#इस्लाम ने मनुष्य को ज़िम्मेदार इन्सान बनाया : अल्लाह के ख़ास बन्दे पार्ट 18

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हज़रत अली की जीवनी के उतार चढ़ाव से आपको अवगत कराया था और इस्लाम धर्म के विस्तार तथा काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों से मुक़ाबले में उनके अद्वितीय साहस के बारे में चर्चा की थी।

हिजरत का सातवां वर्ष था, किसी ने यह सोचा ही नहीं था कि मुसलमान दुश्मनों के षड्यंत्रों और उनकी योजनाओं के सामने सात साल तक टिक पाएंगे और अपने दुश्मनों को पराजित करके इस्लाम के मज़बूत क़िले के रूप में मदीने की रक्षा कर सकेंगे। ख़ंदक़ और अहज़ाब युद्धों के बाद ख़ैबर के क़िले में रहने वाले यहूदियों ने नई कार्यवाहियां शुरु कर दी। पैग़म्बरे इस्लाम ने मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध और हमलों को रोकने की कार्यवाही करते हुए मदीने से ख़ैबर के मजब़ूत दुर्ग की ओर सेना को हरकत करने का आदेश दिया। यहूदियों को मुस्लिम सेना की गतिविधियों का पता चल गया और उन्होंने अपने सैनिकों को तैनात करना शुरु कर दिया और उन्होंने बीस दिनों तक इस्लामी सेना से डटकर मुक़ाबला किया। इस अवधि में मुस्लिम सेना की ओर से कई सेनापतियों ने ख़ैबर के दुर्ग पर हमला किया किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली और वे ख़ाली हाथ वापस लौट आए। अब मुस्लिम सेना का मनोबल गिरने ही वाला था कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने कहा कि मैं कल ध्वज उसको दूंगा जो ईश्वर और उसके पैग़म्बर को पसंद करता होगा और अल्लाह और उसका दूत उसे पंसद करते होंगे।

दूसरे दिन सुबह मुस्लिम सेना इस बात की प्रतीक्षा कर रही थी कि देखें पैग़म्बरे इस्लाम किसे ध्वज देते हैं? पैग़म्बरे इस्लाम ने किसी को अली (अ) को बुलाने के लिए भेजा, हज़रत अली की आंख आई हुई थी, वह पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में उपस्थित हुए कहा कि या रसूलुल्लाह, मुझे आंखों में दर्द है, मुझे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है, यह सुनना था कि पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने हाथ को हज़रत अली की आंखों पर फेरा और उसके बाद चमत्कार से उनकी आंखें ठीक हो गयीं।

पैग़म्बरे इस्लामी सेना का ध्वज हज़रत अली के हवाले किया और हज़रत अली ने निडर होकर कुछ साथियों के साथ ख़ैबर के दुर्ग पर हमला कर दिया। ख़ैबर के क़िले के निकट कुछ यहूदी लड़ाके, हज़रत अली और उनके साथियों से लड़ने के लिए तैयार थे। उन्हीं लड़ाकों में से एक का नाम हारिस था जिसने सबसे पहले हमला किया और इतनी तेज़ आवाज़ में चीख़ा कि हज़रत अली के कुछ साथी भयभीत हो गये और वह कई क़दम पीछे हट गये। हारिस हज़रत अली के पास ग़ुस्से में पहुंचा और उसके बाद दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ किन्तु कुछ समय ही नहीं पीता था कि हारिस का ख़ात्मा हो गया और उसका मुर्दा शरीर ज़मीन पर गिरा।

हारिस के एक भाई का नाम मरहब था। वह भी बहादुरी और साहस में अपने समय में मशहूर था। यह दृश्य देखकर वह आपे से बाहर हो गया और उसने हज़रत अली पर पूरी ताक़त के साथ हमला कर दिया। मरहब सिर से पैर तक कवच में था किन्तु ज़्यादा समय नहीं बीता था कि मरहब भी अपने भाई से जा मिला और उसका मुर्दा शरीर भी ज़मीन पर गिरा। ख़ैबर दुर्ग की रक्षा पर तैनात सैनिकों ने जब यह दृश्य देखा तो वे सब भाग खड़े हुए और उन्होंने क़िले के भीतर शरण ले ली। हज़रत अली ने क़िले के भीतर तक यहूदियों का पीछा किया, इसी बीच एक यहूदी लड़ाके ने तलवार से हज़रत अली की ढाल पर हमला किया और उनकी ढाल गिर गयी। हज़रत अली उस की ओर दौड़े तभी यहूदियों ने क़िले का दरवाज़ा बंद कर दिया और हज़रत अली ने दरवाज़े को एक ओर से पकड़ कर उखाड़ लिया और उसको ढाल के रूप में प्रयोग करने लगे। युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने उस दरवाज़े को ख़दक पर पुल के रूप में भी प्रयोग किया क्योंकि जहां पर मुस्लिम सेना थी और क़िले के बीच बहुत बड़ी खाई खुदी हुई थी जिसे मुस्लिम सेना को पार करना असंभव था। इस प्रकार से कई दिनों से परेशान मुस्लिम सेना के लिए बहुत कम अवधि में क़िले का दरवाज़ा खुल गया और जब हज़रत अली ख़लीफ़ा बने तो उन्होंने सहल बिन हुनैफ़ को पत्र लिखकर इस बारे में कहा कि ईश्वर की सौगंध मैंने अपने शरीर की शक्ति से जो खाना खाने और पानी पीने से प्राप्त होती है, ख़ैबर का दरवाज़ा नहीं उखाड़ा बल्कि इसको मैंने ईश्वरीय शक्ति से उखाड़ा है।

हुदैबिया संधि के आधार पर मुसलमानों और क़ुरैश के अनेकेश्वरवादियों को यह हक़ नहीं था कि वे एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध छेड़ें या संधि वाले पक्ष के विरुद्ध दूसरे पक्ष को खड़ा करें और युद्ध में उसकी सहायता करें किन्तु क़ुरैश के सरदारों ने बनी बक्र क़बीले को हथियारों से लैस करके मुसलमानों के ख़ज़ाआ क़बीले पर हमले के लिए उकसा दिया और इस प्रकार से उन्होंने हुदैबिया संधि को तोड़ दिया। विदित रूप से क़ुरैश के सरदार कई वर्षों की निरंतर पराजय के बाद शायद यह भूल गये थे कि अब मदीना पिछले कई सालों जैसा मदीना नहीं रहा जहां पर कुछ अंसार और मुहाजेरीन शरण लिए हुए थे। मदीना अब इस्लामी सरकार की एक मज़बूत राजधानी में तबदील हो चुका था जो इस्लाम धर्म की जीवन प्रदान करने वाली शिक्षाओं की रोशनी तथा पैग़म्बरे इस्लाम के युक्तिपूर्ण नेतृत्व में पूरी तरह से बदल चुका था और इस्लाम के एक मज़बूत गढ़ का रूप धारण कर चुका था। अनेकेश्वरवादियों ने ऐसे समय में संधि तोड़ने का निर्णय लिया जब इस्लाम मज़बूत हो चुका था। इस निर्णय के बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्के पर विजय प्राप्त करने के लिए दस हज़ार की सेना को रवाना कर दिया। मुसलमानों की इस सेना का नेतृत्व स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम कर रहे थे।

मक्के में मौजूद क़ुरैश के एक जासूस ने जब मुसलमानों की सेना को देखा तो उसने अनेकेश्वरवादियों और क़ुरैश को एक पत्र लिखकर कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम तेज़ी के साथ एक बड़ा लश्कर लेकर तुम्हारी तरफ़ आ रहे हैं। इस जासूस ने अपना पत्र एक महिला को दे दिया ताकि वह क़ुरैश के सरदारों तक उसे पहुंचा दे और उन्हें मुस्लिम सेना के चल देने की सूचना दे। पैग़म्बरे इस्लाम भी उनकी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए थे और उनकी विश्वासघाती योजनाओं से अवगत हो गये, उन्होंने हज़रत अली से कहा कि यह पत्र मक्के नहीं पहुंचना चाहिए, हज़रत अली ने तुरंत ही महिला का पीछा किया और उससे पत्र हवाले करने को कहा किन्तु उसने पहले तो इन्कार किन्तु बाद में उसने अपने बालों के बीच में छिपाए पत्र को उनके हवाले कर दिया, इस प्रकार मक्के की ओर मुस्लिम सेना की हरकत से अनेकेश्वरवादी अवगत नहीं हो सके। इस प्रकार मुस्लिम सेना मक्के शहर के निकट पहुंच गयी और उसके पास मुसलमानों की सेना से लड़ने की शक्ति नहीं थे, मुस्लिम सेना पूरी शान व शौकत के साथ बिना किसी रक्तपात के मक्के में दाख़िल हो गयी।

पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्के पर विजय प्राप्त करने के बाद मक्कावासियों और इस्लाम के दुश्मनों के साथ न केवल यह कि विजयी वाला बर्ताव नहीं किया जबकि उन्होंने आम क्षमा का आदेश दे दिया और उन्होंने इस मानवता प्रेमी कार्यवाही से मक्कावासियों का दिल भी जीत लिया। जब पैग़म्बरे इस्लाम काबे के निकट पहुंचे और उन्होंने उस लंबी लकड़ी से जो उनके हाथ में थी, काबे में मौजूद मूर्तियों को मार कर गिरा दिया। जब पैग़म्बरे इस्लाम को काबे के ऊपर एक मूर्ती दिखी तो उन्होंने हज़रत अली से कहा कि मैं बैठता हूं और तुम मेरी पीठ पर खड़े होकर उक्त मूर्ति को ज़मीन पर गिरा दो। इस तरह काबा एक बार फिर एकेश्वरवादियों का केन्द्र बन गया।

मक्के पर विजय ने अनेकेश्वरवादियों को भयभीत कर दिया और उनके दिल में डर बैठ गया। इसीलीए ताएफ़ के दो महत्वपूर्ण क़बीले हवाज़न और सक़ीफ़ आपस में परामर्श करने के बाद इस परिणाम पर पहुंचा कि मुस्लिम सेना के उन तक पहुंचने से पहले ही मुसलमानों से युद्ध के लिए स्वयं को तैयार किया जाए। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उस समय के प्रसिद्ध योद्धा मालिक बिन औफ़ नस्री के नेतृत्व में एक बड़ी सेना तैयार की गयी और सेना मुसलमानों से मुक़ाबले के लिए निकल पड़ी।

दूसरी ओर पैग़म्बरे इस्लाम 12 हज़ार की सेना के साथ उनसे मुक़ाबले के लिए निकल पड़े, इस सेना में दस हज़ार मदीनावासी थे जबकि 2 हज़ार मक्के के क़ुरैश थे। मुसलमानों की सेना की संख्या और उसके दबदबे ने कुछ लोगों को झूठे घमंड में ग्रस्त कर दिया कि हम पराजित ही नहीं हो सकते! इस ग़लत कल्पना और दुश्मन को कमज़ोर समझने और उनके आत्मबल और आत्मिक शक्ति की अनदेखी करने के कारण मुसलमानों को बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा, विशेषकर यह कि मालिक बिन औफ़ ने अपने साथियों को आदेश दिया था कि हुनैन की ओर से जाने वाले रास्ते के मार्ग में एक टीले के पीछे छिप जाएं और जैसे ही मुस्लिम सेना यहां पहुंच उन पर तीरों की बारिश कर दें और उनको यहीं ढेर कर दें, इस पूर्व नियोजित योजना ने मुसलमानों के आत्मबल पर इतना अधिक प्रभाव डाला कि मुसलमानों की सेना के अधिकतर लोग भय से भागने ही वाले थे।

इन कठिन परिस्थितियों में लगभग दस लोग ही पैग़म्बरे इस्लाम के पास बाक़ी बचे और सब भाग निकले, इन लोगों ने अपनी जान की बाज़ी लगा पैग़म्बरे इस्लाम की रक्षा की जिनमें हज़रत अली सबसे आगे थे। वह परवाने की तरह रसूलुल्लाह के इर्द गिर्द घूमकर हमले कर रहे थे और उनके निकट आने वाले दुश्मनों का काम तमाम कर रहे थे। इस युद्ध में हज़रत अली का साहस और बलिदान देखने योग्य था। हज़रत अली ने हवाज़न के चालीस आदमियों पर अंधाधुंध हमला कर दिया और सबका काम तमाम कर दिया। आख़िरकार अबू जरूल नामक सेनापति के मारे जाने के कारण हवाज़न की सेना का आत्मबल गिर गया और उसके बाद धीरे धीरे मुस्लिम सेना ने अपना आत्म बल जुटाया और ताएफ़ में उनके दुर्ग को अपने घेर में ले लिया। इसी बीच हज़रत अली ने अनेकेश्वरवादियों के एक अन्य सेनापति नाफ़ए बिन ग़ीलान का काम तमाम कर दिया और उसके बाद अनेकेश्वरवादियों ने भागना शुरु कर दिया और कुछ ने भय की स्थिति में इस्लाम स्वीकार कर लिया।

इसके अतिरिक्त क़िले के घेराव के दौरान पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली को ताएफ़ के आसपास की मूर्तियों को तोड़ने की ज़िम्मेदारी दे रखी थी। शिया मुसलमानों के प्रसिद्ध धर्मगुरु शैख़ मुफ़ीद हज़रत अली की इस जंग में प्रभावी उपस्थिति की ओर संकेत करते हुए कहा कि इस युद्ध में अमीरल मोमेनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिक के गुणों और उनकी विशेषताओं पर चिंतन करें और इसकी वास्तविकताओं पर चिंतन मनन करें, तब आपको पता चलेगा कि इस युद्ध में हज़रत अली ने समस्त विशेषताएं और गुण प्राप्त कर लिए और उनके बीच कोई भी उनके समान नहीं होगा और कोई भी भागीदार नहीं होगा।