कभी कभी हमारी दुआएं क्यों क़ुबूल नहीं होतीं, जानिये!

Posted by

सच्चे दिल और नेक नियत के साथ उस से दुआ करेगा वह उसे ज़रूर पूरा करेगा, लेकिन अगर हमारी दुआ पूरी नहीं हुई तो उस के पीछे कई कारण हो सकते है।

अल्लाह ने अपनी पवित्र किताब क़ुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के द्वारा यह ऐलान किया है कि, जब कभी मेरे बंदे आप से मेरे बारे में पूछें तो कह दीजिए बेशक मैं (उनके) निकट हूँ, दुआ करने वाला जब मुझ से दुआ करता है मैं क़ुबूल करता हूँ, इसलिए उनको चाहिए वह मुझ से दुआ करें और मुझ पर ईमान ले आएँ, (सूरए बक़रह, आयत 186) कुछ लोगों ने रसूले ख़ुदा स.अ. से पूछा , अल्लाह को किस तरह पुकारें, क्या वह हम से क़रीब है उसे धीमी आवाज़ में पुकारें , या दूर है तेज़ आवाज़ से पुकारें? यह आयत ऐसे ही कुछ लोगों के सवाल के जवाब में आई थी, इस आयत में जो ध्यान देने के क़ाबिल बात है वह यह कि इस आयत में अल्लाह की ख़ास मेहेरबानी को देखा जा सकता है, जैसे मेरे बंदे, मेरे बारे में, पूछें तो कह दीजिए कि मैं ख़ुद उनके क़रीब हूँ, और जब वह मुझे पुकारेंगे मैं सुनूँगा वग़ैरह, और यह प्यार भरा रिश्ता उस समय होगा कि जब इंसान इस पूरे संसार के बनाने वाले को दिल से याद करे उसे वैसे ही पुकारे जैसे उस ने चाहा है, यह पूरा संसार उस की तसबीह और इबादत कर रहा है, (सूरए बक़रह, आयत 116) और इस धरती पर मौजूद हर कोई उस के सामने हाथ फैलाए है, (सूरए रहमान, आयत 29) हम सब को भी उस की बारगाह में दुआ और मुनाजात करनी चाहिए ता कि अल्लाह की इन आयतों में हम भी शामिल हो सकें।

क़ुर्आन और दुआ
1. दुआ में ख़ुलूस होना चाहिए, (सूरए मोमिन, आयत 14)
2. ख़ौफ़ और उम्मीद के साथ होना चाहिए, (सूरए आराफ़, आयत 56)
3. हमेशा डर, उम्मीद और लगाव के साथ होना चाहिए, (सूरए अंबिया, आयत 90)
4. अकेले में गिड़गिड़ा कर होना चाहिए, (सूरए आराफ़, आयत 55) 5. धीमी आवाज़ में होना चाहिए, (मुनाजात करें) (सूरए मरयम, आयत 3)

उसूले काफ़ी में सैकड़ों हदीसें दुआ की अहमियत उसके आदाब और बार बार दुआ करने के बारे में पाई जाती हैं। ( काफ़ी, जिल्द 2, किताबुद-दुआ) हमारी दुआ के क़ुबूल न होने का सबसे बड़ा कारण शिर्क और जेहालत है। अल्लामा तबा तबाई द्वारा लिखी जाने वाली मशहूर तफ़सीर अल-मीज़ान में सूरा ए बक़रह आयत न. 186 की तफ़सीर इस प्रकार है, अल्लाह ने वादा किया है कि जो भी ख़ुलूस, सच्चे दिल और नेक नियत के साथ उस से दुआ करेगा वह उसे ज़रूर पूरा करेगा, लेकिन अगर हमारी दुआ पूरी नहीं हुई तो उस के पीछे कई कारण हो सकते है।

जैसे –
1. वह दुआ हमारे हक़ में बेहतर नहीं थी।
2. अगर हमारे हक़ में बेहतर थी तो फिर हम ने सच्चे दिल और ख़ुलूस के साथ दुआ नहीं की थी, बल्कि ख़ुदा के अलावा भी उस दुआ में कोई शामिल था।
3. दुआ का क़ुबूल करना हमारे हित में नहीं था,

हदीसों के अनुसार ऐसी स्थिति में वह दुआ आफ़तों और मुसीबतों को हम से दूर करने में मदद करती हैं, या अल्लाह हमारी आने वाली नस्लों के लिए बचा के रखता है, या उस दुआ का लाभ हमें आख़ेरत में मिलेगा। उसूले काफ़ी में दुआ के रद्द हो जाने का कारण इस प्रकार बयान हुआ है, जो भी हराम तरीक़े से पेट भरेगा या अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर नहीं करेगा या ख़ुलूस के साथ दुआ नहीं करेगा उसकी दुआ क़ुबूल नही होगी। दुआ का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि काम काज छोड़ दिया जाए, बल्कि काम काज के साथ अल्लाह पर भरोसा कर के उस से दुआ करना है, इसी कारण हदीस में मिलता है कि, बिना कारण बेकार बैठे लोगों की दुआ क़ुबूल नहीं होती, शायद इसी कारण दुआ वाली आयत रोज़े वाली आयतों के बीच में आई है।