैं चूंकि सामाजिक दृष्टि से एक प्रगतिशील जिले कोल्हापुर से आया था, इसलिए जिन स्थानों पर मेरी नियुक्ति हुई, तनावपूर्ण सांप्रदायिक वातावरण और जन सामान्य को भड़का कर दंगे कराने की एक वर्ग की सुनियोजित कोशिशें शुरू-शुरू में मेरे लिए बड़ी हैरानी और परेशानी का कारण बनी रहीं. लेकिन समय के साथ-साथ मैंने बदले हुए सामाजिक वातावरण को समझ लिया और एक पेशागत पुलिस अधिकारी की हैसियत से परिस्थितियों से निपटने के रास्ते और तरीके निकाल लिये. यद्यपि एक मुस्लिम अधिकारी के लिए सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील वातावरण में काम करना बहुत कठिन होता था, लेकिन मैंने अपने प्रशासकीय तौर-तरीकों और समझ-बूझ के साथ परिस्थितियों को संभाला और तमाम जिम्मेदारियों में सफल रहा. और यही अनुभव था, जिसने मुझे इस विषय पर शोध-कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया.

एक पुलिस अधिकारी के पद पर अपने सेवाकाल के दौरान सांप्रदायिक हंगामों में आने वाले मामलों की, कानूनी बंदोबस्त के अनुसार छानबीन करने के अलावा मैनें उसका अध्ययन मध्यकालीन भारत के इतिहास की रोशनी में सामाजिक विज्ञान और भीड़ की मानसिकता के संदर्भ में भी किया. मैने यह बात नोट की कि हिंदू-मुस्लिम दंगे न तो दोनों संप्रदायों के बीच किसी वास्तविक भ्रम का नतीजा होते हैं और न ही अचानक या घटनात्मक कारणों से फूट पड़ने वाली उत्तेजना से होते हैं. बल्कि ये हिंसक घटनाएं उन ब्राह्मण्यवादी संगठनों व संस्थाओं की सोची-समझी और लगातार कोशिशों का नतीजा होती हैं, जो “जो हिंदू संगठन’ का मुखौटा लगाकर समाज में सांप्रदायिकता का जहर फैलाती रहती हैं.

मैने उन घटनाओं को मध्यकालीन इतिहास से जोड़ने की भी कोशिश की, लेकिन कोई तर्क संगत संबंध तालाश नही कर सका. हां, जब मैने सांप्रदायिक दंगों के इतिहास में जाकर देखने की कोशिश की और खासतौर से उन दंगों को जो बीसवीं सदी में हुए तो मैंने सन 1893 ई का साल निर्धारित कर सका, जहां से सांप्रदायिक दंगों का वह सिलसिला शुरू हुआ, जो पूरी बीसवीं सदी में बढ़ती हुई रफ्तार और मंशा के साथ चलता रहा और उसका अंजाम सन 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और सन 2002 के गुजरात-नरसंहार के रूप में सामने आया. इसे हम सांप्रदायिक का पहला चरण कह सकते हैं.

21 वीं सदी शुरू हुई तो देश भर में बम धमाकों का एक नया सिलसिला सामने आया. जिनकी रिपोर्टिंग देश की प्रमुख खुफिया एजेंसी (आईबी) के इशारों पर हुईः फिर इन बम धमाकों की जांच में निहित उद्देश्यों से आईबी का गैरजरूरी हस्तक्षेप; सन 2006 ई का नान्देड़ बम धमाका केस, जिनकी सच्चाई स्वतः ही सार्वजनिक हो गई; एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे द्वारा सन 2008 के मालेगांव बम धमाकों की बिल्कुल ईमानदराना और पारदर्शी जांच, जिससे आतंक फैलाने के एक राष्ट्रव्यापी आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ; मुंबई पर 26/11 का आतंकी हमला, जो आई बी द्वारा एक महत्वपूर्ण सूचना को जान बूझकर कर रोक लिये जाने का नतीजा था. उसके परिणाम स्वरूप मालेगांव मामले की जांच में रूकावट, एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की दर्दनाक और कायरतापूर्ण हत्या और उनकी जगह पर जल्दबाजी में तुरंत एक विवादास्पद पुलिस अधिकारी केपीएस रघुवंशी की नियुक्ति; मुंबई आतंकवादी हमले के दौरान सीएसटी कामा अस्पताल, रंग भवन लेन की घटनाओं की आईबी और एफबीआई द्वारा अत्यंत संदेहपूर्ण जांच, जिसमें मुंबई क्राइम ब्रांच का रोल मात्र एक कठपुतली जैसा रहा और इस तरह की दूसरी घटनाएं शामिल हैं.

मैनें अपनी किताब “करकरे के हत्यारे कौन?’, में उन सवालों के जवाब तलाश करने की कोशिश की है, जो सन्‌ 1893 ई के पहले बड़े हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों से लेकर 26 नवंबर 2008 के मुंबई पर आतंकी हमले तक की घटनाओं से खड़े हुए हैं. वे सवाल कुछ इस तरह हैं.

1. इसके बावजूद कि पूरे मध्यकालीन भारत में और उसके बाद के काल में भी ब्राह्मणों के संबंध मुसलमानों के साथ समान्यतः मधुर रहे हैं, फिर आखिर किस कारण से ब्राह्मण्यवादियों ने सन्‌ 1993 से जानबूझ कर मुस्लिम विरोधी वातावरण बनाकर हिंदू मुस्लिम दंगों को बढ़ावा देना शुरू किया?
2. मुल्क की प्रमुख खुफिया एजेंसी आईबी आखिर क्यों आरएसएस जैसे ब्राह्मण्यवादी संगठनों की घिनौनी सांप्रदायिक गतिविधियों से सरकार को अंधकार में रखती रही है, हालांकि ये संगठन देशभर में अपनी हजारों शाखाओं के माध्यम से मुसलमानों के विरुद्ध विष फैलाते हैं.
3. देशभर मे यद्यपि पिछले 60 साल से सांप्रदायिक दंगो का सिलसिला लगातार जारी है; फिर भी आखिर क्या कारण है कि आईबी ने सरकार को कभी समय रहते सही सूचना देकर और ईमानदारी के साथ अपनी सलाह देकर उनको कंट्रोल नही किया?
4. 21 वीं सदी के शुरू से ही आईबी ने क्यों अचानक “खुफिया सूचनाओं’ के नाम पर तथाकथित “मुस्लिम’ आतंकी संगठनों से प्रमुख व्यक्तियों, धार्मिक स्थानों और महत्वपूर्ण संस्थानों के लिए संभावित खतरे की अफ़वाहें फैलानी शुरू कर दी?
5. आईबी ने सरकार को अनेक ब्राह्मण्यवादी संगठनों द्वारा की जा रही तैयारियों से आखिर क्यों खबरदार नहीं किया? जैसे अपने कैडर्स (स्वयंसेवकों) को आतंकवाद की ट्रेनिंग देना, हथियार और गोला बारूद जमा करना, बम बनाना, यहां तक कि उनके धमाके भी करना आदि?
6. आईबी ने अभिनव भारत की गतिविधियों और उसके “हिंदू राष्ट्र’ बनाने की योजना से सरकार को अंधेरे में क्यों रखा?
7. आईबी लगभग हर बम धमाके और दहशतगर्दी के हर मामले की जांच में अपने आप ही क्यों गैर जरूरी हस्तक्षेप करती है, जबकि उसकी असल जिम्मेदारी केवल खुफिया जानकारियां हासिल करना है?
8. मुंबई पर 26/11 के आतंकी हमले के बारे में आईबी में अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी को क्यों रोके रखा और मुंबई पुलिस व पश्चिमी जलसेना कमान को इसकी जानकारी क्यों नही दी, जो कि इस मामले से सबसे ज्यादा संबंधित थे,
9. आईबी ने उन 35 मोबाईल फोनों के नंबरों को, जिनके बारे में शक है कि 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के दौरान आतंकियों के उपयोग में थे, अपनी निगरानी में क्यों नही रखा, जबकि हमले से पांच दिन पहले ही आई बी को ये नंबर उपलब्ध करा दिए गए थे?
10. एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के कत्ल के चंद घंटों के अंदर अंदर आईबी ने उनके स्थान पर के.पी.एस. रघुवंशी जैसे विवादित और सांप्रदायिक अधिकारी की नियुक्ति क्यों करवाई?

आईबी ने क्यों मुंबई हमले के केस को शुरू से ही व्यवहारतः अपने हाथ में ले लिया और क्यों एक विदेशी एजेंसी एफबीआई को हमारे अंातरिक मामलों में इतना अधिक हस्तक्षेप करने दिया?

मेरी खोज मुझे बताती है कि ये सारे सवाल एक दूसरे से संबंधित हैं और आपस में जुड़े हुए हैं. इस खेल के असल खिलाड़ी ब्राह्मण्यवादी तत्व है, जिनमें ब्राह्मणों की एक मामूली सी संख्या के अलावा कुछ थोड़े से ऐसे गैर ब्राह्मण भी शामिल है, जिनकी बे्रनवाशिंग की गयी है. इसी के साथ आईबी जिसमें ब्राह्मण्यवादी तत्वों का दबदबा है और मीडिया का एक वर्ग, जिस पर ब्राह्मण्यवादियों का कंट्रोल है, शामिल है. उनका असल मकसद भारतीय समाज पर ब्राह्मण्यवादियों का पूरा नियंत्रण क़ायम करना है. शुरू में उनका निशाना आम हिंदुओं को दंगों में लिप्त करके सामाजिक और धार्मिक नियंत्रण प्राप्त करना था. लेकिन अपने मुस्लिम विरोधी अभियान में आशा से अधिक सफलता ने उसके अंदर राजसत्ता हथियाने की लालसा भी पैदा कर दी. इस निशाने को हासिल करने के लिए उन्होंने रामजन्म भूमि जैसे भावनात्मक मुद्दे खड़े करके सांप्रदायिक भावनाओं को और अधिक भड़काया. आखिरकार बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद वे राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने में सफल हो गए जिसको अजादी के बाद के जमाने में उनकी सांप्रदायिक राजनीति का चरम बिंदु कहा जा सकता है.

इस प्रकार सत्ता का स्वाद लग जाने के बाद ब्राह्मण्यवादियों की उमंगों में और उफान आया. लेकिन कटटरपंथी, ब्राह्मण्यवादी राष्ट्र स्थापित करने की साजिश रचना शुरू कर दी. उनकी योजना थी देश भर में बड़ी संख्या में बम धमाके कराना और उनका आरोप आईबी में मौजूद अपने हमदर्दों की मदद से मुसलमानों पर लगाना, जिसके बाद मीडिया का एक वर्ग आराजकता की स्थिति पैदा करे, जिससे उनके लिए देश पर कब्जा करने का मार्ग प्रशस्त हो जाए.
लेकिन देश के सौभाग्य और खुद उनके दुर्भाग्य से उनका सपना इस वजह से पूरा होने से रह गया कि मालेगांव बम धमाके की जांच के दौरान महाराष्ट्र पुलिस के आतंक विरोधी दस्ते (एटीएस) ने हेमंत करकरे के नेतृव मेंे उस साजिश का भंडाफोड़ कर दिया. अभी जबकि करकरे की जांच अधूरी थी, मुंबई में 26/11 के इस आतंकी हमले को आसानी से रोका जा सकता था, लेकिन आईबी ने जानबूझ कर एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुराग को, जो उसको भरोसेमंद सूत्रों से मिला था, रोके रखा. यह शक की सूचना जान बूझ कर रोकी गई थी, करकरे के कत्ल के चंद घंटों के अंदर अंदर ही एक अत्यंत विवादित और सांप्रदायिक पुलिस अधिकारी के.पी.एस.रघुवंशी को उनके स्थान पर एटीएस का प्रमुख नियुक्त किये जाने से पक्का हो गया, जिसमें आईबी ने बहुत ज्यादा रूचि ली, जिसकी अपनी भूमिका मुंबई हमले के छत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनस (विक्टोरिया रेलवे जंक्शन), कामा अस्पताल और रंग भवन गली वाले भाग की घटनाओं में सबसे ज्यादा संदिग्ध है. अतः इस चीज ने रघुवंशी को मालेगांव 2008 बम धमाका मामले की जांच हाथ में लेने और जल्दबाजी में निपटा देने का मौका दे दिया. मैनें अपनी किताब “करकरे के हत्यारे कौन’ में उन घटनाओं को उनके घटित होने के क्रम में बयान किया है और समाचार पत्रों की रिपोर्टों व दूसरे स्रोतों से मिली सूचनाओं के आधार पर उनका विश्लेषण करके कुछ नतीजे निकाले हैं. और इस आधार पर जो नजरिया पेश किया है, वह इस बात से और ज्यादा साबित हो गया है कि देश भर में हर धमाके के बाद सैकड़ों मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी के बावजूद धमाकों का जो सिलसिला रुकने में नहीं आ रहा था, वह सन्‌ 2008 के मालेगांव आतंकी हमले के मूल अपराधियों (साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित और महंत दयानंद पांडे आदि) की गिरफ्तारी के बाद लगभग पूरी तरह थम गया है.

लेखक महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व महानिरीक्षक हैं

-एस एम मुशीरफ

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