#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 34

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चयन का अधिकार मूल अधिकारों में से है, इसे औपचारिकता प्रदान करना, वास्तव में राजनीतिक आज़ादी को औपचारिकता प्रदान करना है, जिसे चयन की आज़ादी या मताधिकार की आज़ादी कहा जाता है।

यह अधिकार दो स्तर पर राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना और शासक के चयन के समय इस्तेमाल होता है।

क़ुराने मजीद की विभिन्न आयतों में राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना का उल्लेख किया गया है। इन आयतों में इस महत्वपूर्ण बिंदु का उल्लेख किया गया है कि शासन और सत्ता वास्तव में ईश्वर से विशेष है और ईश्वर इसे अपने प्रतिनिधि के रूप में अपने किसी बंदे को सौंपता है। वास्तव में इन आयतों में सत्ता के अधिकार को ईश्वर से विशेष माना गया है और उसकी वैधता का आधार भी यही बताया गया है। उदाहरण स्वरूप, क़ुरान कहता है कि वह तुम्हें इस धरती पर अपना उत्तराधिकारी बनाता है, इसलिए जो कोई भी उसका अविज्ञा करेगा, उसकी अवज्ञा उसी को नुक़सान पहुंचाएगी। इस प्रकार, इंसान ज़मीन पर ईश्वर का उत्तराधिकारी है और ईश्वर ने इंसानों को यह स्थान प्रदान किया है।

आयतों के दूसरे समूह में शासन किस प्रकार का होना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है। इन आयतों में शासन को ईश्वरीय अमानत बताया गया है। क़ुराने मजीद में उल्लेख है कि हमने अमानत को आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों को सौंपना चाहा, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने में असमर्थता जताई, वे इस बात से भयभीत थे, लेकिन इंसान ने उसे स्वीकार कर लिया, वास्तव में वह बहुत अत्याचारी और नादान था।

मोटे तौर पर इस प्रकार इंसान, ईश्वर की अमानत का अमीन हो गया। एक अन्य आयत में ईश्वर इंसानों से कहता है कि इस अमानत को उन लोगों को सौंप दें, जो इसके हक़दार और योग्य हैं। ईश्वर तुम्हें आदेश देता है कि अमानत को उसके हक़दारों को सौंप दो और जब लोगों के बीच फ़ैसला करने लगो तो न्याय से काम लो।

इस आयत में लोगों को अमीन बताने के साथ उनसे कहा गया है कि ईश्वर की अमानत को उसके हक़दारों को सौंप दो। इस प्रकार, यहां यह सवाल उठता है कि क़ुरान की नज़र में ऐसे कौन लोग हैं, जो ईश्वरीय अमानत या शासन के योग्य हैं और उन्हें यह अमानत सौंपी जानी चाहिए? इस सवाल का जवाब, इसके बाद वाली आयत से प्राप्त हो जाता है। सूरए निसा की 59वीं आयत में उल्लेख है कि हे ईमान लाने वालो। ईश्वर के आदेश का आज्ञापालन करो और उसके दूत और उसके उत्तराधिकारियों का अनुसरण करो।

इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके उत्तराधिकारियों को ईश्वरीय अमानत या शासन के लिए योग्य बताया गया है और ईमान लाने वालों से कहा गया है कि वह उनका अनुसरण करें। एक अन्य आयत में भी विलायत शब्द का इस्तेमाल हुआ है और कहा गया है कि केवल ईश्वर तुम्हारा वली अर्थात स्वामी है और ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम और वे लोग जो ईमान लाए हैं। वही जो नमाज़ की स्थापना करते हैं और नमाज़ में रुकू की स्थिति में दान करते हैं।

इस आयत में भी पहले वाली आयत की भांति ईश्वरीय अमानत के योग्य लोगों की ओर संकेत किया गया है और इस बात पर बल दिया गया है कि यद्यपि समस्त मानव ज़मीन पर ईश्वर के उत्तराधिकारी और उसके अमानतदार हैं, लेकिन उन्हें चाहिए कि इस अमानत को उसके हक़दारों और उसके योग्य लोगों को सौंप दें। इस आधार पर लोगों को चयन का अधिकार है, और उन्हें चाहिए कि ऐसे लोगों का चयन करें, जो इसके लिए योग्य हैं। शहीद मतहरी इस आयत की व्याख्या करते हुए कहते हैं, क़ुरान की नज़र में समाज का शासक और नेता, समाज का अमीन और रक्षक होता है और वह शासन को अमानत समझता है, जिसे अदा करना होता है।

तीसरे श्रेणी में वह आयतें आती हैं, जो शासन की स्थापना का उल्लेख करती हैं। जैसा कि क़ुरान के निकट शासन, लोगों के पास ईश्वर की अमानत है और लोगों की ज़िम्मेदारी है कि वे उसे उसके योग्य लोगों तक पहुंचा दें। इसे सौंपने के लिए उचित तंत्र की ज़रूरत होती है। इस तंत्र का समाज की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार होना एक महत्वपूर्ण विशेषता है, इसीलिए क़ुरान इस अमानत को सौंपने के लिए बैयत या राजनीतिक आज्ञापालन का मार्ग सुझाता है। क़ुरान की एक आयत में हैः ईश्वर ने ईमान लाने वालों से जब उन्होंने एक वृक्ष के नीचे तेरी बैयत की, प्रसन्न हो गया, उनके दिलों में जो छुपा हुआ था, ईश्वर उसे जानता था। इसीलिए उसने उन्हें शांति प्रदान की और सफलता को उनके निकट कर दिया।

इस ऐतिहासिक बैयत में मदीने के प्रतिनिधियों ने मदीना प्रवेश के बाद, पैग़म्बरे इस्लाम के समर्थन की घोषणा की, वास्तव में यह बैयत ऐसा तंत्र है कि जिसके आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) आधिकारिक रूप से मदीने वालों के नेता बन गए। निःसंदेह, ईश्वर की प्रसन्नता बैयत की वैधता की दलील है। दूसरी आयत में कहा गया है कि जो लोग तुम्हारी बैयत करते हैं, वे ईश्वर की बैयत करते हैं और ईश्वर की शक्ति सबसे अधिक है। इसलिए जो कोई अपनी प्रतिबद्धता को तोड़ेगा, उसे उसका नुक़सान होगा और जो कोई ईश्वर से किए जाने वाले वादे को पूरा करेगा, शीघ्र ही उसे बहुत ही महत्वपूर्ण इनाम दिया जाएगा।

इस आयत में बैयत का पालन करने और उसे न तोड़ने पर बल दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम की बैयत, ईश्वर की बैयत करने के समान है, जिसका वैध होना स्पष्ट है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने विभिन्न अवसरों पर बैयत का रणनीतिक रूप में इस्तेमाल किया, जैसे कि मदीने में रहने वालों के बीच संधि और मक्के से पलायन करके मदीने में बसने वालों और मदीने के मूल निवासियों के बीच भाईचारे की संधि। बैयत एक ऐसा तंत्र है, जिसमें बैयत करने वाले पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अनुसरण और समर्थन के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, दूसरी ओर पैग़म्बर भी शासक के रूप में उनके अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

इन तीन प्रकार की आयतों की समीक्षा से यह नतीजा निकाला जा सकता है कि क़ुराने मजीद में धरती पर इंसान के शासन का आधार, ईश्वरीय प्रतिनिधित्व है, शासन ईश्वरीय अमानत के रूप में लोगों के पास है, उनकी ज़िम्मेदारी है कि इस अमानत को बैयत द्वारा उसके लिए योग्य लोगों तक पहुंचा दें। इस प्रकार, क़ुरान के अनुसार, लोगों को चयन का अधिकार है, वे अपने चयन से सत्ता को ईश्वरीय अमानत के रूप में उसके हक़दार तक पहुंचा दें। इस आधार पर, कहा जा सकता है कि क़ुरान चयन के अधिकार को औपचारिकता प्रदान करके, इस प्रकार की राजनीतिक आज़ादी को वैधता प्रदान करता है।

फ़ैसला लेने और नियम बनाने के स्तर पर भी चयन के अधिकार के बारे में क़ुरान के दृष्टिकोण की राजनीतिक आज़ादी के रूप में समीक्षा की जा सकती है। शासन की स्थापना के बाद, नियम बनाना और फ़ैसले लेना एक महत्वपूर्ण कार्य है, जिससे पता चलता है कि नियम बनाने वालों को सत्ता का अधिकार है। क़ुराने मजीद में लोगों के चयन के अधिकार को औपचारिकता प्रदान करने के अलावा, शासन की स्थापना और नियम बनाने में भी उनके अधिकार को औपचारिकता प्रदान की गई है। इस अधिकार को क़ुरान ने सलाह के रूप में पेश किया है। क़ुरान ईमान लाने वालों को सलाह मश्वरे के लिए प्रेरित करता है। क़ुरान में कहा गया है कि जिन लोगों ने ईश्वर के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है और नमाज़ स्थापित करते हैं और अपने कार्यों को आपस में सलाह करके अंजाम देते हैं और जो रिज़्क़ हमने उन्हें दिया है उसे ख़र्च करते हैं।

सलाह लेने और सलाह देने का महत्व इतना अधिक है कि क़ुरान इस विषय को नमाज़ और दान के साथ बयान करता है और इसे ईमान लाने वालों की विशेषता बताता है। एक अन्य आयत जो मदीने में और पैग़म्बरे इस्लाम (स) द्वारा इस्लामी शासन की स्थापना के बाद नाज़िल हुई है, पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है, ईश्वरीय अनुकंपा से लोगों के साथ तुमने विनम्रतापूर्ण रवैया अपनाया, अगर सख़्ती करते तो वे तुम्हारे पास से तितर बितर हो जाते। इसलिए उनको क्षमा कर दो और उनके लिए ईश्वर से क्षमा याचना करो और अपने कार्यों में उनसे सलाह लो। और जब फ़ैसला कर लो तो ईश्वर पर भरोसा करो, इसलिए कि ईश्वर भरोसा करने वालों को पसंद करता है।

इस आयत में जो ओहद युद्ध में नाज़िल हुई है, पैग़म्बरे इस्लाम से कहा गया है कि लोगों से सलाह लें। इस प्रकार, इस्लामी शासन में सलाहकारों के साथ सहयोग करने को ज़रूरी बताया गया है।

एक दूसरी आयत में, सबा की रानी या मलकए सबा की सलाह लेने की परम्परा की ओर संकेत किया गया है। आयत में उल्लेख है कि हे बुज़ुर्गों इस अहम कार्य के बारे में मुझे अपनी सलाह दो, इसलिए कि मैं कोई भी अहम काम तुम्हारी सलाह के बिना नहीं करती हूं। बहरहाल क़ुराने मजीद द्वारा सलाह और मश्वरे को औपचारिकता प्रदान करके लोगों के चयन के अधिकार को औपचारिकता प्रदान की गई है।