एक सपना : मां और कड़ी

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Satya Patel
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संभव है कि मुझसे फेसबुक पर और जीवन में जुड़े कुछ मित्रों ने मेरे द्वारा कही कहानी- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना, पढ़ी होगी ! कुछ ने नहीं भी पढ़ी होगी ! क्योंकि रोजमर्रा के जीवन में मुझसे से जुड़े ऐसे अनेक साथी है, जो यह नहीं जानते कि मैं थोड़ा-बहुत लिखता-पढ़ता भी हूं। न उन्हें कभी मैंने अपनी तरफ़ से बताया। ख़ैर।

जिन्होंने वह कहानी पढ़ी होगी, संभव है कि वे मित्र कहानी के मुख्य पात्र डूंगा को भूले नहीं होंगे ! न ही डूंगा का सपना भूले होंगे और न ही उस सपने को पूरा करने की जद्दोजहद भूले होंगे ! डूंगा के साथ क्या हुआ यह भी जानते ही होंगे !

यह कहानी ठीक वैसी तो नहीं ! न मैं डूंगा और न मेरा संघर्ष डूंगा जैसा। फिर भी उस कहानी से काफी मिलती-जुलती कहानी है यह ।

बरसों से एक सपना था। मेरी मां का सपना। कि जब उसके बेटे बड़े होंगे, तो उसे कड़ी बनवा देंगे। मैं भी कभी-कभी सोचता कि मां को कड़ी बनवानी है।

कड़ी चांदी का जेवर , जो किसान परिवार की महिलाओं का एक प्रमुख गहना है।

मां के पैरों में जवानी के दिनों में कड़ी हुआ करती थीं। वह कड़ियां मेरे पिता की तरफ़ से बनवायी गयी थीं। उन्होंने मेरी मां और मेरी दादी दोनों के लिए डकाचिया के बालमुकुंद सुनार से कड़ियां बनवायी थीं।

पिता किसान और शौकिया पहलवान थे। पिता ने उन दिनों भूमि विकास बैंक से कुआं खुदवाने के लिए लोन भी लिया था, जो लगभग भर भी चुके थे। कुछ किस्त बाकी थी, तभी पिता की ज़िन्दगी में बहुत बड़ा तूफान आया। गांव की राजनीति और रंजीश से उपजा तूफान। जिसने पिता की ज़िन्दगी को तिनका-तिनका बिखेर दिया। इतना कि हम आज तक संभलने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि अब पिता को गये भी सत्रह-अठारह बरस हो गये।

तूफान में लड़खड़ाने की वजह से पिता बैंक का बचा हुआ लोन नहीं भर सके थेे। खेती ही छूट गयी थी। गृहस्थी बिखर गयी थी। पिता कभी जेल और कभी अस्पताल और यूं ही भटकन में रहते थे।

मां को सत्रह साल माइके में रहना पड़ा। जैसे – तैसे लोगों के खेतों में दाड़की कर हमें पाला-पोसा।

भूमि विकास बैंक अपना बचा लोन वसूलने का तगादा करने लगा था। लोन न चुकाने के एवज में ज़मीन नीलामी की प्रक्रिया करने लगा था।

उन हालात में मां ने अपने पैर में पहनी लगभग दो किलो चांदी की कड़ियां बेचकर ज़मीन बचायी थी।

तब मैं आठवी-नवीं कक्षा का छात्र रहा होगा। तभी से मां का सपना था कि उसके बेटे उसे एक दिन कड़ियां बनवाएंगे। लेकिन तब से अब तक क्षिप्रा में बहुत पानी बह गया। मां लगभग अस्सी की उम्र छू रही। आंखों पर चश्मा लग गया ऊंचा सुनने लगी। और भी कुछ बीमारियों ने घेर लिया है।
फिर भी मां की कड़ी पहनने की इच्छा बनी हुई है।

जब कभी मां कड़ी की बात करती। मैं कहता गाड़ी की किस्त भर रहा हूं। कभी मकान की किस्त भर रहा हूं। कभी बच्चों की फीस। आदि-आदि जीवन में जो चलता, वह कड़ी बनवाने की गुंजाइश नहीं छोड़ रहा था।

मां ने कभी डांट कर नहीं कहा कि कड़ी बनवा ही। बीच-बीच में मैंने अपनी जीवन साथी की तरह मां को भी समझाया कि क्या है धातु के इन टुकड़ों में ! और अब बुढ़ापे में कड़ी पहन कर क्या करना है ! इतना वजन उठाकर कैसे चलेगी। पैर दुखेंगे । देखती नहीं कि फलाने की मां ने कड़ी पहनी थी, उसके पैर काट कर कड़ी ले गए। ऐसा गहना किस काम का जिससे जान जोखिम में पड़े ! मां सुन लेती। कुछ नहीं कहती।

मैं मां की पीठ पीछे अपनी साथी से कहता कि मां के लिए कैसे भी कड़ियां बनवानी है। बच्चों की फीस बंद हो जाये। ये-वो किस्त बंद हो जाये। बस… फिर मां की कड़ियां बनवानी है। साथी भी हां में हां मिलाती।

फिर एक दिन मां ने कड़ी बनवाने का कहा। मैंने कहा कि तुझे कम सुनाई देने लगा, तो कान की मशीन ला देता हूं। अभी तेरी कमर का इलाज हो जाने दे। कड़ी भी बनवा दूंगा मां। कड़ी कहां भागी जा रही है।

मां ने कहा कि रहने दे कान की मशीन। पैर तो नंगे और कान में मशीन पहन कर क्या करना है ! मैं उस रात सिरपुर तालाब की पाल पर बैठ रोता रहा । सुबह घर लौटा। लगा कि कड़ियां मां की आखरी ख्वाहिश हैं।

मैंने तय किया कि कड़ी बनवानी है। यह नहीं किया तो जीवन व्यर्थ है। आते-जाते मां के नंगे पैर पर निगाह जाती, तो दिल में सुई सी चुभती। भीतर गीलापन महसूस होता।

फिर मैंने एक दिन अपने बाल सखा बहादुर पटेल से बात करी। उसे पूरी कथा सुनायी। फिर उसी की पहचान का सुनार तय हुआ। सुनार को जब मेरे बारे में और मां की कड़ी के बारे में बताया। आश्चर्य की बात यह हुई कि सुनार ने मेरे द्वारा कही कहानियों की किताब पढ़ी थी। शायद लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना भी पढ़ी हो !

सुनार ने कहा कि घर की बात है भिया । सत्तू भिया की मां अपनी मां और ख़ुशी-ख़ुशी कड़ी बना दी। आज मां के पैरों में पहना भी दी। मां ख़ुश है। मां के पैरों में कड़ी देख डुग्गु भी ख़ुश है। मेरी साथी भी ख़ुश है। मैं भी ख़ुश हूं, लेकिन इस वक़्त बहुत भावुक भी हूं। काश ! काश! डूंगा के जीवन में भी कोई एक ऐसा बाल सखा होता ! काश ! उसका लाल छींट की लूगड़ी का सपना पूरा हो सकता ! काश !

शुक्रिया कहकर अपने मित्र का मान कम नहीं करना चाहता। वैसे भी ऐसा करना मेरे स्वभाव के अनुरूप नहीं। यह बात मित्र भी जानता है।