उसके बाद आरएसएस भाजपा सरकार ने कहा कि ये नहीं चलेगा

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Satyendra PS
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उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग ने कुछ रोज पहले डिग्री कॉलेजों के शिक्षा संकायों के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर की39 वैकेंसी निकाली। 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के मुताबिक 12 सीटें किसी तरह रिजर्व की गईं। उसके बाद आरएसएस भाजपा सरकार ने कहा कि ये नहीं चलेगा, विभागीय रोस्टर के मुताबिक आरक्षण लागू होगा।

फिर विभागीय रोस्टर की गणना की गई। 39 सीटों में ओबीसी के लिए 2 सीटें और अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 1 सीट आरक्षित की गई। नई व्यवस्था के मुताबिक 39 वैकेंसी में से 27 प्रतिशत 2 सीट हुई और 48 सीटों का 22.5 प्रतिशत 1 आया।

अभी परिणाम आया है। 39 में से 18 सीटों पर ओबीसी सलेक्ट हुए हैं और 2 सीट पर एससी कैंडीडेट चुने गए हैं। ओबीसी कैंडिडेट,वह भी लड़की, कुसुमलता कटियार ने टॉप किया है।
जानते हैं कि यह अजूबा कैसे हो गया? कैसे एससी और ओबीसी ने 39 में से 20 सीटों पर कब्जा जमा लिया, जबकि सिर्फ 3 सीटें आरक्षित की गई थीं?

उसकी गणित बताते हैं।
इसमें 200 नंबर की लिखित परीक्षा होती है और 30 नंबर का साक्षात्कार होता है। पहले खानदानी रूप से आरक्षण लिए हरामखोर प्रोफेसर, इंटरव्यू करने वाले लोग एससी, एसटी, ओबीसी को 30 में से शून्य अंक देते थे, जिससे इनका चयन न हो पाए।

मामला कोर्ट में गया। कोर्ट ने आयोग के गुरुघंटालों से पूछा कि जो लड़का लिखित परीक्षा में इतना शानदार नंबर पाया है, जेआरएफ क्वालीफाई है, पीएचडी कर चुका है, उसके अंदर आपलोग ऐसी कौन सी खामी खोज डाले कि उसे 30 में से 0 नंबर दे डाला? कुछ लड़कों में कौन से सुरखाब के पर लगे थे जिन्हें 30 में 30 दे दिया?

उसके बाद इन हरामखोर बेशर्मों को कुछ पसीना छूटा। कोर्ट ने आदेश किया कि अभ्यर्थी को कम से कम 40 प्रतिशत अंक तो दिया ही जाना चाहिए। इस तरह से तय हुआ कि 30 में से 12 नंबर देना ही देना है।
(संभवतः यह नियम बना है कि अगर आप किसी को 40 प्रतिशत से कम नंबर देते हैं तो बताना होगा कि उस बच्चे को मूर्ख मानने का आधार क्या है, साथ ही अगर किसी को 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक दिए जाते हैं तो हरामखोरों को लिखकर बताना होता है कि उस बच्चे में कौन से सुरखाब के पर लगे हैं।)

इसी नियम का परिणाम हुआ कि इन जातिवादी हरामखोर, खानदानी आरक्षित नियोक्ताओं को जूते मारते हुए बच्चे 200 नंबर की लिखित परीक्षा में नंबर पा ही रहे हैं, मिनिमम 12 नंबर भी साक्षात्कार में पाकर चयनित हो जा रहे हैं।

यह भारत की जातिवादी व्यवस्था का घृणित चेहरा है। यह सरकार का घृणित चेहरा है, जिसने ऐसी व्यवस्था पेश की है कि 39 रिक्तियों का 27 प्रतिशत उसे 2 और 48 का 22.5 प्रतिशत 1 दिखता है।

और मेरिट इसे कहते हैं कि इतनी हरामखोरी के बावजूद 39 में से 20 स्टूडेंट ओबीसी और एससी सलेक्ट हुए हैं।

अभी भी अगर आयोग से साक्षात्कार में दिए गए अंकों का आंकड़ा मांगा जाए तो साक्षात्कार लेने वाले जातिवादी हरामखोर प्रजाति की चमड़ी खिंच जाएगी। ज्यादा उम्मीद है कि इन्होंने इन चयनित 22 अभ्यर्थियों को न्यूनतम 12 अंक के आसपास ही समेट दिया होगा।

(यह सूचना मुझे एससी-एसटी, ओबीसी वर्ग के पीड़ित बच्चे देते हैं। उन्हें भरोसा होता है कि मैं उनके दर्द को समझूंगा और कम से कम फेसबुक पर इसे पोस्ट कर दूंगा। करीब 10 दिन पहले मिली इस सूचना को आज पोस्ट कर पाया। आयोग के परिणाम की पीडीएफ फाइल बच्चों ने भेजी है, जो बहुत लंबी है। उसे खुद खोजकर पढ़ लें। वह अटैच नहीं हो पा रही है।)