#इस्लाम ने मनुष्य को ज़िम्मेदार इन्सान बनाया : अल्लाह के ख़ास बन्दे पार्ट 16

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पिछले कार्यक्रम में हमने हज़रत अली के जीवन के कुछ पहलुओं की चर्चा की थी और आज भी उनके जीवन के कुछ अन्य पहलुओं पर प्रकाश डालेंगे।

अज्ञानता के काल में क़ुरैश का बोलबाला था, पूरे अरब में अज्ञानता की संस्कृति प्रचलित थी, उस समय अरब जगत में आर्थिक दरिद्रता व्याप्त थी और समाज में मूर्तिपूजा और विभिन्न प्रकार की बुराइयां फैली हुई थीं। इन चीजों के कारण पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम को इस्लाम धर्म के प्रचार- प्रसार में कठिनाइयों का सामना था। इसी कारण महान ईश्वर की ओर से हज़रत मोहम्मद मुस्तफा के ईश्वरीय दूत होने की घोषणा के बाद पैग़म्बरे इस्लाम को यह दायित्व सौंपा गया कि वे गोपनीय ढंग से तीन वर्षों तक अपने परिजनों और खानदान वालों को इस्लाम का निमंत्रण दें। इस संबंध में महान ईश्वर की ओर से एक फरिश्ता उतरा और उसने पवित्र कुरआन के सूरये शुरा की आयत नंबर 214 की तिलावत की जिसका अनुवाद है”(“हे पैग़म्बर) अपने निकटवर्ती परिजनों को डराए।” पवित्र कुरआन की इस आयत के नाज़िल होने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली से फरमाया” ईश्वर ने मुझे आदेश दिया है कि अपने निकटवर्ती परिजनों को ईश्वर की उपासना के लिए आमंत्रित करूं। उसके बाद हज़रत अली से कहा कि एक भेड़ को ज़िबह करो और थोड़ी रोटी और दूध का प्रबंध करो। पैग़म्बरे इस्लाम के आदेश से हज़रत अली ने क़ुरैश के लगभग 40 लोगों को आमंत्रित किया और सबके सब पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में हाज़िर हुए और उन सबका आदर- सत्कार किया गया।

आदर -सत्कार हो जाने के बाद जैसे ही पैग़म्बरे इस्लाम ने कुछ कहना चाहा, अबू लहब ने कहा यह तुम पर जादू कर रहे हैं और तुम्हें तुम्हारे बाप- दादा के धर्म से हटाना चाहते हैं। इसके बाद सभा में भाग लेने वाले तितर- बितर हो गये और पैग़म्बरे इस्लाम कुछ न कह सके। उसके कुछ दिन बाद हज़रत अली ने पैग़म्बरे इस्लाम के निकट परिजनों को दोबारा आमंत्रित किया और वे सब दोबारा पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में हाज़िर हुए तो पैग़म्बरे इस्लाम ने उन सबको संबोधित करते हुए कहा हे अब्दुल मुत्तलिब की संतान मैं नहीं समझता कि जो चीज़ मैं तुम लोगों के लिए लाया हूं उससे बेहतर अरब में कोई व्यक्ति अपने लोगों के लिए लाया हो। अगर मेरी बात स्वीकार करो तो मैं तुम्हारे लोक- परलोक के कल्याण की ज़मानत लेता हूं। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया तुममें से कौन है जो इस ईश्वरीय कार्य में मेरी सहायता करे ताकि वह मेरा भाई और लोगों के मध्य मेरा उत्तराधिकारी हो? इस पर सब चुप थे। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। उस संवेदनशील और निर्णायक समय में हज़रत अली ने मौन को तोड़ दिया और फरमाया हे ईश्वरीय दूत मैं आपके निमंत्रण को स्वीकार करता हूं। रोचक बात यह है कि उस समय हज़रत अली की उम्र 13 साल से अधिक नहीं थी। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी बात तीन बार दोहराई। हर बार हज़रत अली के अलावा किसी ने भी पैग़म्बरे के निमंत्रण का जवाब नहीं दिया। उसके पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने निकटवर्ती परिजनों को संबोधित करते हुए कहा आप लोगों के मध्य अली मेरे उत्तराधिकारी हैं आप लोग उनकी बात सुनें और उनकी बात का अनुसरण करें। इसके बाद सभा समाप्त हो गयी और सभा में भाग लेने वालों ने हंसी उड़ाते हुए हज़रत अबू तालिब से कहा मोहम्मद ने आदेश दिया है कि आप अपने बेटे का अनुसरण करें और उसके आदेशों का पालन करें! और उसे आपका बड़ा बनाया है।”


उस ऐतिहासिक दिन हज़रत अली को पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम दूरदर्शिता और सुनियोजित कार्यक्रम के अनुसार इस प्रयास में थे कि समय बीतने के साथ हज़रत अली की इमामत के लिए भूमि तैयार करें ताकि उनके स्वर्गवास के बाद ईश्वरीय आदेश का मार्ग जारी रहे और इस्लामी राष्ट्र के लिए कोई चिंता की बात न रहे। दूसरी ओर चूंकि हज़रत अली बचपने से पैग़म्बरे इस्लाम के साथ थे और उनके सदगुणों से भली-भांति अवगत थे इसलिए उनसे बहुत प्रेम करते थे। इसी तरह जब हज़रत अली देखते थे कि उनके पिता हज़रत अबू तालिब किस तरह पैग़म्बरे इस्लाम की रक्षा करते थे कि कहीं दुश्मन उन्हें कोई नुकसान न पहुंचा दें तो उन्होंने भी अपने पिता की भांति पैग़म्बरे इस्लाम की रक्षा के लिए सदैव उनके साथ रहे।

पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी की घोषणा के तीन वर्ष बीत जाने के बाद महान ईश्वर के आदेश से पैग़म्बरे इस्लाम ने खुलकर लोगों को इस्लाम का निमंत्रण देना आरंभ कर दिया। उस समय से क़ुरैश के सरदारों और काफिरों की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम पर दबाव में वृद्धि हो गयी। कठिनाई की इस घड़ी में भी हज़रत अली पैग़म्बरे इस्लाम के साथ- साथ थे यहां तक कि पैग़म्बरे इस्लाम को ईश्वरीय वहि अर्थात संदेश से मालूम हो गया कि उनके घोर शत्रुओं ने उनकी हत्या का निर्णय कर लिया है। इसी कारण महान ईश्वर के आदेश से पैग़म्बरे इस्लाम ने रात को मक्के से मदीना पलायन का फैसला किया ताकि दुश्मनों के षडयंत्र को विफल बनाने के साथ अपने ईश्वरीय दायित्व को जारी रख सकें।

पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्का से मदीना पलायन करने से पहले हज़रत अली को एक बहुत ही संवेदनशील व खतरनाक दायित्व सौंपा और उनसे कहा कि वे उनके घर में रहें और उनके बिस्तर पर सो जायें। हज़रत अली इस प्रकार के अवसर की प्रतीक्षा में थे ताकि वे अपनी वफादारी और परित्याग को सिद्ध कर सकें इसलिए उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के आदेश का पालन किया। हज़रत अली इस बात को जानते थे कि दुश्मनों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम के घर पर हमला करने वाला है उसके बावजूद वह पूरे संतोष के साथ पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर पर भोर तक सोये रहे। जब भोर का समय हुआ तो दुश्मन पैग़म्बरे इस्लाम के घर में दाखिल हो गये और हमला करने के लिए वे उनके बिस्तर की ओर बढ़े तो हज़रत अली जल्दी से पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर से उठे और उन्होंने ख़ालिद के हाथ से तलवार छीन ली। ख़ालिद वह व्यक्ति था जो पैग़म्बरे इस्लाम के दुश्मनों में सबसे आगे- आगे तलवार निकाले पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर की ओर बढ़ रहा था। पैग़म्बरे इस्लाम की हत्या के इरादे से हमला करने वाले दुश्मनों ने जब यह देखा तो वे हतप्रभ रह गये और कहा कि हमें तुमसे कुछ लेना नहीं देना है। तुम्हारे दोस्त मोहम्मद कहां हैं? हज़रत अली ने जवाब दिया उनके बारे में मुझे पता नहीं है। इस पर वे सबके सब हतप्रभ रह गये। क्योंकि उन्होंने देखा कि उन सबका सारा षडयंत्र ही विफल हो गया है तो वे सब बड़ी निराशा के साथ पैग़म्बरे इस्लाम के घर से चले गये। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने भी हज़रत अली के इस महान बलिदान की प्रशंसा में फरमाया” कुछ लोग ईश्वर से सौदा करते हैं और उसकी प्रसन्नता के लिए अपनी जान ख़तरे में डालते हैं और ईश्वर अपने बंदों के प्रति बहुत दयावान है।“

हज़रत अली ने जिस रात को यह महान बलिदान दिया वह इस्लामी इतिहास में “लैलतुल मबीत” के नाम से प्रसिद्ध है। इस एतिहासिक घटना की याद में इस्लामी जगत के बहुत से विद्वानों ने हज़रत अली की प्रशंसा की है। ये विद्वान हज़रत अली के इस महान बलिदान को उनकी बहुत बड़ी विशेषता के रूप में याद करते हैं और पवित्र कुरआन की व्याख्या और एतिहास की किताबों में इस घटना का वर्णन किया गया है और सभी इस बात पर सहमत हैं कि यह आयत हज़रत अली की प्रशंसा में नाज़िल हुई है। हर प्रकार की हेरा- फेरी और इस महान बलिदान को दूसरों से संबंधित बताने से रोकने के लिए स्वयं हज़रत अली ने एक शेर कहा है जिसका अनुवाद इस प्रकार है। मैंने अपनी जान ख़तरे में डालकर उस सबसे बेहतरीन इंसान की जान बचाई जो ज़मीन पर क़दम रखता है और उसने ईश्वर के घर काबे और हिज्र इस्माईल की परिक्रमा की है। उसका पवित्र नाम मोहम्मद है। मैंने यह जोखिम भरा कार्य उस समय अंजाम दिया जब काफिरों ने उसकी हत्या का षडयंत्र रचा था। उस समय महान ईश्वर ने काफिरों की धूर्तता से उसकी रक्षा की और मैंने उसके बिस्तर पर पूरी रात गुज़ारी और मैं दुश्मन की प्रतीक्षा में मौत एवं बंदी बनाये जाने के लिए तैयार था।“

इस बारे में एक प्रसिद्ध हदीस है जिसे बहुत से शीया- सुन्नी विद्वानों ने लिखा है कि उस एतिहासिक रात को ईश्वर ने जिब्राईल और मीकाईल नामक फरिश्तों को संबोधित करके कहा” मैंने तुम दोनों को एक दूसरे का भाई बनाया और तुममें से एक दूसरे की उम्र एक दूसरे से लंबी की, तुममें से कौन जल्दी मरना पसंद करेगा?”

दोनों फरिश्तों में से किसी ने भी जल्दी मरना पसंद नहीं किया। महान ईश्वर ने उनसे कहा कि ज़मीन पर जाओ और देखो कि अली ने किस तरह मौत को खरीदा और स्वयं को पैग़म्बरे इस्लाम पर कुर्बान कर दिया। दोनों फरिश्ते ज़मीन पर आये और वे पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर के पास गये और हज़रत अली की उनके शत्रुओं से रक्षा की। हज़रत मीकाईल हज़रत अली के पांव की ओर खड़े हो गये और हज़रत जिब्राईल हज़रत अली के सिर के बगल में खड़े हो गये। उन दोनों ने हज़रत अली को संबोधित करते हुए कहा शाबाश हे अबू तालिब के बेटे कौन तुम्हारे जैसा है कि ईश्वर तुम्हारी वजह से फरिश्तों के मध्य गर्व कर रहा है।“

यहां कोई यह सवाल कर सकता है कि क्यों पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत अली को अपने साथ नहीं ले गये और क्यों वे मक्के में रह गये? इसके जवाब में कहना चाहिये कि पैग़म्बरे इस्लाम जानते थे कि काफिर और अनेकेश्वरवादी उनकी हत्या करना चाहते हैं। दुश्मनों के षडयंत्रों को विफल बनाने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम को होशियारी से काम करना चाहिये था इसलिए उन्होंने रात को पलायन किया ताकि दुश्मन पैग़म्बरे इस्लाम के रात के पलायन के बारे में सोच भी न सके। इसके अलावा पैग़म्बरे इस्लाम मुसलमानों विशेषकर अपने साथियों को यह समझाना चाहते थे कि जो अपनी जान को खतरे में डालकर उनकी जान की रक्षा कर सकता है और स्वयं को उनकी रक्षा के लिए कुर्बान कर सकता है वह केवल हज़रत अली हैं। इसी प्रकार इतिहास में है कि पैग़म्बरे इस्लाम के पास दूसरों की कुछ अमानते थीं जिन्हें उनके मालिकों को लौटाना था। पैग़म्बरे इस्लाम ने यह दिखाने के लिए कि हज़रत अली से अधिक कोई दूसरा उनके निकट विश्वास पात्र नहीं है, उनका चयन किया और ताकि वे मक्के में रहकर इस दायित्व को अंजाम दे सकें।

अतः इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मक्के में हज़रत अली का रुक जाना और पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर पर सो जाना होशियारी और दूरदर्शिता से भरा कदम था और मक्का से मदीना पैगम्बरे इस्लाम के पलायन में उसकी बुनियादी व महत्वपूर्ण भूमिका थी। पैगम्बरे इस्लाम ने मक्का से मदीना जो पलायन किया उसकी इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका है और दूसरे ख़लीफा के ज़माने में हज़रत अली के सुझाव पर इसे इस्लामी तारीख़ का आरंभ माना गया।

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