#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 42

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व्यक्तिगत सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक योग्य न्याय तंत्र का वजूद है जो फ़रियादी को उसका अधिकार दिलाने और न्याय व शांति का अतिक्रमण करने वालों को दंडित करता है।

एक अच्छे न्याय तंत्र के लिए ज़रूरी है कि उसमें कुछ शर्तें पायी जाती हों, जैसे मुक़द्दमे के लिए एक न्यायपूर्ण अदालत तक पहुंच का मुमकिन होना, न्यायिक स्वाधीनता और जजों की ज़िम्मेदारियां।

अदालत से फ़रियाद करना सभी लोगों के मूल अधिकार में शामिल है ताकि जिन लोगों के अधिकार, आज़ादी और सुरक्षा पर किसी प्रकार के अतिक्रमण का ख़तरा हो तो उसे दिलाने के लिए योग्य स्रोत तक पहुंच मुमकिन हो। इस मानवाधिकार की प्राप्ति पर अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज़ों में भी बल दिया गया है। मिसाल के तौर पर विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र की धारा 21 के पहले अनुच्छेद में आया है, “हर व्यक्ति को बराबर के अधिकार हासिल हैं और उसके मामले की सुनवाई स्वाधीन व निष्पक्ष अदालत में न्यायपूर्ण ढंग से हो।” इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रतिज्ञापत्र की धारा 14 के पहले अनुच्छेद में आया है, “हर व्यक्ति को यह अधिकार हासिल है कि उसकी फ़रियाद एक स्वाधीन व निष्पक्ष अदालत में खुल्लम खुल्ला न्यायपूर्ण ढंग से सुनी जाए।”

संपूर्ण आसमानी धर्म इस्लाम ने न्याय तंत्र को लोगों के बीच न्याय व समानता क़ायम करने के लिए ज़रूरी बताया है। लेकिन अदालत के स्थान, इसकी संरचना, फ़ैसला करने का आधार और जज को कैसा होना चाहिए, इस दृष्टि से इस्लाम का दृष्टिकोण दूसरे मतों के दृष्टिकोण से बहुत भिन्न है। इस्लामी समाज में न्यायधीश बनने के लिए शर्तें रखी गयी हैं ताकि अयोग्य लोग, जनता की जान, माल और इज़्ज़त से खिलवाड़ न कर सकें। इसी प्रकार व्यक्ति और समाज के अधिकार किसी व्यक्ति, गुट यहां तक कि सरकारी अधिकारियों की व्यक्तिगत इच्छाओं की बलि न चढ़ने पाए।

इस्लाम की नज़र में न्यायधीश बनना और न्यायपूर्ण फ़ैसला करना ईश्वर पर आस्था के बाद सबसे अहम मूल सिद्धांतों में है। इस्लाम ने सामाजिक न्याय की स्थापना और लोगों के अधिकार को सुनिश्चित बनाने के लिए न्यायधीश बनने के विषय को बहुत अहमियत दी है और इसे बहुत बड़ी अमानत कहा है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के ‘निसा’ सूरे की आयत नंबर 58 में ईश्वर कह रहा है, “ईश्वर तुम्हें अमानतों को उनके मालिक तक पहुंचाने और लोगों के बीच न्याय के साथ फ़ैसला करने का आदेश देता है। ईश्वर तुम्हें अच्छी बातों की नसीहत करता है। ईश्वर सुनने वाला व देखने वाला है।”

इस्लाम में न्यायधीश का पद ईश्वरीय पद है जो ईश्वर की ओर से पैग़म्बरों को दिया गया है। यह पद पैग़म्बरों से उनके उत्तराधिकारियों तथा सबसे ज़्यादा ईश्वर से डरने वालों तक पहुंचा है। पैग़म्बरे इस्लाम पर मानव समाज के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी के साथ साथ फ़ैसला करना भी उनके ईश्वरीय दायित्व में शामिल था। वह लोगों का मार्गदर्शन करने के साथ साथ लोगों के बीच विभिन्न प्रकार के पारिवारिक, आपराधिक और अधिकारों से जुड़े विवादों का भी निपटारा करते थे।

हज़रत अली इस बात का पता लगाने के लिए कि जज बनने के लिए किस तरह के लोग योग्य हैं, मालिके अश्तर से फ़रमाते हैं, “लोगों के बीच से सबसे अच्छे व्यक्ति को न्यायधीश के रूप में चुनो। ऐसा व्यक्ति जो न्यायिक मामलों से बहुत जल्दी ऊब न जाता हो, विरोधियों के एक दूसरे के साथ रवैये से क्रोधित न होता हो, ग़लतियों पर अड़ा न रहता हो, सत्य बात को समझने के बाद उसकी ओर पलटना उसके लिए कठिन न हो, मन में लालच न रखता हो, किसी भी मामले में थोड़ी सी जांच पर राज़ी होकर अपना फ़ैसला न देता हो, भ्रांतियों में सबसे ज़्यादा सावधानी बरतता हो, तर्क पर वह सबसे ज़्यादा बल देता हो, शिकायत करने वालों के निरंतर संपर्क करने से ऊबता न हो, सच्चाई को समझने में सबसे ज़्यादा संयमी और सच्चाई के स्पष्ट होने के बाद फ़ैसला करने में सबसे ज़्यादा दृढ़ हो, तारीफ़ से धोखा न खाता हो और चापलूसी उसे सही रास्ते से न हटा सके कि इस तरह के लोग बहुत कम होते हैं।”

इस्लाम में न्यायधीश के पद को समाज के लिए बहुत अहम व संवेदनशील माना गया है क्योंकि न्याय की स्थापना इस्लामी हुकूमत की ज़िम्मेदारी है। इस्लामी न्यायधीश हर प्रकार के भेदभाव से दूर रहते हुए सभी इंसानों के बीच चाहे वे किसी भी धर्म के हों, न्याय के साथ फ़ैसला सुनाए ताकि किसी का हक़ न मारा जाए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं, “न्यायधीश की ज़बान आग की दो ज्वालाओं के बीच होती है यहां तक कि लोगों के बीच फ़ैसला कर दे। अब अगर उसने न्यायपूर्ण फ़ैसला किया तो स्वर्ग में जाएगा और अगर अत्याचार किया तो नरक में जाएगा।”

इस बात के मद्देनज़र कि न्यायधीश का फ़ैसला लोगों के भविष्य का मार्ग तय करता है, यह बात स्पष्ट है कि अगर न्यायधीश ने ग़लत फ़ैसला सुनाया तो उसके फ़ैसले से हक़दार का जीवन कठिनाई में पड़ जाएगा। इसलिए न्यायधीश को चाहिए कि पर्याप्त सुबूतों व तर्कों के आधार पर फ़ैसला सुनाए और विवाद के दोनों पक्षों की बातें पूरी तरह सुने। हज़रत अली फ़रमाते हैं, “जब मुझे पैग़म्बरे इस्लाम ने यमन का न्यायधीश बनाकर भेजा तो मुझसे कहा कि जब तक दोनों पक्ष की बात न सुन लेना फ़ैसला मत करना। मैंने इस बात को हमेशा मद्देनज़र रखा और कभी संदेह का शिकार नही हुआ।”

दूसरी ओर मुसलमान न्यायधीश के लिए ज़रूरी है कि वह ईश्वर पर आस्था और ज्ञान के साथ साथ विवाद के पक्षों के साथ समानता के आधार पर व्यवहार करे। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम न्यायधीशों को नसीहत करते हुए फ़रमाते हैं, “जो भी लोगों के बीच फ़ैसला करना चाहता है उसे चाहिए कि उनके बीच न्याय का हर तरह से पालन करे। यहां तक कि देखने, इशारा करने और उनके बैठने का स्थान तय करने के संबंध में भी किसी तरह का भेदभाव न करे। अपना स्वर किसी एक के संबंध में ऊंचा न करे मगर यह कि दूसरे वाले पक्ष के साथ भी ऐसा ही करे।”

पीड़ित को उसका अधिकार दिलाना इस्लाम की नज़र में इतना ज़्यादा अहम है कि न्यायधीश के लिए ज़रूरी है कि वह इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शारीरिक व मानसिक दृष्टि से उचित स्थिति में हो। न्यायधीश के लिए ज़रूरी है कि वह फ़ैसला सुनाते समय भूखा और ग़ुस्से में न हो। क्योंकि ग़ुस्से की हालत में इंसान को अपने ऊंपर नियंत्रण नहीं रहता और भूख के कारण इंसान के मन में आवश्यक एकाग्रता नहीं आ पाती इसलिए मुमकिन है न्यायधीश ने किसी विषय की गहन समीक्षा न की हो।

न्यायधीश को आर्थिक और दूसरी सामान्य ज़रूरतों को पूरा करने की दृष्टि से आत्मनिर्भर होना चाहिए। यही कारण है कि इस्लामी धर्मशास्त्र में न्यायधीश को किसी विवाद के दोनों पक्ष से फ़ीस लेने का अधिकार नहीं है बल्कि उसे जनकोष से निर्धारित वेतन मिलता हो।

इस्लाम में न्यायधीश की निष्पक्षता को बाक़ी रखने के लिए उसे यथा संभव लेन-देन व व्यापार से रोका गया है। क्योंकि मुमकिन है कि व्यापारिक लेन-देन के कारण कुछ लोगों से परिचित हो और फिर उसके व दूसरे लोगों के बीच दोस्ती पैदा हो जाए और यह चीज़ न्याय करते वक़्त न्यायधीश के फ़ैसले पर असर डाल दे मगर यह कि न्यायधीश जिनसे लेन-देन करता है वे उसे न पहचानते हों। इस संबंध में हज़रत अली फ़रमाते हैं, “अगर जज व्यापार करेगा तो न्याय क़ायम नहीं कर सकता।”

इस्लाम में जज या न्यायधीश की स्वाधीनता पर भी बहुत बल दिया गया है। इस तरह से कि न्यायधीश किसी भी मामले में फ़ैसला करने में पूरी तरह आज़ाद हो। अपने दृष्टिकोण व राय के अलावा किसी दूसरे के विचार व राय का पालन न करे। इस्लाम में न्यायधीश किसी व्यक्ति या शक्ति के किसी स्रोत से आदेश जारी करने का हुक्म हासिल नहीं करता। किसी भी अधिकारी को यह हक़ नहीं है कि वह किसी तरह अपनी राय व दृष्टिकोण न्यायधीश तक पहुंचाए और उसे मनवाने की कोशिश करे या न्यायधीश पर फ़ैसला बदलने के लिए दबाव डाले। इस तरह की स्वाधीनता इस्लाम में न्याय तंत्र व न्यायधीश के लिए ज़रूरी शर्तों में हैं।

इस्लाम में न्यायतंत्र की स्वाधीनता का अर्थ सरकार और शासकों के मुक़ाबले में स्वाधीन होना है। जैसा कि इस्लामी न्याय के इतिहास में मिलता है कि धन-संपत्ति और सांसारिक पद में रूचि न रखने वाले वीर न्यायधीशों ने शक्तिशाली शासकों को अदालत में बुला लिया और आम लोगों की तरह उनसे भी पूछताछ की। इस तरह की घटनाएं इस्लामी इतिहास में बहुत ज़्यादा हैं।

जिस समय हज़रत अली ख़लीफ़ा थे और उन्होंने अपने कवच को हासिल करने के लिए अदालत में शिकायत की तो उस समय हज़रत अली ग़ैर मुसलमान मुद्दआ अलैह के कांधे से कांधा मिलाकर अदालत में बैठते हैं। हक़ हज़रत अली के साथ होने के बावजूद उनकी शिकायत पर्याप्त सुबूत न होने के कारण ख़ारिज हो जाती है। न्यायधीश मुद्दआ अलैह के पक्ष में आदेश सुनाता है। लेकिन वह ग़ैर मुसलमान जो अच्छी तरह जानता था कि कवच उसका नहीं है, हज़रत अली के इस अद्वितीय व्यवहार और न्यायधीश की स्वाधीनता को देखकर कहता है कि इस तरह का व्यवहार एक आम आदमी का व्यवहार नहीं हो सकता और इस तरह का शासन ईश्वरीय पैग़म्बर का ही शासन हो सकता है। उसके बाद वह ग़ैर मुसलमान मुसलमान हो जाता है।

दूसरे अधिकारियों की तरह न्यायधीश पर उसके फ़ैसले की ज़िम्मेदारी भी लागू होती है। हालांकि अदालत आम लोगों पर हो रहे अत्याचार को ख़त्म करने के लिए होती हें लेकिन जज का पद न चाहते हुए भी उन्हें ऐसी शक्ति प्रदान करता है कि उस शक्ति के कारण आम लोगों के अधिकारों का हनन होता है। इसी बात के मद्देनज़र न्याया को उसके फ़ैसले के लिए ज़िम्मेदार वहराना बहुत ही तार्किक है। इसलिए अगर किसी ग़लत फ़ैसले के कारण किसी विवाद के दोनों पक्षों को नुक़सान पहुंचता है तो उसकी भरपाई की ज़िम्मेदारी न्यायशीध पर होगी।