चेतन आनंद की ”हक़ीक़त” यही है!!!!

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Izhar Sayyed Arif
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मशहूर शायर और फ़िल्मी गीतकार कैफ़ी आज़मी की पुत्री अभिनेत्री शबाना आज़मी ने क़िस्सा सुनाया था के एक बार चेतन आनंद उनके पिता के पास आये और उन्होंने कैफ़ी आज़मी से कहा के मेरी फिल्म के गीत तुम लिखोगे । उन दिनों कैफ़ी आज़मी अच्छे गीत लिख रहे थे मगर उन गीतों वाली फ़िल्में नहीं चल रही थी । कैफ़ी आज़मी ने उन्हें जवाब दिया, भाई लोग कहते है के मैं गाने तो बहुत अच्छे लिखता हूँ मगर फ़िल्में नहीं चलती यानि मैं अनलकी हूँ । इसलिए भाई तुम मेरे दुर्भाग्य के शिकार क्यों बनो ! ऐसा करो किसी दूसरे गीतकार से लिखवा लो । चेतन आनंद ने जवाब दिया, मेरे बारे में भी लोग यही कहते है के मैं अच्छी फ़िल्में बनाता हूँ लेकिन मेरे दुर्भाग्य के कारण नहीं चलती; जब दो दुर्भाग्यशाली लोग मिलकर काम करेंगे तो भाग्य भी हार जायेगा । ये थे चेतन आन्नद जिन्होंने पहली बार भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय फिल्मो की लाइन में ला खड़ा किया अपनी पहली फिल्म “नीचा नगर” 1946 से । चेतन आनंद जो फिल्म निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और पटकथा लेखक थे और मशहूर फिल्म अभिनेता, निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक देवानंद और विजय आन्नद ( गोल्डी ) के बड़े भाई थे और उनकी छोटी बहन थी शांता कपूर जिनके पुत्र शेखर कपूर जिन्होंने मासूम और मिस्टर इंडिया जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में निर्देशित की है और ऑस्कर के लिए भी नॉमिनेट हो चुके है । पिता वकील किशोरी लाल की ये संताने आज़ादी से पूर्व भारत आ गए थे । बड़े भाई चेतन आन्नद कुछ समय बीबीसी में काम किया फिर मशहूर “दून” में इतिहास पढ़ाने लगे । बाद में फिल्मो की तरफ मुड़े और कुछ समय अभिनय करने के बाद निर्देशन से जुड़ गए और नीचा-नगर जैसी फिल्म की रचना कर डाली । अपने भाई देवानंद और अभिनेत्री सुरैया के साथ मिलकर उन्होंने 1949 में “नवकेतन फिल्म्स” की नीव रखी जिसने 1950 ( अफसर ) से लेकर 2011 ( चार्ज शीट ) तक का निर्माण किया ।

पत्नी उमा से अलग होने के बाद एक दिन उन्होंने अपने दोस्त के घर मैगज़ीन में “प्रिय राजवंश” की फोटो देखी और उसे देखते ही रह गए । प्रिय अपने पिता फारेस्ट कन्ज़रवेटर सुन्दर सिंह के साथ देहरादून में रहकर अपनी पढ़ाई करने के बाद वो पिता के साथ इंग्लैंड आ गई थी और और ड्रामेटिकल आर्ट में कोई कोर्स कर रही थी और बेहद सुसभ्य वातावरण में पली थी ।

चेतन आनंद की अगली फिल्म “हक़ीक़त” 1964 की हेरोइन वही प्रिया राजवंश थी जो अंत तक चेतन के साथ पत्नी के रूप में रही लेकिन उन्होंने कभी शादी नहीं की । वैसे चेतन की अपने घर में भाई, बहन, पत्नी किसी से नहीं पटी लेकिन प्रिया से उनका कभी मन मुटाव तक नहीं हुआ और चेतन की हार फिल्म की हेरोइन भी वही रही जिन्होंने चेतन आन्नद की फिल्म हक़ीक़त 64,, हीर राँझा 70,, हिंदुस्तान की क़सम 73,, हँसते ज़ख्म 73,, साहेब बहादुर 77,, क़ुदरत 81 ,, और हाथों की लकीरें 86 तक हर फिल्म में उनका साथ निभाया । काफी समय साथ गुज़ारने के बाद प्रिया ने अपना एक अलग बंगला भी बनवा लिया था लेकिन रहती चेतन के साथ ही थी । चेतन की 1997 मृत्यु के बाद वो अकेली रह रही थी लेकिन सूत्रों के अनुसार उनकी प्रॉपर्टी को हथियाने के लिए पूर्व पत्नी उमा के पुत्र केतन आनंद और विवेक आनंद ने अपने नौकर माला व अशोक के साथ मिलकर उनकी 27 मार्च 2000 को उनकी हत्या कर दी जिसके लिए चारों को आजीवन कारावास के सज़ा हुई । ये कौन बेवक़ूफ़ कह रहा के आजकल की होती तो बच जाते । गलत, वो चालीस के दशक में कांग्रेस से जुड़े रहे थे ।

चेतन को अपने कॅरिअर में हक़ीक़त 64 के लिए राष्ट्रिय पुरुस्कार मिला और कुदरत 81 के लिए श्रेष्ठ कहानीकार का फिल्मफेयर पुरुस्कार । उनकी फिल्म हीर राँझा जिसमे प्रिया के साथ राजकुमार हीरो थे, के सारे संवाद “पद्य” में थे जिन्हें लिखा था कैफ़ी आज़मी ने । अक्सर वो कैफ़ी के साथ वो घंटों बैठे बार-बार चाय पीते रहते और अभिन्न मित्र थे लेकिन उन दोनों को पास-पास बैठकर बातें करते बहुत कम देखा गया ।

– Rajendra Shukla

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“हकीकत” फिल्म से भूले बिसरे गीत में रफ़ी साहब ..

मैं ये सोच कर ये उसके दर से उठा था ;
की वो रोक लेगी मना लेगी मुझको ;
हवाओं में लहराता आता था दामन ;
की दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझको ;
कदम ऐसे अंदाज से उठ रहे थे की ;
आवाज देकर बुला लेगी मुझको ;
मगर उसने रोका ना, ना उसने मनाया ;
ना दामन ही पकड़ा ना मुझको बिठाया ;
ना आवाज ही दी ना वापस बुलाया ;
मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया ;
यहाँ तक की उससे जुदा हो गया मैं !!

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