क्या कश्मीर के मुसलमानों पर इसी तरह ज़ुल्म होता रहेगा?

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Mohd Sharif

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किसी मुलज़िम को आतंकवादी घोषित करने में अदालत को आमतौर से 15-20 साल का समय लग जाता है क्योंकि अदालत हर पहलू से की गई जांच व सबूतों की बुनियाद पर फ़ैसला करती है और इस बात को मद्दे नज़र रखती है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को दोषी मान कर सज़ा न दे दी जाए।
यदि कश्मीर में तैनात किये गए सुरक्षाबलों की बात करें तो उनके द्वारा जिन कश्मीरी मुसलमानों को आतंकवादी कह कर शहीद किया जा रहा है तो सुरक्षाबलों के पास उन मज़लूमों के आतंकवादी होने की क्या पहचान है?
अक्सर यह भी देखा गया है कि किसी घर को सुरक्षाबलों द्वारा यह कह कर घेर लिया जाता है कि इसमें एक या दो आतंकवादी छिपे हुए हैं और इसी बेबुनियाद बात को बुनियाद बना कर उस घर को ढा दिया जाता है और उसके बाद उसमें दब कर मरने वाले मज़लूमों की लाशें गिन कर प्रचारित कर दिया जाता है कि इतने आतंकवादी मारे गए।
अभी 21 अक्टूबर को ऐसी ही वारदात में जिस मकान को ढाया गया उसमें दब कर कथित आतंकवादियों के अलावा सात आम नागरिकों के मरने की ख़बर से वहां बेचैनी पैदा होना स्वाभाविक था जिसके अन्तर्गत बन्द का आह्वान करने वालों में कश्मीरी पण्डित संघर्ष समिति भी शामिल है।
ऐसा भी देखने में आया है कि आबादी के क्षेत्र में किसी व्यक्ति को आतंकवादी कह कर उसका फ़र्ज़ी एनकाउण्टर कर दिया जाता है और इसकी चपेट में अनेक नागरिक भी शहीद हो जाते हैं।
ऐसी वारदातों के विरोध में अगर जनता प्रदर्शन करती है तो उसके लिए पैलट गन मौजूद रहती हैं जिनके द्वारा कितने ही लोगों को अपाहिज बना दिया जाता है।
क्या यह सब इसलिये किया जा रहा है कि वहां के निवासी मुसलमान हैं?
घुसपैठ की बात करें तो पाकिस्तान से सीमा पार करके भारत में प्रवेश करने में कामयाब होना तो सीमा सुरक्षा बल की नाकामी साबित करता है और यदि बल कम है तो जो बल नागरिक क्षेत्र में तैनात किये गए हैं उनको सीमा पर भेजा जा सकता है क्योंकि ऐसा करने से कथित अलगाववादी कश्मीर को उठा कर पाकिस्तान में तो ले नहीं जाएंगे लेकिन यह निश्चित है कि वहां के नागरिक सुरक्षाबलों के द्वारा किसी को भी आतंकवादी कह कर शहीद किये जाने से बचे रहेंगे।
ध्यान रहे किसी व्यक्ति के बिना किसी अदालती कार्रवाई के आतंकवादी कह कर मारे जाने से उसका पूरा परिवार बरबाद हो जाता है इसलिए यह ऐसा ज़ुल्म है जिसकी कल्पना करके भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
यह लेख विभिन्न समाचार पत्रों में समय समय पर छपने वाली खबरों पर आधारित है।

Disclaimer : लेखक के निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का सहमत होना आवश्यक नहीं है|