क्या फ़र्ज़ी एनकाउण्टर द्वारा मुसलमानों को मारने का पुलिस को गुप्त सन्देश दिया गया है?

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Mohd Sharif

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पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश में जिस तरह पुलिस निरंकुश होकर फ़र्ज़ी एनकाउण्टर द्वारा बेगुनाहों का क़त्ल करके योगी सरकार से प्रशंसा पा रही है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि यह काम सरकार के निर्देश पर किया जा रहा है। मुख्यमन्त्री द्वारा यह पहले ही कहा जा चुका है कि
अपराधियों की जगह जेल है या यमराज के पास है।
मुख्यमन्त्री के इस आदेश के पहले भाग के अनुसार तो पुलिस पहले से ही कार्यरत है, हालांकि उसके द्वारा जेल भेजे जाने वाले आरोपी ज़्यादातर मामलों में अदालत द्वारा सबूतों के आभाव में रिहा कर दिए जाते हैं। यह इस बात का सबूत है कि पुलिस केवल सरकार से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए अधिकतर मामलों में बेक़सूर लोगों को आरोपी बना कर जेल भेजती है।
मुख्यमन्त्री के आदेश के दूसरे भाग के अनुसार अपराधियों को यमराज के पास भेजने की पुलिस द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पूरी तरह से कायरतापूर्ण और ज़ालिमाना है जिसके अन्तर्गत किसी भी बेक़सूर शख़्स को अपराधी कह कर कभी उसके घर से तो कभी किसी दूसरे स्थान से पकड़ कर ले जाया जाता है और उसको कुछ दिन भूखा प्यासा रख कर और दूसरी तरह की यातनाएं देने के बाद फ़र्ज़ी एनकाउण्टर के ज़रीये बेरहमी से क़त्ल कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में पुलिस मुसलमानों को अपना शिकार बनाती है क्योंकि उनका मुसलमान होना पुलिस के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। ध्यान रहे भाजपाईयों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि किसी मुसलमान के फ़र्ज़ी एनकाउण्टर द्वारा क़त्ल होने पर हिन्दूवादी संगठन एकजुट होकर मारे गए उस बेक़सूर मुसलमान के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आते हैं और पुलिस द्वारा बनाई गई झूटी कहानी को सच साबित करने के लिए पुलिस के पक्ष में खड़े हो जाते हैं जिसके नतीजे में बेक़सूर मुसलमानों के क़त्ल के बाद उनके वारिस किसी मुआवज़े से भी वंचित कर दिए जाते हैं।
विडम्बना यह है कि मुख्यमन्त्री के उपरोक्त कथन में यमराज की सेवाएं लेने में अदालत की भूमिका को नज़रअन्दाज़ कर दिया गया है।
विचार करने वाली बात यह है कि पुलिस का काम किसी वारदात के आरोपियों को पकड़ कर अदालत में पेश करना होता है और इसके बाद दोष सिद्ध होने पर अपराध के अनुसार सज़ा तय करना केवल अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है लिहाज़ा पुलिस को अपराधियों को जेल में भेजने या यमराज के पास भेजने का आदेश देने का अधिकार मुख्यमन्त्री को नहीं है।
मुख्यमन्त्री के उपरोक्त आदेश के परिपालन में हिन्दू अपराधियों के अलावा कुछ अपवाद को छोड़ कर जिन मुसलमानों को शिकार बनाया जाता है वह बेक़सूर होते हैं।
विवेक तिवारी के मामले में पुलिस या तो एक मुस्लिम लड़की साथ में होने के कारण उसको मुसलमान समझ बैठी या जो भी ग़लती रही हो उसके द्वारा विवेक तिवारी के रूप में एक बेगुनाह हिन्दू क़त्ल कर दिया गया इसलिए क़ातिल सिपाहियों के ख़िलाफ़ सरकार ने सख़्त कार्रवाई का आदेश दिया जिसके अन्तर्गत वारदात में शामिल दोनों सिपाहियों को गिरफ़्तार करके उनके ख़िलाफ़ मुक़द्दमा क़ायम कर दिया गया जबकि इस वारदात के नौ दिन पहले योजना बना कर अतरौली में दो बेक़सूर मुस्लिम लड़कों को फ़र्ज़ी एनकाउण्टर के ज़रीये क़त्ल किया गया था जिसमें क़ातिल पुलिस वालों को हिन्दूवादी संगठनों द्वारा सम्मानित किया गया था।
विवेक तिवारी के क़ातिल सिपाहियों की गिरफ़्तारी और मक़तूल के परिवार को दी जाने वाली सहायता से ऐसा लगता है जैसे मुख्यमन्त्री के आदेश में इस प्रकार का गुप्त सन्देश हो कि अगर बेक़सूर लोगों को क़त्ल करना चाहें तो वह मुसलमान होने चाहिएं लेकिन इसके बावजूद भी एक हिन्दू को क़त्ल कर दिया गया जोकि सरासर आदेश की अवहेलना थी।
अगर मुख्यमन्त्री के आदेश में मुसलमानों को मारने का गुप्त सन्देश न होता तो जिस तरह विवेक तिवारी के परिवार को सरकार ने सहायता दी है उसी तरह अतरौली के मक़तूल मुस्तक़ीम व नौशाद के परिवारों को भी सहायता दी जानी चाहिए थी।