#इस्लाम ने मनुष्य को ज़िम्मेदार इन्सान बनाया : अल्लाह के ख़ास बन्दे पार्ट 22

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पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के जीवन के अंतिम क्षण थे सभी उनके आप- पास जमा थे सब उनकी हालत से चिंतित व दुःखी थे इसी बीच पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी आंखें खोली और फरमाया मेरे भाई को मेरे पास बुलाओ ताकि वह मेरे पास बैठे।

सब लोग अच्छी तरह जानते थे कि पैग़म्बरे इस्लाम का उद्देश्य हज़रत अली के अलावा कोई और नहीं है। यह सुनना था कि हज़रत अली ने स्वयं को तुरंत पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में पहुंचाया। जब हज़रत अली पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में पहुंचे तो उन्होंने आभास किया कि पैग़म्बरे इस्लाम अपनी जगह से उठना चाहते हैं। हज़रत अली ने पैग़म्बरे इस्लाम को बिस्तर से उठाया। समय नहीं बीता था कि पैग़म्बरे इस्लाम के पावन अस्तित्व से मौत के चिन्ह स्पष्ट हो गये और पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली की गोद में इस नश्वर संसार से प्राण त्याग दिया। हज़रत अली अपने एक भाषण में इस विषय को बयान करते हुए फरमाते हैं पैग़म्बरे इस्लाम की जान ऐसी स्थिति में निकली जब उनका सिर मेरे सीने पर था, मेरे हाथों पर उनकी जान निकली और मैंने तबुर्रक या प्रसाद के तौर पर अपने हाथों को अपने चेहरे पर मल लिया। उसके बाद उनके शरीर को ग़ुस्ल दिया यानी नहलाया।

पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद मुसलमानों को जिस चीज़ का सामना हुआ वह पैग़म्बरे इस्लाम की मौत का खंडन था! उमर बिन ख़त्ताब पैग़म्बरे इस्लाम के घर के सामने खड़े होकर उन मुसलमानों को जान से मारने की धमकी देते थे जो यह कहते थे कि पैग़म्बरे इस्लाम का निधन हो गया है। पैग़म्बरे इस्लाम के चाचा जनाब अब्बास और पैग़म्बरे इस्लाम के दूसरे साथी उस स्थान पर पवित्र कुरआन की तिलावत कर रहे थे जहां पैग़म्बरे इस्लाम का स्वर्गवास हुआ था परंतु हज़रत उमर अपना काम जारी रखे हुए थे यहां तक कि उनके दोस्त हज़रत अबू बकर मदीना के बाहर से आ गये। हज़रत अबू बकर ने पवित्र कुरआन के सूरये ज़ोमर की 30वीं आयत की तिलावत की जिसमें महान ईश्वर कहता हैः तुम्हें मौत आयेगी और दूसरे भी मरेंगे। जब हज़रत अबू बकर ने इस आयत की तिलावत की तो उमर शांत हो गये। उसके बाद हज़रत उमर ने पूछा कि यह कुरआन की आयत है? तो अबू बकर ने कहा हां!

हज़रत अली जब पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र शरीर को गुस्ल दे रहे थे तो उसी समय सक़ीफ़ा बनी साएदा का मामला सामने आया जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी के चयन के विषय पर चर्चा हो रही थी। सक़ीफ़ा बनी साएदा वह स्थान था जहां क़बीलों के समस्त मामलों व समस्याओं के बारे में विचार- विमर्श होता था। वहां अंसार अर्थात मदीना के रहने वाले कुछ लोग उत्तराधिकारी के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम की वसीयत पर ध्यान दिये बिना एकत्रित थे। उस समय वहां अबू उबैदा, हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर भी मौजूद थे। अंसार के मध्य ख़ज़रज और औस नाम के दो कबीले थे जिनके मध्य पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी के चयन को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा थी। हज़रत अबू बकर, उमर और अबू उबैदा ने इस मतभेद का लाभ उठाकर कहा कि पैग़म्बर क़ुरैश के कबीले के हैं और अरब अपने उपर ग़ैर कुरैश कबीले को शासक के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। इसी प्रकार अबू बकर ने कहा कि खिलाफत व शासन केवल कुरैश के योग्य है क्योंकि वे शराफत और खानदान की दृष्टि से मशहूर हैं और कबीलों में विशिष्ट। मैं आप लोगों की भलाई के लिए दो में से एक व्यक्तियों के नाम का सुझाव देता हूं ताकि तुम जिसे चाहो खलीफा चुन लो और उसकी बैअत करो अर्थात उसके आज्ञापालन के प्रति वचनबद्ध हो जाओ। उसके बाद अबू बकर ने अबू उबैदा और उमर बिन खत्ताब का हाथ पकड़ा। उस वक्त अंसार की ओर से एक व्यक्ति ने कहा एक आदमी हमारी ओर से शासक बने और एक आदमी आपकी ओर से। इस पर हज़रत उमर ने कहा कि एक न्याम में दो तलवार नहीं हो सकती। यह कहकर उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया और अबू बकर के हाथ पर बैअत की। औस और ख़ज़रज कबीले के लोग भी प्रसन्न हुए कि चलो प्रतिस्पर्धी कबीले का कोई ख़लीफा नहीं हुआ और उन्होंने भी अबू बकर के हाथ पर बैअत कर दी। यह सब उस समय हुआ जब हज़रत अली, पैग़म्बरे इस्लाम के विशेष साथियों और बनी हाशिम के लोगों के साथ पैग़म्बरे इस्लाम के ग़ुस्ल व कफन और उनके दफ्न में व्यस्त थे। पैग़म्बरे इस्लाम के चाचा जनाब अब्बास खिलाफा के चयन के विषय से अवगत हो गये थे और उन्होंने हज़रत अली से कहा कि अपना हाथ लाइये मैं मुसलमानों के ख़लीफा के रूप में आपके हाथ पर बैअत करूंगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और फरमाया मैं अभी पैग़म्बर के गुस्ल व कफन और दफ्न में व्यस्त हूं। समय नहीं गुज़रा था कि अल्लाहो अकबर की आवाज़ उनके कानों में सुनाई पड़ी। हज़रत अली ने जनाब अब्बास से पूछा कि क्या बात है? उन्होंने हज़रत अली से कहा मैंने नहीं कहा था कि दूसरे बैअत लेने में आपसे से आगे निकलना चाहते हैं? अबू सुफयान ने सारी बातें सुनी और वह भी हज़रत अली के सामने आया और उसने कहा कि अपना हाथ दीजिए ताकि मैं आपसे बैअत करूं ताकि मुसलमानों के ख़लीफ़ा के रूप में आपके हाथ पर बैअत करूं और जब भी मैं आपके हाथ पर बैअत करूंगा तो अब्दे मनाफ़ की संतान में से कोई भी आपका विरोध नहीं करेगा और अगर वे आपके हाथ पर बैअत करते हैं तो कुरैश में से कोई भी आपकी बैअत करने से विरोध नहीं करेगा और उसके बाद सारे अरब के लोग आपको शासक के रूप में स्वीकार करेंगे किंतु हज़रत अली अबू सुफियान को अच्छी तरह से जानते थे इसलिए उन्होंने उसकी बात स्वीकार नहीं की और कहा कि तुम एसा काम करना चाहते हो जिसे मैं नहीं चाहता।

निःसन्देह, अबू सुफ़यान इस्लाम का पुराना घोर शत्रु था और हज़रत अली उसको अच्छी तरह से जानते थे कि वह इस रास्ते से मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा करना चाहता है। अगर हज़रत अली उस दिन उसके सुझाव को स्वीकार कर लेते और बंद घर में दूसरे हज़रत अली के हाथ पर बैअत करते तो इतिहास इस बैअत के बारे में वहीं निर्णय करता जो आज हज़रत अबूबक्र की बैअत के बारे में कह रहा है और वही बात कही जाती। क्योंकि हज़रत अली की ख़िलाफत दो स्थिति से अलग नहीं थी। खिलाफत या तो इमाम, ईश्वर और उसके पैग़म्बरे की ओर से नियुक्त की गयी थी या उसकी ओर से नियुक्त नहीं की गयी थी पहली स्थिति में दूसरों से बैअत लेने की ज़रूरत नहीं थी। क्योंकि अगर बैअत ली जाती तो यह एक प्रकार से ईश्वर के आदेश की उपेक्षा थी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने वर्षों इस्लाम के प्रचार व प्रसार और उसकी रक्षा के लिए अथक प्रयास किया था और रणक्षेत्र में अपनी जान को हथेली पर रखकर जेहाद किया इसलिए वे नहीं चाहते थे कि ईश्वरीय धर्म में किसी भी प्रकार की हेराफेरी हो। दूसरी स्थिति में अगर वह अब्बास और अबू सुफ़ियान जैसे लोगों की बैअत से ख़लीफ़ा बनते तो फिर उनकी ख़िलाफत का वही हाल होता जो हज़रत अबूबक्र की ख़िलाफ़त का हुआ। क्योंकि पहले ख़लीफा अबूबक्र के निकटतम साथी दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर थे जब कुछ समय के बाद उन्हें अबूबक्र को ख़लीफा चुनने की बात याद आई तो उन्होंने कहा था कि अबूबक्र को जल्दी में ख़लीफ़ा चुना गया था जिसकी बुराई से अल्लाह ने रोक लिया।

अंततः सक़ीफ़ा में ख़लीफ़ा चुनने का विषय समाप्त हो गया। इस प्रकार हज़रत अबूबक्र को ख़लीफ़ा चुन लिया गया। हज़रत अली अपने कुछ साथियों के साथ हुकूमत से अलग हो गए लेकिन एकता के लिए आम जनमत को अवगत करने के बाद उन्होंने सरकार के विरोध का मार्ग नहीं चुना। वे क़ुरआन की व्याख्या करते थे और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की समस्याओं का समाधान करते थे। मुसलमानों के बीच इस प्रकार से फैसले करते थे कि वे हतप्रभ रह जाते थे और जब दूसरे धर्मों के लोग भ्रांति उत्पन्न करते थे या उनको कोई शैक्षिक समस्या होती थी तो हज़रत अली सामने आते थे और इन समस्याओं का समाधान किया करते थे। इस प्रकार वे इस्लाम की व्यक्तिगत और सामाजिक रूप में सेवा करते थे। मुसलमनों के बीच हज़रत अली को विशेष महत्व प्राप्त था। इस दृष्टि से भी कि वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिवार से थे और इस दृष्टि से भी कि विभिन्न अवसरों पर पैग़म्बरे इस्लाम ने उनकी प्रशंसा की थी। दूसरी बात यह कि क़ुरआन की जानकारी में वे सबसे आगे थे।

हज़रत अली को एक अन्य विशेषता यह प्राप्त थी कि बाग़े फ़िदक उनके अधिकार में था। यह वह चीज़ थी जिससे आर्थिक दृष्टि से ख़िलाफ़त के लिए समस्याएं उत्पन्न हो सकती थीं। इसी विषय के दृष्टिगत ख़िलाफ़ा ने उसे उनसे छीन लिया। क्योंकि यह चीज़ हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज्ञान और ईमान की भांति नहीं थी जिसे उनसे छीना नहीं जा सकता था।

बाग़े फिदक
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बाग़े फिदक वास्तव में बहुत उपजाऊ भूमि थी जो मदीना नगर से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थी। यह, अरब में रहने वाले यहूदियों की संपत्ति थी। यहां के रहने वाले यहूदी ख़ैबर युद्ध के बाद इस बात के लिए प्रतिबद्ध हुए थे कि इसकी आधी पैदावार पैग़म्बरे इसलाम को देंगे और स्वयं मुसलमान सरकार की छत्रछाया में रहेंगे। उन्होंने यह वचन भी दिया था कि वे मुसलमानों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करेंगे। सूरे इसरा की 26 वीं आयत में महान ईश्वर कहता है कि अपने परिवार के सदस्यों, निर्धनों और दरिद्रों के अधिकार को उन्हें दे दो।” पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपनी सुपुत्री को फ़िदक को दे दिया था परन्तु अबूबक्र के ख़लीफ़ा बन जाने के बाद उन्होंने फिदक को हज़रत फ़ातेमा से छीन लिया था। एक वरिष्ठ सुन्नी इतिहासकार इब्ने अबिल हदीद, फ़िदक के छीने जाने के बारे में लिखते हैं कि मैंने एक धर्मगुरू से इस प्रकार कहा कि फिदक गांव इतना बड़ा नहीं था कि कोई विशेष महत्व रखता हो और वहां पर खजूर के मात्र कुछ पेड़ थे। इसलिए वह इतना महत्वपूर्व नहीं था कि हज़रत फ़ातेमा के विरोधी उसको छीन लेने की लालसा करते। इस पर उस शिया धर्मगुरू ने मेरे जवाब में कहा था कि तुम इस बात में ग़लती कर रहे हो। वहां पर खजूर के पेड़ वर्तमान समय में कूफे के खजूर के पेड़ों से कम नहीं थे।

निश्चित रूप में फिदक को छीनने का उद्देश्य यह था कि हज़रत अलीकहीं उसकी आय से सरकार के विरुद्ध मुक़ाबले पर न आ जाएं। यही कारण था कि उन्होंने न केवल यह कि हज़रत फ़ातेमा को फदक से वंचित कर दिया बल्कि समस्त बनी हाशिम और अब्दुल मुत्तलिब की समस्त संतान को उनका वैध अधिकार देने से भी वंचित कर दिया ताकि ये लोग आर्थिक दृष्टि से बुरी हालत में रहें और उनके मन में कभी भी सरकार के विरुद्ध उठ खड़े होने की भावना पैदा न हो।