उप्र सामूहिक विवाह योजना : कहीं विवाह नकली है तो कहीं टेंट, खाने और तोहफों में हुआ घोटाला

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अनुराग मिश्रा
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शाहजहांपुर।योगी सरकार गंगा की सफाई में तो कुछ खास कर नहीं पाई लेकिन बहती गंगा में हाथ धोने के आदी उत्तर प्रदेश के सरकारी तंत्र पर ही अगर वह नकेल कस सके तो कम से कम भ्रष्टाचार की गंदगी से तो राज्य को कुछ हद तक उबारा ही जा सकता है।
सामूहिक विवाह योजना समाज कल्याण विभाग की है, लेकिन योजना के जिलों में पहुंचते ही यह योजना समाज कल्याण अधिकारी नहीं बल्कि जिलाधिकारी की निगरानी में चली जाती है। वहां से आयोजन करवाने की जिम्मेदारी मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) को दी जाती है। आयोजन में हिस्सा लेने वाले लोग ऑनलाइन आवेदन करते हैं, उनका सत्यापन ग्राम प्रधान से लेकर बीडीओ और डीडीओ तक करते हैं। चरण दर चरण एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए लाभार्थियों का सत्यापन होता है और इसमें स्पष्ट जिम्मेदारी किसी की नहीं तय हो पाती।
सरकार की ओर से 35 हजार रुपए खर्च किए जाते हैं. इसमें से 20 हजार रुपए विवाहित जोड़े को एकाउंट पेई चेक के रूप में दिए जाते हैं और 10 हजार रुपये के तोहफे दिए जाते हैं. इन तोहफों में गृहस्थी का जरूरी समान, बर्तन, चांदी की बिछिया-पायल और कपड़े शामिल हैं।इसके अलावा 5 हजार रुपये टेंट और खाना आदि पर खर्च होते है।
आज सामूहिक विवाह में 301 जोड़ों का विवाह संपन्न हुआ जिसमें दो आचार्यों ने माइक से मंत्र बोलकर विवाह सम्पन्न करवाया।कोई हवन नही किसने कितने फेरे लिए ।सही मायने में कहा जाय तो समाज को इस योजना का विरोध करना चाहिए।
आज के सामूहिक विवाह समारोह में 301 जोड़ो का विवाह हुआ जिसमें लगभग 1 करोड़ रुपया खर्चा हुआ।
15 लाख रुपाया टेंट और खाने और खर्च हुआ यदि इतना रुपया इन लाभार्थियों को मिला होता तो शायद इनका कुछ भला होता।30 लाख रुपया का सामान बांटा गया जिसमें कुछ तोहफे भी कई उद्योगपतियों ने दिए।लेकिन उनको भी इसी में शामिल कर लिया गया।
खास बात यह है कि इस योजना के जिम्मेदारी कई अधिकारियों की है लेकिन कोई कमी पाए जाने पर कार्यवाही केवल ग्राम विकास अधिकारी पर की जाती है।नाम न छापने की शर्त पर एक ग्राम विकास अधिकारी ने बताया कि यह काम समाज कल्याण विभाग है।उन लोगों का हाल यह है जैसे मास्टर से कहा जाय कि वह पोस्टमार्टम करे।