एक तअससुर —– मोमिन की हर अदा से मोअत्तर फ़ज़ाएँ हैं

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मेहदी अब्बास रिज़वी
” मेहदी हललौरी ” वाया N Jamal Ansari
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एक तअससुर —–

अर्ज़ो समा से आती है ईमान की ख़ुशबू,
फैली हुई जहाँ में है रमज़ान की ख़ुशबू।

दिन रात सुबहो शाम इबादत का सिलसिला,
बेशक ये करबला के है सुलतान की ख़ुशबू।

छोटा बड़ा नहीं है जो आता नमाज़ में,
मस्जिद से आशकार है मीज़ान की ख़ुशबू।

मोमिन की हर अदा से मोअत्तर फ़ज़ाएँ हैं,
शरमा के मुंह छिपाती गुलिस्तान की ख़ुशबू।

उस घर में आती शौक़ से बरकत की न्यमतें,
अफ़्तार में जहाँ पे हो मेहमान की ख़ुशबू।

जिस ने भी बाबे इल्म का दामन पकड़ लिया,
उस के ज़ेहन पे छा गई क़ुरआन की ख़ुशबू।

पाकीज़ग़ी – ए क़ल्ब का इनआम है यही,
रहती है साथ साथ ही इमरान की ख़ुशबू।

रमज़ान में यक जा है इमामत की तजल्ली,
तेरह रजब व् नीमये शाबान की ख़ुशबू।

या रब जहां में अम्न की चलती रहे हवा,
हर इक जुबां पे दिल के है अरमान की ख़ुशबू।

दुनियां में सर बुलंद वही होता है ‘ मेहदी ‘
जिस को ख़ुदा ने बख़्शी है एहसान की ख़ुशबू।

मेहदी अब्बास रिज़वी
” मेहदी हललौरी “