#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 36

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सामूहिक आजादी भी इंसान के बुनियादी अधिकारों में है।

समाज में रहने वाले लोग एक दूसरे से संपर्क और समानताओं के कारण एक साथ जमा होते हैं तथा भौतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए सामूहिक जीवन की घोषणा करते हैं। यह सामूहिक अस्तित्व एक सच्चाई है और समाज इसे मान्यता देने पर बाध्य होता है। दूसरी ओर सामाजिक रुजहान समान विचार और समान आस्था के लोगों को एक जगह पर केन्द्रित कर देता है तथा अलग अलग वैचारिक रुजहानों, आस्थाओं, धर्मों और पेशों के अनुसर अलग अलग दल और संगठन बन जाते हैं। यह संगठन और दल जो समान विचारधारा के आधार पर अस्तित्व में आते हैं समाज के भीतर दो मैदानों में और दो रूपों में अपनी गतिविधियां करते हैं। एक तो उनके भीतर प्राकृतिक रूप से मौजूद क्षमताएं विकसित होती हैं और इससे समाज संवरता है दूसरे यह कि इस प्रकार के संगठन जनता तथा शासन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। इस तरह प्रत्येक व्यक्ति की सीमित शक्ति अन्य व्यक्तियों की शक्ति से मिलकर एक शक्ति समूह बन जाती है और आम जनमानस को देश के संचालन में भागीदार बनाती है।

दल और समूह के रूप में काम करने का अधिकार भी राजनैतिक और नागरिक अधिकार है जिसे अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज़ों में मान्यता दी गई है और इस पर विशेष रूप से बल भी दिया जाता है। 20 सूत्रीय अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र में कहा गया है कि हर किसी को अधिकार है कि शांतिपूर्ण संगठन और दल का गठन करे। अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक व नागरिक अधिकार कन्वेन्शन के 22वें अनुच्छेद में भी कहा गया है कि हरेक को दूसरों के साथ एकत्रित होने और युनियन या सेंडिका का गठन करने या उसकी सदस्यता ग्रहण करने का अधिकार है। इस अधिकार को किसी भी तरह सीमित नहीं किया जा सकता। इसे केवल उसी स्थिति में सीमित किया जा सकता है जब इससे राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता को नुक़सान पहुंच रहा हो और इस संबंध में कुछ क़ानून बनाए गए हों।

इस्लाम एक सामाजिक धर्म है। इस धर्म ने पैग़म्बरों को इंसानों के बीच भेजे जाने का लक्ष्य इंसाफ़ और समानता की स्थापना बताया है। इस्लाम ने क़ुरआन में अनेक स्थानों पर लोगों को संबोधित किया है। क़ुरआन ने व्यक्तिगत रूप से इंसानों को संबोधित किया है लेकिन साथ ही समूहों और जातियों को भी सामूहिक रूप से संबोधित किया है। इन समूहों और जातियों को नागरिक संस्था का नाम दिया जा सकता है। क़ुरआन में समूह के लिए हिज़्ब का शब्द प्रयोग किया गया है जिसमें यह तात्पर्य है कि विचार, लक्ष्य और आस्था के आधार पर किसी समूह का गठन किया जाए। क़ुरआन की जिन आयतों में समूह के लिए हिज़्ब का शब्द प्रयोग किया गया है उन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है।

एक तो वह आयतें हैं कि जिनमें समान आस्था और विचार रखने वालों के लिए हिज़्ब का शब्द प्रयोग किया गया है और उनकी प्रशंसा की गई हैं। इन आयतों में इस समूह के लिए हिज़्बुल्लाह का शब्द प्रयोग हुआ है। जैसे कि सूरए मुजादेला की आयत नंबर 22 में ईश्वर ने कहा है कि कोई जाति ऐसी नहीं पाओगे जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखती हो वह ईश्वर तथा उसके पैग़म्बरे के दुशमनों से दोस्ती करे। चाहे यह दुशमन उनके भाई और रिश्तेदार ही क्यों न हों। यह हिज़्बुल्ला अर्थात ईश्वर कागुट है और हिज़्बुल्लाह मोक्ष प्राप्त करने वाला है।

इस आयत में किसी समूह के ईश्वर करगुट होने के दो मानक हैं। एक है ईश्वर और प्रलय पर ईमान तथा इसे व्यक्तिगत व सामूहिक हितों पर प्राथमिकता देना। क़ुरआन की दृष्टि में हिज़्बुल्लाह वह समूह है जिसमें शामिल लोग ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखता हो और दूसरे यह कि रिश्तेदारी और व्यक्तिगत हित उनके ईमान को कभी भी प्रभावित नहीं करते। इस आयत के अनुसार वांछित समूह वह है जिसका आधार ईमान पर हो और कोई भी चीज़ यहां तक कि क़रीबी रिश्तेदारों की मोहब्बत भी इस आधार को प्रभावित नहीं कर सकती।

एक अन्य आयत में क़ुरआन कहता है कि तुम्हारा स्वामी ईश्वर उसके पैग़म्बर और वह हैं जो ईमान लाए, वही जो नमाज़ क़ायम करते हैं और रुकू की हालत में ज़कात देते हैं। जो लोग ईश्वर, उसके पैग़म्बरे और ईमान लाने वालों को स्वामी मानते हैं वह सफल हैं हिज़्बुल्लाह तो विजयी है। इस आयत में क़ुरआन की दृष्टि से किसी भी संगठन और समूह के गठन का दूसरा मापदंड भी है और वह है ईश्वर, पैग़म्बर तथा कुछ निर्धारित लोगों को अपना स्वामी मानना। इस आस्था का विशेष रूप से संबंध राजनैतिक मैदान और राजनैतिक जीवन से है। क़ुरआन की दृष्टि से अच्छा समूह और संगठन वह है जो ईश्वरीय वर्चस्व पर आस्था रखे और इसी आस्था के आधार पर वह पैग़म्बर तथा ईश्वरीय शासकों को अपना स्वामी माने और राजनैतिक गतिविधियों में इस आस्था को बुनियाद माने।

पहली क़िस्म की आयतों के अनुसार किसी भी दल और समूह के गठन के तीन मापदंड और आधार हो सकते हैं। ईमान, ईश्वरीय स्वामित्व तथा इन दोनों बातों को व्यक्तिगत और दलगत हितों पर प्राथमिकता देना। यदि समूह और संगठन का आधार यह हो तो क़ुरआन इसे अच्छा संगठन मानता है और इसके दायरे में रहकर गतिविधियां करने को सफलता और कल्याण का रास्ता समझता है।

दूसरी कुछ आयतें ऐसी हैं जिनमें हिज़्ब का शब्द बुरे समूह और संगठन के लिए प्रयोग किया गया है। इन आयतों से तो यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि क़ुरआन की दृष्टि में अच्छा संगठन और समूह किस तरह बनाया जाता है लेकिन आयतों में जिन चीज़ों की बुराई की गई है उनके विपरीत चीज़ों के आधार पर संगठन बनाने की बात समझ में आती है। अनेक आयतों में हिज़्ब का शब्द इस अर्थ में प्रयोग किया गया है और कुछ आयतों में इसे हिज़्बुश्शैतान अर्थात शैतान का समूह कहा गया है। यह उन लोगों का समूह है जिन पर शैतान सवार हो गया है और उसने उनके दिलों से ईश्वर की याद मिटा दी है क़ुरआन के अनुसार यह शैतान का समूह है और शैतान का समूह हमेशा घाटा उठाने वाला होता है।

इन आयतों में इस बात पर विशेष रूप से बल दिया गया है कि इस समूह के लोगों पर शैतान सवार है। इस तरह वह दिल जिसमें ईश्वर के स्मरण को स्थान न दिया जाए, शैतान तथा शैतानी इच्छाओं के अधीन रहकर काम करता है। यह वांछित संगठन नहीं हो सकता। इस प्रकार के संगठनों को शैतानी संगठन कहा जा सकता है। वांछित समूह और दल के मुक़ाबले में वह संगठन है जिस पर शैतान सवार हो।

इसी तरह एक अन्य आयत में शैतान के कड़वे अंजाम की ओर संकेत करते हुए इस समूह से दूर रहने पर ज़ोर दिया गया है। सूरए फ़ातिर की आयत संख्या छह में ईश्वर कहता है कि निश्चित रूप से शैतान तुम्हारा दुशमन है तो उसे दुशमन समझो, वह अपने समूह के लोगों को नरक की आग के निवासी बनने की दावत देता है।

कुछ अन्य आयतों में सत्य के मार्ग से हट जाने वाले समूहों के लिए भी हिज़्ब का शब्द बहुवाचक रूप में प्रयोग किया गया है। सूरए मरियम में ईश्वरीय दूत ने कहा है कि ईश्वर ही मेरा और तुम्हारा पालनहार है उसकी उपासना करो, यही सीधा रास्ता है लेकिन इसके बाद उनके अनुयायियों में से एक समूह ने विवाद पैदा कर दिया। अफ़सोस है क़यामत के दिन नास्तिकों की हालत पर।

इस आयत में हज़रत ईसा के द्वारा कही गई बातों का उल्लेख करने के बाद उन समूहों की बात की गई है जिन्होंने हज़रत ईसा के बाद सत्य का रास्ता छोड़ दिया। इन समूहों के लिए भी हिज़्ब का शब्द प्रयोग किया गया है और क़यामत के दिन उनकी हालत के बारे मे सचेत किया गया है। इससे पता चलता है कि क़ुरआन की नज़र मे वह समूह और संगठन जो सत्य के मार्ग से और पैग़म्बरों के रास्ते से बहक जाते हैं वह अवांछित संगठन होते हैं। इस आधार पर क़ुरआन की नज़र में दलों और समूहों की विविधता उसी समय तक वांछित है जब तक उनका मतभेद और विवाद उन्हें सत्य के मार्ग से हटा न दे। इस प्रकार क़ुरआन की नज़र से उन संगठनों और समूहों का भाग होना ग़लत है जो ईश्वर के मार्ग से दूर हैं।

इसी प्रकार की कुछ अन्य आयतों में पहले तो पैग़म्बरों की उम्मत की एकता पर बल दिया गया है और फिर उन समूहों को जो उम्मत या जाति के बीच विवाद और मतभेद पैदा करते हैं अज्ञानता और निश्चेतना का शिकार बताया गया है। क़ुरआन के सूरए मोमेनून में ईश्वर कहता है कि यह तुम्हारी उम्मत एकजुट उम्मत है और मैं तुम्हारा ईश्वर हूं तो मेरी अवज्ञा से परहेज़ करो। जिन्होंने आपस में फूट डाली और हर समूह एक अलग रास्ते पर चला गया और हर समूह अपने पास मौजूद चीज़ से संतुष्ट हो गया तो वह सब अज्ञान और निश्चेतना में हैं यहां तक कि मौत उन तक आ पहुंचेगी।

इस तरह यह समझा जा सकता है कि क़ुरआन की नज़र में अच्छी विविधता वही है जो धर्म में फूट पड़ने और उम्मत के बिखर जाने का कारण न बने। दलों के बीच तथा दलों के भीतर मतभेद वहीं तक सहन करने योग्य है जहां वह धर्म की एकता को नुक़सान न पहुंचाए। वरना दूसरी स्थिति में वह समूह क़ुरआन की दृष्टि से वांछित समूह नहीं रह जाएगा।

जिन आयतों का हमने जायज़ा लिया उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि क़ुरआन की नज़र में संगठन और समूह के गठन के कुछ मापदंड हैं और इनके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार का दल और समूह क़ुरआन की नज़र में वांछित है और कौन सा समूह वांछित नहीं है।

इन मापदंडों से यह नतीजा निकलता है कि सही संगठनों और समूहों का हिस्सा बनना जायज़ और सफलता का रास्ता है जबकि बुरे और अवांछित संगठनों का भाग बनना ख़तरनाक अंजाम का कारण है। इस निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है कि क़ुरआन ने संगठन, दल और समूह के गठन की अनुमति दी है लेकिन इसके लिए कुछ मापदंड निर्धारित कर दिए हैं और इन्हीं मापदंडों के आधार पर समूह और दल का गठन किया जा सकता है साथ ही इन मापदंडों की मदद से यह भी पता लगाया जा सकता है कि कौन सा दल और समूह अच्छा और कौन सा समूह अवांछित है।