क्या है धारा 377 : इस मुद्दे पर पूरे देश में क्यों चल रही है बहस, जानिये

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समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाली आईपीसी की धारा 377 पर बड़ी सुनवाई शुरू हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा इसे चार हफ्तों तक टालने की अपील को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ठुकरा दिया गया।

समलैंगिकता को एलजीबीटी क्यू के रूप में जाना जाता है। जिसमें L-लेस्बियन, G-गे,B-बी-बाईसेक्सुअल और T-ट्रांसजेंडर, Q-क्व‍ियर। इसे क्व‍ियर समुदाय का नाम भी दिया गया है। क्व‍ियर का मतलब अजीब और विचित्र होता है और इस अजीब और विचित्र होने पर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसी मुद्दे पर पूरे देश में बहस चल रही है।

क्या कहती है धारा 377
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ये धारा अप्रकृतिक यौन संबंधों को गैरकानूनी ठहराती है। इस धारा को ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों द्वारा 1862 में लागू किया था। सेक्शन 377 के तहत अगर कोई स्‍त्री-पुरुष आपसी सहमति से भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाते हैं तो इस धारा के तहत 10 साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है। किसी जानवर के साथ संबंध बनाने पर इस कानून के तहत उम्रकैद या 10 साल की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है। इस कानून के तहत गिरफ्तारी के लिए किसी वारंट की जरूरत नहीं होती। शक के अधार पर या गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है।

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
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जुलाई 2009, में दिल्ली हाई कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को गैर-कानूनी करार दिया था जिसके बाद देश में इसके खिलाफ हलचल पैदा हो गई और सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
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2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिक संबंधों को अवैध ठहराया। हालांकि अब LGBTQ समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले संगठनों की तरफ से दायर पुनर्विचार याचिका को लेकर दोबारा सुनवाई शुरू हो गई।

एलजीबीटी समुदाय की राय
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एलजीबीटी समुदाय का कहना है कि समलैंगिक संबंध कहीं से भी अप्राकृतिक नहीं हैं। यह कई जानवरों की तरह इंसानों में भी एक आम स्वभाव है। लेकिन कई धार्मिक कारणों और भावनाओं का हवाला देते हुए इसे गैर कानूनी बनाए रखने की मांग जारी है। 2009 के बाद इस समुदाय के लिए खुशी का वक्त था जो ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया।

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समलैंगिकता अपराध है या नहीं

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने संबंधी याचिकाओं पर आज आज भी महत्वपूर्ण सुनवाई जारी है। सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र ने गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डालते हुए इस मामले पर फैसला करने का अनुरोध किया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हुए एएसजी ने कहा कि सरकार इस पर फैसला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ती है

इससे पहले, प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की संवैधानिक वैधता और समलैंगिक संबंधों को अपनाने वाले समुदाय के मौलिक अधिकारों पर विचार करेगी।

शीर्ष अदालत ने वर्ष 2013 में अपने फैसले में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर करने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला निरस्त कर दिया था। उच्च न्यायालय ने दो समलैंगिक व्यक्तियों द्वारा परस्पर सहमति से यौन संबंध स्थापित करने को दंडनीय अपराध बनाने वाली धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया था।

धारा 377 के तहत अप्राकृतिक यौन संबंध दंडनीय अपराध है और इसके लिये दोषी व्यक्ति को उम्र कैद, या एक निश्चित अवधि के लिये, जो दस साल तक हो सकती है, सजा हो सकती है और उसे इस कृत्य के लिये जुर्माना भी देना होगा। इस मामले में सुनवाई शुरू होते समय गैर सरकारी संगठन नाज फाउण्डेशन के एक वकील ने हस्तक्षेप की अनुमति मांगी। इसी संगठन ने साल 2001 में सबसे पहले उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।

पीठ ने कहा कि इस मामले में दायर सुधारात्मक याचिका का सीमित दायरा है और कोई अन्य पीठ को इसकी सुनवाई करनी होगी। संविधान पीठ के समक्ष आज एक नृत्यांगना नवतेज जौहर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बहस शुरू की। उन्होंने कहा कि लैंगिक स्वतंत्रता के अधिकार को नौ सदस्यीय संविधान पीठ के 24 अगस्त , 2017 के फैसले के आलोक में परखा जाना चाहिए।

इस फैसले में संविधान पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुये कहा था कि एलजीबीटी समुदाय के सदस्यों को निजता के अधिकार से सिर्फ इस वजह से वंचित नहीं किया जा सकता कि उनका गैरपारंपरिक यौन रुझान है और भारत की एक करोड़ 32 लाख की आबादी में उनकी संख्या बहुत ही कम है।

पीठ ने रोहतगी की इस दलील से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि वह जीवन के मौलिक अधिकार और लैंगिक स्वतंत्रता के पहलू पर विचार करेगी। इन याचिकाओं में भी शीर्ष अदालत के वर्ष 2013 के फैसले को चुनौती दी गयी है जिसमे समलैंगिक रिश्तों को अपराध करार दिया था।

केन्द्र ने कल इन याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिये कुछ समय देने का अनुरोध करते हुये सुनवाई स्थगित करने का आग्रह किया था। परंतु शीर्ष अदालत ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया था। इस प्रकरण में शीर्ष अदालत के वर्ष 2013 के फैसले पर पुर्निवचार के लिये दायर याचिकायें खारिज होने के बाद याचिकाकर्ताओं ने सुधारात्मक याचिका का सहारा लिया। साथ ही इन याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई का अनुरोध भी किया गया।

शीर्ष अदालत ने इस पर सहमति व्यक्त की और इसी के बाद धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये कई याचिकायें दायर की गयीं। न्यायालय में धारा 377 के खिलाफ याचिका दायर करने वालों में पत्रकार सुनील मेहरा , शेफ रितु डालमिया , होटल मालिक अमन नाथ और आयशा कपूर शामिल हैं।

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
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जुलाई 2009, में दिल्ली हाई कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को गैर-कानूनी करार दिया। लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिक संबंधों को अवैध ठहराया। हालांकि अब LGBTQ समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले संगठनों की तरफ से दायर पुनर्विचार याचिका को लेकर दोबारा सुनवाई की जाएगी।

भारत में समलैंगिकता अपराध
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आईपीसी की धारा 377 के तहत यदि 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाते हैं और बाद में दोषी पाए जातें हैं तो उन्हें 10 की कैद से लोकर उम्र कैद तक की सजा हो सकती है। भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

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