इनको भी तो देखो,,,इनकी तो न दिवाली होती, न कोई होली

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डॉ.सरला सिंह
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इनको भी तो देखो

इनकी तो ना दिवाली होती,
ना कोई होली ही है होती ।
इनकी तो होलीऔ दीवाली,
बस दो जून की रोटी होती।
कपड़ों में होता पैबन्द जड़ा,
पैरों में चप्पल तक ना होती।
भरपेट अगर भोजन पा जाते,
चन्दा सा चमक जाता चेहरा।
पा जाते गर उतरन फेंका तो,
बस बड़ी नियामत होती है ।
लाखों के कपड़े-गहने पहने,
तुम तो कितना इतराते हो?
मंहगी गाड़ी में तो कुत्ते तेरे,
सड़कों पर घूमा हैं करते ।
आठ कमरे वाले बंगले में,
कुल चार लोग भी ना होते।
दौलत दी प्रभु ने इतनी गर
कुछ काम भले का कर दो।
ऐसे किस्मत के मारों की ,
किस्मत को चमका डालो।
इनकी भी चाहत है ये भी ,
विद्या के मन्दिर मे जायें ।
सुन्दर सुन्दर रंगीनकिताबें,
ये भी तो पढ़ना चाहते हैं ।
रोटी के इस मकड़जाल में,
ये ना अभी फँसना चाहें ।
बाकी बच्चों जैसे ही ये भी,
चाहें अपने अपने त्योहार ।
खेल खिलौने ये भी चाहते,
इन पर जाने क्या अभिशाप।