#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 38

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मकान लोगों और परिवार के आराम की जगह होती है कि लोग उसमें सुकून व आराम से रह सकें।

इस स्थान को ऐसा होना चाहिये कि वह हर प्रकार के अतिक्रमण से सुरक्षित हो विशेषकर ग़ैर लोगों को उसमें प्रवेश की अनुमति नहीं होनी चाहिये। पवित्र कुरआन में मकान की गरिमा के बारे में इस प्रकार ध्यान दिया गया है कि महान ईश्वर कहता है” हे ईमान वालो अपने घरों के अलावा किसी दूसरे घर में दाखिल न हो किन्तु यह कि घर वालों से अनुमति ले लो और उन्हें सलाम करो, इसमें तुम्हारी भलाई है। शायद तुम समझो और अगर घर में कोई न हो तो दाखिल न हो यहां तक कि तुम्हें दाखिल होने की अनुमति दी जाये और अगर तुमसे कहा जाये कि लौट जाओ तो लौट जाओ यह तुम्हारे लिए बेहतर है और जो कुछ करते हो ईश्वर उसे जानता है।“

अंतरराष्ट्रीय कानूनों व घोषणापत्रों में लोगों के मकानों में मनमाने ढंग से प्रवेश करने से मना किया गया है और इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र की 18वीं धारा में भी स्पष्ट किया गया है कि मकान की हर हालत में गरिमा व सम्मान है और उसमें रहने वालों की अनुमति के बिना या गैर कानूनी ढंग से उसमें प्रवेश नहीं करना चाहिये, किसी को उसे खराब करने, हड़पने या उसमें रहने वालों को बेघर करने का अधिकार नहीं है।“

इसी प्रकार हर इंसान के आवास स्थल की सुरक्षा को भी विशेष महत्व प्राप्त है। हर व्यक्ति का आवास स्थल वह स्थान होता है जहां इंसान रहता है और वह स्थान उसकी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र भी होता है। हर इंसान को आज़ादी के साथ अपने आवास स्थल के चयन या उसे बदलने का अधिकार होना चाहिये। आवास स्थल का चयन व्यक्तिगत अधिकार और आज़ादी है और इंसान रहने के लिए अपनी इच्छा से सबसे उपयुक्त स्थान का चयन और कानून के दाएरे में रह कर उसमें मौजूद सुविधाओं से लाभ उठा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र की 13वीं धारा के दूसरे अनुच्छेद में आवास की आज़ादी पर बल दिया गया है और नागरिक व राजनीतिक अधिकार के अंतरराष्ट्रीय समझौते की धारा 13 के दूसरे और चौथे अनुच्छेद में उसकी ओर संकेत किया है। इसी प्रकार यूरोपीय मानवाधिकार कंवेन्शन की आठवीं धारा के पहले अनुच्छेद में कहा गया है कि लोगों को आवास स्थल के चयन का अधिकार है और लोगों के इस अधिकार को सम्मान प्राप्त है।

इस्लाम धर्म में आवास व रहने के कानून की बुनियाद समाज के हित हैं यानी समाज के हितों के परिप्रेक्ष्य में लोगों को आवास के चयन की आज़ादी दी गयी है। आवास के चयन की आज़ादी के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” ज़मीन ईश्वर की ज़मीन है, बंदे ईश्वर के बंदे हैं जहां भी तुम्हें अच्छा लगे वहां रहो।“

अत्याचारी लोगों और शासकों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से महान ईश्वर पलायन करने का आदेश देता है और आवास के चयन की उसकी आज़ादी के बारे में कहता है” जो लोग ईमान लाये और पलायन किया और ईश्वर के मार्ग में जेहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वे वास्तविक मोमिन हैं। उनके लिए क्षमा और सम्मानित आजीविका है।

अलबत्ता इस्लाम ने आवास के चयन में आज़ादी के लिए सीमा निर्धारित की है। जैसाकि अगर लोग ईश्वर और उसके पैग़म्बर से लड़ने के लिए उठ खड़े हों और ज़मीन में भ्रष्टाचार फैलाने का प्रयास करें तो उन्हें कड़ा दंड दिया जायेगा और उनमें से एक यह है कि उन्हें अपनी बस्ती से निष्कासित कर दिया जायेगा।

इस्लाम में लोगों की प्राइवेसी या निजता की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया गया है। लोगों के विशेष पारिवारिक और सार्वजनिक संबंध भी होते हैं। सार्वजनिक संबंध की प्रकृति इस प्रकार की होती है कि दूसरों के उसके जानने में कोई समस्या नहीं है और वह संबंध किसी से छिपा नहीं है परंतु हर इंसान के जीवन में कुछ मामले ऐसे होते हैं जो शत- प्रतिशत निजी व व्यक्तिगत होते हैं और उनका गोपनीय होना और दूसरों का उनसे अवगत न होना उनकी शर्त है। समाज में व्यक्तिगत व निजी मामलों का पर्दाफाश न करना और इस चीज़ को ध्यान में रखना लोगों की ज़िम्मेदारी है और लोगों के निजी जीवन में किसी प्रकार से हस्तक्षेप करना नैतिक दृष्टि से भी सही नहीं है और कानूनी दृष्टि से भी यह ठीक नहीं है।

मानव और समाजशास्त्र में प्राइवेसी या निजता के इतिहास पर दृष्टि इस बात की सूचक है कि संस्कृतियों और विभिन्न समाजों में निजता सदैव मूल्यवान चीज़ रही और उसका समर्थन किया गया है परंतु इन सबके बावजूद अब तक प्राइवेसी का एक अर्थ और इस बारे में एक निष्कर्ष नहीं निकल सका है और इसका कारण संस्कृतियों का भिन्न होना और इतिहास में समाजों में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन और इसी प्रकार इस अधिकार के बारे में दृष्टिकोण और समाजों में उसकी भूमिका और स्थान रहा है इस प्रकार से कि निजता एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में, एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में, एक समाज से दूसरे समाज में और एक समय से दूसरे समय में बदलती रही है। निजता ऐसा अर्थ है जिसकी परिभाषा वातावरण की परिस्थिति पर निर्भर है। वास्तव में लोगों के निजी जीवन में समाज के प्रवेश को रोकने के लिए निजता रेड लाइन है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि निजता के बारे में फ़ैसला इंसान खुदकरता है कि किस स्थिति में और किस सीमा तक अपनी स्थिति व व्यवहार को दूसरों को न बताये। समस्त लोगों की प्राइवेसी सम्मानीय है।

अंतरराष्ट्रीय कानूनों में अच्छी तरह प्राइवेसी का वर्णन किया गया है। वर्ष 1948 में मानवाधिकार घोषणापत्र स्वीकार किये जाने के बाद इसी प्रकार की शर्तों का वर्णन अंतरराष्ट्रीय नागरिक व राजनीतिक समझौतों और यूरोप के मानवाधिकार तथा दूसरे कंवेन्शनों व समझौतों में किया गया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र की तीसरी धारा में इस प्रकार कहा गया है” हर व्यक्ति को ज़िन्दगी, आज़ादी और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र की 12वीं धारा और राजनीतिक व नागरिक अधिकार के अंतरराष्ट्रीय समझौते की 17वीं धारा के अनुसार किसी को भी इस बात का अधिकार नहीं है कि वह लोगों के पारिवारिक जीवन, आवास स्थल, पत्र और लिखी हुई चीज़ों में अनुमति के बिना मनमाने ढंग से हस्तक्षेप करे और हर व्यक्ति को इस प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप के मुकाबले में कानून का समर्थन प्राप्त होना चाहिये। मानवाधिकार के समर्थन में यूरोपीय कंवेन्शन की आठवीं धारा में लोगों को निजी और पारिवारिक जीवन, आवास और संपर्क में सुरक्षा प्राप्त होने की ओर संकेत किया गया है और इसी प्रकार इस धारा में मनमाने ढंग से सरकारों को लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने से मना किया गया है किन्तु कानूनी कारण से और सार्वजनिक राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक जनकल्याण या दूसरों के अधिकारों के समर्थन के लिए हो तो सरकारें लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप कर सकती हैं। इस संबंध में इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र में भी आया है कि हर व्यक्ति को अपने जीवन के व्यक्तिगत मामलों में स्वतंत्र रहने का अधिकार है और उसकी जासूसी, निगरानी या उसकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाना सही नहीं है और इन मामलों में हर प्रकार के हस्तक्षेप के मुकाबले में उसका समर्थन किया जाना चाहिये।

यूरोपीय परिषद ने इंसान की प्राइवेसी के बारे में जो प्रस्ताव पारित किया है उसमें प्राइवेसी को इंसान का अधिकार बताया है और कहा है कि इंसान अपनी इच्छानुसार ज़िन्दगी गुज़ार सकता है और उसमें दूसरों का हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिये।

12 दिसंबर वर्ष 2003 को सूचना के संबंध में एक शिखर सम्मेलन हुआ था और उसमें जो प्रस्ताव पारित हुआ था उसकी धारा नंबर 35 में जानकारी की सुरक्षा, नेटवर्क की सुरक्षा, प्राइवेसी की सुरक्षा और सूचना तकनीक के प्रयोग करने वाले की सुरक्षा आदि पर बल दिया गया है। इस घोषणापत्र की 58वीं धारा में भी तकनीक के प्रयोग में मानवाधिकारों की सुरक्षा और आज़ादी सहित व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा पर बल दिया गया है।

प्राइवेसी, विकसित कानूनी व्यवस्था का मूल्यवान अर्थ है। प्राइवेसी महत्वपूर्ण अधिकार है जिसका इंसान की प्रतिष्ठा से घनिष्ठ संबंध है। उसका उद्देश्य इंसान के समस्त भौतिक और आध्यात्मिक अधिकारों को ऊंचा उठाना व उनका सम्मान है। स्वाधीनता, आज़ादी और अपने भविष्य का फैसला करने के अधिकार से प्राइवेसी का गहरा संबंध है। क्योंकि आज़ादी से ही इंसान के विकास और परिपूर्णता की भूमि प्रशस्त होती है और वह इंसान को हथकंडा बनने से रोकती है। आज़ादी इंसान को यह संभावना देती है कि वह अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करे और इंसान के पास अपनी आंतरिक भावनाओं व आभासों को बयान करने का अवसर रहे।

इस्लाम धर्म की एक महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि निजी जीवन या निजता का समर्थन किया जाये और व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप करने से बचा जाये। पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों में लोगों के निजी जीवन पर ध्यान देने पर बल दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम, उनके पवित्र परिजन और मुसलमानों की महान हस्तियों की जीवनी इस पाठ से भरी पड़ी है कि दूसरों के निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।

इस्लाम धर्म ने लोगों के निजी जीवन के सम्मान और उसमें जासूसी न करने पर बल दिया है। आम तौर पर जासूसी गुप्त रूप से की जाती है और जिस व्यक्ति की जासूसी की जाती है उससे वह अवगत नहीं हो पाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम लोगों के जीवन और उनके घरों की जासूसी की भर्त्सना करते हुए फरमाते हैं” किसी घर में दाखिल न हो सिवाए उसके दरवाज़े से अगर कोई दरवाज़े से हटकर किसी और मार्ग से घर में प्रवेश करता है तो उसे चोर कहा जायेगा।“

इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि आज विकसित तकनीकी संसाधनों का अस्तित्व और उनका प्रयोग सरल होने के कारण लोगों के निजी जीवन के लिए सरकारों और ग़ैर सरकारों की ओर से गम्भीर ख़तरा है। इस कारण व्यवहारिक रूप से लोगों की सुरक्षा और आज़ादी छिन जाने, लोगों के व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों व रहस्यों के फाश हो जाने का खतरा मौजूद रहता है। वर्तमान समय में लोगों की अनुमति के बिना घर में दाखिल हुए बिना टेलीफोन पर वार्ता को सुनना बहुत सरल है। निश्चित रूप से इस प्रकार का कार्य लोगों की सुरक्षा छिन जाने और सरकारों की ओर से लोगों के अधिकारों के निर्बाध हनन का कारण बनेगा।