कैसा अचरज था कि तुम वही किताब पढ़ रही थीं, जिसे मैं पढ़ चुका था…

Posted by

Sushobhit Singh Saktawat
=============
कैसा अचरज था कि तुम ठीक वही किताब पढ़ रही थीं, जिसे मैं पढ़ चुका था.

एक चेक उपन्यास. तुमने नाम बतलाया था तो मैं चहककर बोला- “ओह, यह तो पढ़ा है. मेरे पास भूरे रंग के कवर वाला हार्डबाउंड है. और तुम्हारे पास?”

तुमने मुझे किताब की तस्वीर भेजी थी. ठीक वही किताब थी, वही भूरे कवर का हार्डबाउंड. एक पारदर्शी सी पुलक हमारे बीच तैर आई. आख़िरकार.

तुमने कहा था, “तुम्हें याद है, पेज नम्बर 143 पर वो नायक क्या कहता है?”

तब मैंने शरारत से कहा था, “और तुम्हें मालूम है “वन फ़ोर थ्री” का क्या मतलब होता है?” तुम मुस्करा दी थीं.

“वन फ़ोर थ्री” अंग्रेज़ी भाषा का एक वाक्य था, जिसका मतलब था– “मैं तुम्हें प्यार करता हूं.”

मैंने पेज नंबर 143 पर उस वाक्य को एक बुकमार्क की तरह रख दिया था, जैसे लोग किताबों में संजोते हैं मोरपंख!

यह विदा से पहले की बात है.

उन दिनों की, जब हम एक दूसरे की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब रातें मुस्कराहटों से भरी होती थीं, इस हताशा से नहीं कि जल्द ही सवेरा होगा और तुम मुझसे थोड़ा सा और दूर चली जाओगी.

काश कि दिन ना उगे, और ठीक अभी नींद में डूबीं तुम मेरे पास यों ही बनी रहो, विदा के बावजूद, रातों की नीमख़ामोशी में यही सोचता मैं.

किंतु दिन उगता. दिन उस दिन भी उगा था, जब हमारी प्रतीक्षाओं का अंत हुआ, केवल इसीलिए कि एक दूसरे को विदा कह सकें.

तब, विदा की निशानी बतौर, मैंने कहा था– “क्या वह पेज नम्बर 143 वाला चेक उपन्यास हम एक-दूसरे से बदल सकते हैं? मेरी प्रति तुम रख लेना, तुम्हारी मैं रखूंगा, ख़ूब सहेजकर.”

तुम मुस्करा दी थीं, लेकिन वादा निभाया था. जब हम एक दूसरे से पहली बार मिले, एक दूसरे को विदा कहने, तो हमने वो किताब एक दूसरे से बदल ली.

मैंने किताब के पहले पन्ने पर लिखा– “तुम्हारे लिए, डोना मारिया”, जिस नाम से मैं तुम्हें बुलाता था.

तुमने किताब के पहले पन्ने पर लिखा– “तुम्हारे लिए, मेरे जे.”, जिस नाम से तुम मुझे पुकारती.

वो किताब विदा का स्मारक बन गई.

उस दिन की जितनी निशानियां थीं, वो सब मैंने उस किताब में सहेज लीं.

इस तरह वो किताब उस चाहना का संग्रहालय भी बन गई, जिसे मर जाना था, क्योंकि उसके जीते रहने की कोई तुक नहीं रह गई थी.

विदा का चुम्बन कभी समाप्त ना हो, यह भी भला कोई तुक हुई?

हाथ किताब भी हो सकते हैं.

हथेलियां गुलाब भी हो सकती हैं.

विदा से पहले, मैंने तुम्हारी हथेलियों को अपने हाथों में यों छुपा लिया था, जैसे लोग किताबों में गुलाब रखते हैं.

विदा से पूर्व इतना ही हुआ कि मैं उसके कोमल हाथों को सहलाता रहा, मानो इतने भर से टल जाएगी विदा!

लेकिन केवल प्रतीक्षा का अंत था, विदा अनंत थी.

ये जीवन ऐसी ही मायूसियों से मिलकर बना था.

ये जीवन ऐसा ही था बेतुका!

सुशोभित