और आप ओबीसी, दलित महादलित, सिख, जैन, बुद्धिस्ट बस कागज़ पर हिन्दू हैं

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Joher Siddiqui
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जाती के आधार पर आरक्षण मिलता है, अगर जाती को ख़त्म कर दिया जाए तो आरक्षण किस आधार पर मिलेगा? मतलब साफ है, अगर आरक्षण खत्म करना है तो जाती को ख़त्म करना होगा।

लेकिन जाती से पहले धर्म आता है, शायद ही आपको पता हो, सनातन धर्म के मानने वालों ने 1955 में अपने धर्म की आहुति देते हुए कई धर्मो को मिला कर एक जीवनशैली बनाई जिसे हिंदू नाम दिया, और उस जीवनशैली में सनातन धर्म की आस्था को डाल कर हिन्दू जीवनशैली को धर्म बना दिया।

उसके बाद कुछ घर्मो ने कानूनी लड़ाई लड़ते हुए अपने आपको हिन्दू जीवनशैली से अलग कराया जिसमे पारसी धर्म भी शामिल था। सिख समुदाय भी जद्दोजहद कर रहा है, कानूनी रूप से उन्हें सिख ‘धर्म’ की मान्यता मिले, आज भी हिन्दू मेर्रिज एक्ट 1955 के अनुसार ही सिख धर्म में शादियाँ होती है, और जायदाद का बंटवारा हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1956 के आधार पर ही होता है।

आज वीरशैव, ब्राह्मण, छेत्रिय, वैश्य, आर्या, दलित, महादलित, आदिवासी, बुध्दीस, जैन, सिख, महावीर हिन्दू कहलाते हैं, जबकि 1955 से पहले, सिर्फ ब्राह्मण, छेत्रिय, आर्य ही सनातिनि कहलाते थे, मतलब आज के हिन्दू। अगर आज, हिन्दू जीवनशैली से सभी धर्मों को आज़ाद कर दिया जाए तो लगभग 83% में कितने हिन्दू बच जाएंगे? (सॉरी, फिर हिन्दू जैसा कोई धर्म नहीं होगा, विश्व का सबसे पुराना धर्म ‘सनातन धर्म’ वापस आ जायेगा, जो कि आज कहीं नहीं है, कानूनी काग़ज़ पर भी नहीं)

अब समझने की ज़रूरत है, आख़िर खुद के धर्म की जीवनशैली ज़बरदस्ती 1955 में एक नया कानून बना कर दूसरे धर्मो पर थोपने की ज़रूरत क्यों पड़ गई। जिस वक्त ये कानून बना था सिर्फ, मुस्लिम, ईसाई और यहूदी हिन्दू नहीं थे, लेकिन आज पारसी और लिंगायत भी हिन्दू नहीं है।

असल मे ये धर्म का राजनीतिकरण था, जिसे कांग्रेस ने अलमि जमा पहनाया था, जिसपर आज बीजेपी का राजनीतिक करियर टिका है, ऐसा इस लिए किया गया की वो धर्म पर राजनीति कर मेन स्ट्रीम में बनी रहे, कागज़ पर हिन्दू ज़रूर 83% के आस पास हैं, लेकिन असल मे सनातन धर्म को मानने वाले वही हैं जो आज खुद को स्वर्ण कहलवाते हैं।

सोचिये जनगणना के वक़्त आपसे आपकी जाती पूछी जाती है, उसे नोट भी जाता है, लेकिन सरकार उसे प्रकाशित क्यों नहीं करती है? असल मे अगर उसने ऐसा कर दिया तो रणजीत का समीकरण ही टूट जाएगा, और हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 और हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1956 भंग कर सभी जाती के लोग अपने लिए अलग धर्मों की माँग कर देंगे, और हालात 1955 से पहले की तरह हो जाएगा, जब आदिवासी आदिवासी थे, दलित दलित, महादलित महादलित, सिख सिख, जैन जैन…… और हिन्दू सनातिनि…

आज, ये आप मे से, होने के बाद भी ‘स्वर्ण हिन्दू’ कहलाते हैं, और आप ओबीसी, दलित महादलित। सिख, जैन, बुद्धिस्ट तो बस कागज़ पर हिन्दू हैं, कम से कम हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 और हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1956 तो यही कहता है। फिर फायदा किसे हो रहा है, लगभग 4% वाली सनातन धर्म वाले अपने राजनीतिक फायदे के लिए बहुसंख्यक बने हुए हैं, और हिन्दू धर्म की वजह से ज़्यादातर सरकारी पदों पर विराजमान हैं, और उसी हिन्दू धर्म के नाम पर दूसरे धर्म वालों को अपने बनाये धर्म के अंदर समेत कर जाती में बाटते हुए आरक्षण दे कर नाम मात्र की सरकारी नौकरी दे रहे हैं। शुद्र दलित कहते हुए धुंदकरते हैं वो अलग।

अगर, सवर्णों को भी आरक्षण चाहिए तो उन्हें, हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 और हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1956 ख़त्म कर सभी ग़ुलाम मज़हबों को आज़ाद कर देना चाहिए, फिर वो खुद भी अल्पसंख्यक बन जाएंगे, इस तरह वो भी आरक्षण आराम से प्राप्त कर सकेंगे, लेकिन क्या वो ऐसा कर सकते हैं?