इस्लाम ने सब से पहले महिलाओं को अधिकार दिये : अमेरिकन सिस्टर लिसा

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Sikander Kaymkhani
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★अमेरिकन सिस्टर लिसा वोग्ल हामिद★

लोग कहते हैं की इस्लाम महिलाओ के हक़ को छीनता है, पर ऐसा कुछ नही है इस्लाम उल्टा महिलाओं को और हक़ देता है। इस्लाम एक नारीवादी धर्म है। हम आज महिलाओं की बातें करते हैं पर इस्लाम आज से 1400 साल पहले ही महिलाओं को हक़ दे चूका है और ऐसा क़ुरआन में लिखा है। और यही बात इस्लाम की मुझको बहुत पसंद है। उस महिला ने कहा की इस्लाम ऐसा कुछ नही कहता है महिला को कुछ नही करना चाहिए।

अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबराकातुह,

मेरा नाम लिसा है। मेरी उम्र 31 साल है। मैं एक ईसाई खानदान से थी। मेरे पिता कैथोलिक थे पर मेरी माँ एक रूढ़िवादी ईसाई बैप्टिस्ट थी। तो मेरा इस्लाम में आना मेरे परिवार के लिए एक बहुत ही बड़ा मुद्दा था। मेरी माँ ने मुझे बिलकुल अपनी तरह बनाना चाहती थी और मैं उनकी तरह बनी भी। मेरी नैतिकता भी उनकी तरह थी, मेरा काम करने का तरीका भी उनकी ही तरह था, हम दोनों की सब बातें एक दुसरे से मिलती थी।

पर मैं उनकी तरह धार्मिक नही नही थी। जैसा की मैंने बताया की मेरी माँ एक रूढ़िवादी बैप्टिस्ट थी पर मुझे ईसाई धर्म ज़्यादा पसन्द था मैं जब थोड़ी बड़ी हुई तो मैं क्रिस्चियन कैंप में भी जाने लगी थी।

मुझे याद है की जब मैं 15 साल की थी। मैं मिननासोटा में एक “यंग लाइफ कैंप” में गई थी। वहां पर यह करना होता था की सबको एक साथ हो कर कहना पड़ता की ईसा ही मेरे ईश्वर हैं। मैंने भी ऐसा ही किया। उस समय मेरी उम्र 15 साल थी, तो कोई 15 साल की उम्र में खोज बीन नही करता, जो कोई भी कुछ कहता है, मानता है हम वही मान लेते हैं।

मैं खुद में यह सोचने लगी की अगर किसी को कभी बताया भी न गया हो की बाइबिल क्या है तो क्या वह नरक में जाएगा क्योंकि बाइबिल में ऐसा लिखा था की जो बाइबिल नही पढ़ेगा तो वह नरक में जाएगा। इससे मुझे ईसाइ धर्म पर शक़ होने लगा पर फिर मैं कहती नही मैं ईसा को मानती हूँ।

फिर मैं कॉलेज जाने लगी और वहां पर मुझे कई मुसलमान दोस्त मिले उनमे से कई लोग मोरक्को से थे। मैं उनके ही साथ रहती थी। एक दिन मैंने उनसे कहा की मैं तम्हारे जैसे कपडे पहनना चाहती हूँ। तो उसने कहा ठीक है और उसने मुझे अपना स्कार्फ़ दे दिया, मैंने उससे पुछा की इसको क्या कहते हैं। उसने बताया की इसको अबाया बोलते हैं।

मैं पता नही क्यों, पर 3 महीने तक रोज़ फज्र की नमाज़ में उठती थी और रोज़ अबाया और हिजाब पहनती थी। मैं ये सब मुसलमान के नाते नही बल्कि यूँही करती थी। मैं ऐसा शायद इसलिए करती थी की मैं इसको देख कर थोड़ा उत्साहित थी और मैं सोचती थी की यह एक नए तरह का कपड़ा है।

मैं उनके साथ रही पर मैं और वो ज़्यादा बात नही करती थीं,क्योंकि वह अरबी बोलती और मैं इंग्लिश। पर फिर भी मैंने थोड़ी बहुत अरबी सीख ली। फिर मैं अपने घर आ गई। पढाई पूरी हो गई थी और मैं एक बैंक में काम करने लगी। एक मुसलमान देश ‘मोरक्को’ में रहते हुए भी मुझे इस्लाम के बारे में कुछ नही पता था।

मैंने बैंक में नौकरी छोड़ दी क्योंकि मुझको ब्याज निकालना अच्छा नही लगता था। मैं हमेशा से ही फोटोग्राफर बनना चाहती थी, क्योंकि यह एक बहुत रचनात्मक काम होता है।

मैंने सब कुछ छोड़ दिया और फ्लोरिडा में एक फोटोग्राफी स्कूल चली गई। उसी समय मैंने और कुछ करने की भी सोचा। और मैं शहर गई कुछ काम करने के लिए तो उन्होंने मुझे दस्तावेज़ तैयार करने को बोले और कहा की विषय अपनी मर्ज़ी का हो सकता है। मैंने हिजाब को अपना विषय बनाने को सोचा और उसकी वजह यह थी की मैं मोरक्को में रही और मैंने 3 महीनो तक हिजाब पहना भी पर फिर भी मुझे नही पता था की हिजाब क्या होता है।

मैं एक महिला के पास गई उन्होंने हिजाब पहना हुआ था। मैंने उनसे कहा की क्या मैं आपका इंटरव्यू ले सकती हूँ। उन्होंने कहा की हाँ बिलकुल। तो मैंने उनसे कई आम तरह के सवाल किये। मैंने उनसे पुछा की आप लोग ये क्यू पहनते हो? लोग देख कर क्या बोलते है? आपको गर्मी नही लगती?

जब उन्होंने जवाब दिया तो मेरी आँखें खुल गई। उन्होंने कहा की तुम ईसाई हो न? मैंने कहा हाँ। तो वह बोली की बाइबिल में कोरिंथियंस अध्याय 11 और आयत 6 में लिखा है की तुम को भी हिजाब पहनना चाहिए। मैंने कहा की सच्ची मुझे ऐसा नही पता था। और फिर उन्होंने मुझे ऐसी ऐसी बातें बताई की सच में मेरी आँखें खुल गई की इस्लाम सच में हर बातों का तर्क रखता है।

लोग कहते हैं की इस्लाम महिलाओ के हक़ को छीनता है, पर ऐसा कुछ नही है इस्लाम उल्टा महिलाओं को और हक़ देता है। इस्लाम एक नारीवादी धर्म है। हम आज महिलाओं की बातें करते हैं पर इस्लाम आज से 1400 साल पहले ही महिलाओं को हक़ दे चूका है और ऐसा क़ुरआन में लिखा है। और यही बात इस्लाम की मुझको बहुत पसंद है। उस महिला ने कहा की इस्लाम ऐसा कुछ नही कहता है महिला को कुछ नही करना चाहिए।

उन्होंने मुझे बताया की कोई औरत छोटे कपड़े पहनती है या वो और भी ज़्यादा बेशर्म है तो की उसको कोई अच्छा कहेगा, क्या उसको लोग नारीवादी कहेंगे? सच में उनकी बातें सोचने वाली हैं।

मैं अपने घर आई और मैंने बाइबिल खोला और मैंने देखा की हाँ सच में बाइबिल में लिखा था। तब से मेरी इस्लाम को लेकर रुचि बढ़ गई और मैंने यह निर्णय किया की अब मैं क़ुरआन में देखूंगी की क़ुरआन हिजाब के बारे में क्या कहता है। क्योंकि मैंने जब बाइबिल देखा था तो उसमे लिखा था की अगर तुम हिजाब नही पहनती तो अपना सर मुंडवा लो, मुझे यह अच्छा नही लगा क्योंकि यह बहुत बुरी तरह बताया गया था। पर क़ुरआन इसी बात को बहुत अच्छे से समझता है।

मैंने इस्लाम की सब बातों को जानना शुरू कर दिया और मैं इस्लामिक किताबें और यूट्यूब पर विडियो भी देखने लगी जिससे मुझे बहुत मदद मिली और फिर जैसी जैसे वक़्त गुज़रता गया। और मुझे 3 महीने हो गए थे और मैं अब यह मानने लगी थी की मैं मुसलमान हो जाउंगी।

मैं अभी शहादह पढ़ने के लिए तैयार नही थी। मैं हिजाब पहनने के लिए तैयार थी। मैं हिजाब पहनने लगी। मैं कहीं भी जाती तो सब मुझसे पूछते की तुमने इसे क्यू पहना है? और कई जगह तो ऐसी होती की मुझको बोल दिया जाता की आप हिजाब उतार कर ही अंदर आ सकती हो।

मुझे बहुत बुरा लगता पर मैं अपने इरादे पर बनी रही और अल्लाह पर भरोसा रखा और मैं हिजाब पहनती रही। उसके 3 महीने बाद जब मैंने बहुत खोज की और माना की हाँ मेरे लिए यही सही धर्म है। तो मैंने शहादह पढ़ने की सोच लिया और मैं मस्जिद गई। 11 जुलाई, 2011 को शुक्रवार को मैं गई तो वहां पर एक महिला थी उन्होंने पुछा मुझसे की तुम इस्लाम में आने के लिए आई हो? मैंने कहा हाँ।

मैंने अपना शहादह पढ़ा और मुझे इस्लाम में आने के बाद बहुत शान्ति मिली। मेरी माँ जो की मुझे हमेशा समझाती थी की हमेशा सुलझे हुए दिमाग से सोचना चाहिए और हर अच्छी बुरी बात को स्वीकार करना चाहिए। पर वह खुद मेरी बात को स्वीकार नही कर पाईं। पर धीरे धीरे वो भी मान गई। मैं मानती हूँ की मेरी इस्लाम में आने की कहानी और लोगो के सामने कुछ भी नही है जो इस्लाम में होने की वजह से बहुत कुछ सहते हैं।