क़ब्रिस्तान से नसीहत कैसे हासिल करें, जानिये!

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इमाम काज़िम एक बार एक रास्ते से जा रहे थे आपकी नज़र एक जनाज़े पर पड़ी जिस को लोग क़ब्रिस्तान दफ़्न करने ले जा रहे थे, आप भी उन लोगों के साथ शामिल हो गए और क़ब्रिस्तान तक साथ गए, और जब उस मरने वाले को क़ब्र में उतारा जाने लगा तो आप ने एक जुमला कहा जिसको सुन कर कलेजा हिल जाता है और वह यह है कि वह दुनिया जिसका अंजाम कफ़न, ख़ाली हाथ और दो मीटर जगह हो उस दुनिया से शुरू से ही दिल नहीं लगाना चाहिए और आख़ेरत जिसकी शुरूआत ही इस दो मीटर के गढ्ढ़े से होती है उस पर ध्यान देना चाहिए उसके बारे में सोचना चाहिए और उससे डरना चाहिए।

क़ब्रिस्तान जाना और क़ब्रों के पास जा कर बैठना, क़ब्रों को देखना, मुर्दे को क़ब्र में उतरते हुए देखना, जब मुर्दे को क़ब्रिस्तान ले जाया जा रहा हो उस समय साथ साथ क़ब्रिस्तान तक जाना यह सब इंसान को प्रभावित कर ता है, जैसा कि हदीस में भी है कि जब किसी मरने वाले को क़ब्रिस्तान ले जाया जाए तो तुम यह सोंच कर उनके साथ शामिल हो कि जैसे तुम को उस ताबूत में लिटा कर ले जाया जा रहा है, और जनाज़े के पीछे पीछे चलने के आदाब में भी इस बात का ज़िक्र मिलता है कि उस समय बस यही सोंचो कि तुम को ताबूत में लिटा कर ले जाया जा रहा है इसी तरह जब मुर्दे को क़ब्र में लिटाया जाए तब भी तुम यही सोंचो कि तुम को लिटाया जा रहा है, और चूंकि यह घटना हमारी ज़िंदगी में बार बार पेश आती रहती है समाज में लोग इस दुनिया को छोड़ कर अल्लाह की बारगाह में हमेशा के लिए वापस चले जाते हैं इसलिए हदीसों में बयान की गई यह बात दूसरों के लिए नहीं बल्कि ख़ुद हमारे लिए नसीहत है, अगर कोई अधिक इस बारे में जानना चाहता है तो वह मफ़ातीहुल जेनान में इमाम अली अ.स. की उस मुनाजात को पढ़े जिसे आप कूफ़ा की मस्जिद में पढ़ा करते थे, जिसमें आपने आख़ेरत से संबंधित आयतों का भी ज़िक्र किया है, उस मुनाजात में बयान किया गया एक एक जुमला इंसान को क़ब्रिस्तान से नसीहत हासिल करने पर मजबूर करता है, लेकिन बहुत अफ़सोस की बात है कि अब दीनदारों में भी मुर्दे और क़ब्रिस्तान को देख कर आख़ेरत को याद करना कम होता जा रहा है, जैसाकि आप ख़ुद देख सकते हैं कि आजकल की मनोविज्ञान की किताबों में जितनी तेज़ी से Sexual instinct और इंसान के Intelligence के बारे में ज्ञान बढ़ता जा रहा है उतनी तेज़ी से मौत क़ब्र और आख़ेरत का ज्ञान कम होता जा रहा है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चों से मौत और आख़ेरत जैसे विषय पर बात नहीं करना चाहिए और किताबों में भी नहीं लिखना चाहिए, और अगर आप ध्यान दें तो हमारे यहां के क़ब्रिस्तान भी आबादी के बाहर ही होते हैं और अब क़ब्रिस्तान की हालत भी ऐसी हो गई है कि या तो जंगल जैसा है कि जहां इंसान ज़हरीले कीड़े मकोड़ों के डर से जाना पसंद नहीं करता या कुछ ज़्यादा ही साफ़ सुथरे हैं कि जहां क़ब्रिस्तान कम पार्क का ज़्यादा एहसास होता है और यही कारण बनता जा रहा है कि हमारे जवान जो हदीस में माहौल और आदाब बताए गए हैं जिन से इंसान नसीहत हासिल कर सकता है उस से दूर होते जा रहे हैं, जबकि अहलेबैत अ.स. की ज़िंदगी को अगर देखें तो वह क़ब्रिस्तान जाने और वहां से नसीहत और सीख हासिल करने पर बहुत ज़ोर देते हैं।

इमाम काज़िम एक बार एक रास्ते से जा रहे थे आपकी नज़र एक जनाज़े पर पड़ी जिस को लोग क़ब्रिस्तान दफ़्न करने ले जा रहे थे, आप भी उन लोगों के साथ शामिल हो गए और क़ब्रिस्तान तक साथ गए, और जब उस मरने वाले को क़ब्र में उतारा जाने लगा तो आप ने एक जुमला कहा जिसको सुन कर कलेजा हिल जाता है और वह यह है कि वह दुनिया जिसका अंजाम कफ़न, ख़ाली हाथ और दो मीटर जगह हो उस दुनिया से शुरू से ही दिल नहीं लगाना चाहिए और आख़ेरत जिसकी शुरूआत ही इस दो मीटर के गढ्ढ़े से होती है उस पर ध्यान देना चाहिए उसके बारे में सोचना चाहिए और उससे डरना चाहिए।

यह बात सही है कि हदीसों में ख़ुशी या ग़म के मौक़े पर क़ब्रिस्तान जाने का ज़िक्र नहीं मिलता लेकिन बहुत से बुज़ुर्ग उलमा की वसीयत और नसीहत में इस बात का ज़िक्र मौजूद है कि क़ब्रिस्तान जाया करो ताकि वहां का असर तुम्हारे वुजूद में दिखाई दे। दुनिया की चकाचौंध में मगन रहने वाले से क़ब्रिस्तान पुकार कर कहता है कि बहुत ज़्यादा ख़ुश मत हो इसलिए कि यहां की ख़ुशी बहुत ज़्यादा दिनों तक बाक़ी रहने वाली नहीं है, और जो दुनिया के कष्ट और तकलीफ़ों से परेशान हो कर दुखी रहते हैं उनसे कहता है कि क्यों इतना दुखी हो यह दुख यह तकलीफ़ ज़्यादा दिन के नही हैं मायूस मत हो यह ग़म के दिन बहुत जल्द ख़त्म हो जाएंगे इसी वजह से बुज़ुर्ग उलमा और पहुची हुई हस्तियां अपने शागिर्दों को नसीहत करते थे कि जितना ज़्यादा समय हो सके क़ब्रिस्तान में बिताया करो।

आयतुल्लाह क़ाज़ी तबातबाई के हालात में मिलता है कि वह नजफ़ के वादियुस्सलाम क़ब्रिस्तान बहुत ज़्यादा जाया करते थे, एक दो घंटे वहां जा कर बैठते थे, और कभी कभी तो कुछ लोग उनसे यह भी कह देते थे कि क्या आपके पास और कोई दूसरा काम नहीं है जो रोज़ाना घंटों यहां बैठे रहते हैं, ज़ाहिर है आपका लोगों की बातों पर ध्यान दिए बिना रोज़ाना जा कर बैठना दर्शाता है कि आपकी निगाह में क़ब्रिस्तान में जा कर बैठना समय की बर्बादी नहीं बल्कि आख़ेरत को याद करने का माध्यम है, हम अगर अपने समाज पर निगाह डालें तो बहुत से लोग हैं जिनको दो तीन घंटे की फ़िल्म देखने और क्रिकेट, हाकी और फ़ुटबाल के मैच देखने के लिए कई कई घंटे का समय मिल जाता है लेकिन वह जगह जहां मर के हम सबको दफ़्न होना है वहां जाने के लिए कुछ मिनट का भी समय नहीं मिलता। इसी तरह आयतुल्लाह जमाल गुलपाएगानी के बारे मिलता है कि आप कभी कभी पूरी रात क़ब्रिस्तान में ही रहते थे, हालांकि इस तरह के बुज़ुर्ग उलमा इतने बा अमल थे कि वह घंटों वहां केवल बैठते नहीं या केवल रात में वहां जा कर सोते नहीं बल्कि यह लोग क़ब्रिस्तान में क़ब्रों के अंदर जो हो रहा होता उसको देखते और अपने कानों से सुनते थे।

इसी तरह एक बुज़ुर्ग आलिम जिनका इंतेक़ाल क़रीब 40 साल पहले हुआ आयतुल्लाह तक़ी आमुली, वह बयान करते कि मैं एक बार क़ुम ज़ियारत के लिए गया, हज़रत फ़ातिमा मासूमा की ज़ियारत की फिर वहीं मजलिस हो रही थी उसमें जा कर बैठ गया, मजलिस ख़त्म होने के बाद मासूमा के हरम से क़रीब एक क़ब्रिस्तान में गया और जा कर सलाम किया, क़ब्रिस्तान में मुर्दे अपनी क़ब्रों से बाहर निकल कर बैठे हुए थे उन्होंने हमारे सलाम का जवाब दिया उसके बाद मैंने देखा कि क्योंकि मोहर्रम के दिन चल रहे थे इसलिए वह लोग सब बैठे ज़ियारते आशूरा पढ़ रहे थे, उसके बाद आप फ़रमाते हैं कि हर इंसान अपने अपने हिसाब से क़ब्रिस्तान से नसीहत हासिल कर सकता है।