#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 35

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इस्लामी व्यवस्था में लोगों की ज़िम्मेदारी, सरकार की ज़िम्मेदारी से अलग नहीं है।

अगर सरकारें समाज का प्रबंधन संभालती हैं, लोगों को उसका लाभ पहुंचता है और अधिकारियों के अच्छे और बुरे कामों से वे सीधे तौर से प्रभावित होते हैं। इसलिए तार्किक रूप से यह सब की ज़िम्मेदारी है कि वे शासकों के कामों पर नज़र रखें, ताकि उन्हें न्याय के रास्ते से भटकने से रोका जा सके।

सरकार और अधिकारियों की गतिविधियों की निगरानी का अधिकार, इंसानों के मूल सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों में से है। समाज में इन अधिकारों को स्वीकार करना, आलोचना की आज़ादी को स्वीकार करना है, जो राजनीतिक आज़ादी का एक महत्वपूर्ण भाग है। क़ुराने मजीद ने इस अधिकार को भी औपचारिकता प्रदान की है। क़ुराने मजीद में निगरानी के अधिकार को अच्छाई का निमंत्रण देने और बुराई से रोकने के रूप में और सत्य की खोज एवं न्याय की मांग के रूप में बयान किया है।

क़ुरान में सार्वजनिक निगरानी को भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने के रूप में पेश किया गया है। क़ुरान ने भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने को सार्वजनिक निगरानी के रूप में न केवल, लोगों के अधिकारों में बल्कि उनके लिए अनिवार्य चीज़ों में गिनवाया है। क़ुरान ने भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने के ज़रिए लोगों को भले कामों के लिए जहां प्रेरित किया है, वहीं उसके दुष्परिणामों के कारण इसका त्याग करने का आदेश दिया है। जैसा कि लुक़मान सूरे की 17वीं आयत में लुक़मान अपने बेटे से कहते हैः मेरे बेटे नमाज़ की स्थापना करो और लोगों से भलाई का आहवान करो और उन्हें बुराई से रोको, और तुम्हें जो दुख और कठिनाईयां हैं, उनके मुक़बाले में डट जाओ, क्योंकि यही बुनियादी कामों में से है।

क़ुरान के अनुसार, सार्वजनिक निगरानी का इतना अधिक महत्व है कि इसके कारण इस्लामी समुदाय को सर्वश्रेष्ठ समुदाय कहा गया है। तुम बेहतरीन समुदाय हो कि जो लोगों के सुधार के लिए उठे हो, भलाई का निमंत्रण देते हो और बुराई से रोकते हो और ईश्वर पर ईमान रखते हो।

एक अन्य आयत में भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने के रूप में निगरानी को अनिवार्य बताया गया है। इससे पता चलता है कि यद्यपि यह सार्वजनिक निगरानी है, लेकिन सामूहिक रूप से कुछ विशिष्ट लोगों द्वारा इस पर अमल किया जाना चाहिए। तुम में से एक ऐसा गुट होना चाहिए कि जो भलाई का आहवान करे और बुराई से रोके, यही लोग सफल हैं। आख़िर में एक अन्य आयत की ओर संकेत किया जा सकता है, जो भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने को सामाजिक और राजनीतिक जीवन और सरकार से जोड़ती है। ईमान लाने वाले वे लोग हैं कि अगर हम उन्हें धरती पर शक्ति प्रदान करें तो वे नमाज़ की स्थापना करते हैं, धर्म द्वारा निर्धारित दान देते हैं और भलाई का आहवान करते हैं और बुराई से रोकते हैं, इन कामों का फल ईश्वर के पास है।

इस आयत में नमाज़ को इबादत का ध्रुव, दान को आर्थिक ध्रुव और भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने को सामाजिक ध्रुव बताया गया है, जिससे इस्लाम में भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने का महत्व उजागर होता है।

इस बारे में अनेक आयतों में भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने की सिफ़ारिश की गई है। इन आयतों के साथ ही क़ुरान की अन्य आयतों में इस कर्तव्य के प्रतिकूल परिणामों की ओर से भी सचेत किया गया है। जैसा कि उल्लेख है कि क्यों तुमसे पहले वाली शताब्दियों और समुदायों में शक्तिशाली विद्वान नहीं थे, जो धरती पर बुराई फैलने से रोकते, हां बहुत कम ऐसे लोग थे, जिन्हें हमने मुक्ति प्रदान की और जो लोग अत्याचार करते थे वे इच्छाओं का अनुसरण करते थे और वे पापी थे और वे नष्ट हो गए।

इस आयत में उल्लेख किया गया है कि अगर समाज में भ्रष्टाचार से लड़ने वाले योग्य विद्वानों का अभाव है तो वह नष्ट हो जाता है, इस प्रकार यह आयत ऐसे महत्वपूर्ण बिंदु की ओर संकेत करती है कि चुप्पी, निष्क्रियता और निगरानी का न होना समाज के विनाश का कारण हैं। इस आधार पर कुछ अन्य आयतों में निगरानी न करने वालों को बुरा भला कहा गया है और उनकी निंदा की गई है। बनी इस्राईल में से जो लोग काफ़िर हो गए, दाऊद और ईसा इब्ने मरयम ने उन्हें श्राप दिया। इसलिए कि वे पाप करते थे और भ्रष्ट थे। वह एक दूसरे को बुरे कार्यों से रोकते नहीं थे। वे कितने बुरे काम करने वाले थे।

जिन आयतों का उल्लेख किया गया है, अगर इन पर ध्यान दिया जाए तो भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने में निगरानी का महत्व उजागर होता है। क़ुराने मजीद की दृष्टि से अगर निगरानी की यह प्रक्रिया, समाज में अच्छी तरह से लागू की जाए तो उस समाज में भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि क़ुराने मजीद ने निगरानी के अधिकार को औपचारिकता प्रदान की है, परिणाम स्वरूप एक अन्य प्रकार की राजनीतिक आज़ादी क़ुरान में पायी जाती है। हालांकि इन आयतों द्वारा निगरानी के अधिकार पर तर्क का आधार पहले तो पूर्ण भलाई के निमंत्रण और बुराई से रोकने के सिद्धांत पर है, इसलिए यह केवल धार्मिक मामलों से ही संबंधित नहीं है। दूसरे ऐसा नहीं है कि भलाई का निमंत्रण और बुराई से रोकना अगर एक ज़िम्मेदारी तो वह अधिकार नहीं है। दूसरे शब्दों में भलाई का निमंत्रण और बुराई से रोकना एक धार्मिक कर्तव्य है, जिसके परिणाम स्वरूप ईश्वर ने सार्वजनिक निगरानी के अधिकार को औपचारिकता दी है।

क़ुरान की कुछ आयतों में अभिव्यक्ति के अधिकार पर सत्य की खोज की प्रष्ठभूमि में बल दिया गया है। उदाहरण स्वरूप, उन लोगों को शुभ सूचना दे दो, जिन्होंने बातें सुनीं, लेकिन उनमें से जो बेहतरीन थीं, उनका पालन किया। वे ऐसे लोग हैं कि ईश्वर ने उनका मार्गदर्शन किया है और वे बुद्धिमानी लोग हैं।

इस आयत में उन लोगों को शुभ सूचना दी गई है, जो बातों को सुनकर उनमें से बेहतरीन का चयन कर लेते हैं। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में सर्वश्रेष्ठ बातों के चयन का विकल्प संभव होगा, जब लोगों को अपनी बात कहने की अनुमति होगी। इसलिए इस आयत में अभिव्यक्ति की आज़ादी की ज़रूरत को पेश किया गया है। क़ुरान की एक अन्य आयत में उल्लेख है कि अपने पालनहार के मार्ग की ओर अच्छे उपदेश द्वारा आमंत्रित करो और उनके साथ विनम्रतापूर्वक वाद विवाद करो।

इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम (स) को अपने विरोधियों से बातचीत के लिए तीन शैलियां बताई गई हैं। पहली शैली बुद्धिमत्ता की शैली है, दूसरी उपदेश देने और तीसरी तार्किक वाद विवाद की। इन तीनों ही शैलियों में पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने विरोधियों को अभिव्यक्ती का अधिकार और आज़ादी प्रदान करते हैं। दूसरे शब्दों में विरोधियों के प्रति इन तीन शैलियों का अपनाना, वास्तव में उनके अभिव्यक्ति के अधिकार को स्वीकार करना है।

एक अन्य आयत में भी अभिव्यक्ति की आज़ादी को सत्य की खोज के रूप में औपचारिकता प्रदान की गई है। अगर अनेकेश्वरवादियों में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो उसे शरण दे दो, ताकि वह ईश्वर की बातों को सुने, उसके बाद उसे उसके स्थान पर पहुंचा दो, यह इसलिए है कि वे लोग नादान लोग हैं।

इस आयत में भी अभिव्यक्ति की अनुमति दी गई है। उन लोगों को अनुमति दी गई है कि वे इस्लामी सीमाओं में प्रवेश करें, अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत करें और ईश्वर की बातें सुनें और सत्य के मार्ग पर अग्रसर हो जायें। इस आयत में और अन्य आयतों में विचार करने से यह बुनियादी बिंदु स्पष्ट होता है कि क़ुराने मजीद विरोधियों और यहां तक कि अनेकेश्वरवादियों के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी को औपचारिकता प्रदान करता है, इसलिए मुसलमानों के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी को वरीयता प्राप्त होना, स्पष्ट है।

सत्य की प्राप्ति के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी के अलावा, क़ुराने मजीद में न्याय के लिए भी अभिव्यक्ति की आज़ादी को पेश किया गया है। क़ुराने मजीद के निकट, मुक़दमे की कार्यवाही में खुले आम लोगों के ग़लत आचरण को बयान करना जायज़ है। ईश्वर को पसंद नहीं है कि खुले आम किसी की बुराई की जाए, लेकिन पीड़ित व्यक्ति ऐसा कर सकता है, और ईश्वर सबकी बातों को सुनता है और उनसे अवगत है। इन आयतों के दृष्टिगत, इस परिणाम की ओर संकेत किया जा सकता है कि सत्य की खोज और अत्याचारों के रहस्योद्घाटन के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी को क़ुरान ने औपचारिकता प्रदान की है।