छद्मयुद्ध और मुसलमान : “संघी” और “यहूदियों” का डीएनए एक है!

छद्मयुद्ध और मुसलमान : “संघी” और “यहूदियों” का डीएनए एक है!

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Sikander Khanjada Khan
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भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दो दिन पहले आधा सच बोला कि
“विश्व की दूसरी सबसे अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद “आईएसआईएस” भारत में पैर जमाने में नाकाम रहा”
दरअसल राजनाथ सिंह को पूरी बात कहनी चाहिए थी और वह यह थी कि इस देश के मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी के बावजूद “अलकायदा” भी इस देश में कभी पैर ना जमा सका।
संपुर्ण बात तो यह होती कि “इस देश का मुसलमान “आतंकवाद” से सदैव ही दूर रहा।”
मेरी इस बात का आधार यह है कि कांग्रेस के समय में या अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के समय एक एक करके “इंडियन मुजाहिद्दीन” के नाम पर पकड़ॆ गये मुसलमान भारत की अदालतों से एक एक करके 12 से 20 साल बाद अपना बहुत बड़ा जीवन जेल की अँधेरी काल कोठरी में गुजार कर बाइज्ज़त बरी होते जा रहे हैं।
यदि आप यह सोचेंगे कि अदालतों से एक एक करके बाइज्ज़त बरी होते यह मुसलमान यदि निर्दोष हैं तो इनको जिन आतंकवादी घटनाओं में फँसाया गया उन्हें दरअसल किसने अंजाम दिया ? तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा कि यह खेल कितना साजिश भरा है और गहरा है।
महाराष्ट्र के पूर्व आईजी एस एम मुशरिफ ने अपनी किताब “करकरे के हत्यारे कौन” में इस बात का खुलासा साल 2009 में ही कर दिया था कि यह साजिश किसकी है।
दरअसल , आतंकवाद का हौव्वा जब इस देश और दुनिया में खड़ा हुआ तो आतंकवादी घटनाओं में पुलिस और जाँच एजेंसियां अपना नाकारापन छुपाने के लिए छद्म रूप से गढ़ी गये एक आतंकवादी संगठन “इंडियन मुजाहिद्दीन” से उन आतंकवादी घटनाओं को छोड़कर यहाँ से वहाँ तक जहाँ दिल किया मुस्लिम लड़कों को उस संगठन का सदस्य बता कर और उस आतंकवादी घटनाओं में शामिल बता कर जेलों में ठूस दिया जो अब एक एक करके सब बाइज्ज़त बरी हो रहे हैं।
ताज़ी रिहाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोध के छात्र गुलज़ार वाणी की हुई है जिन्हें ट्रेन धमाकों में फँसाया गया था।
सवाल फिर वही है कि फिर इन सभी घटनाओं को किया किसने ?
महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व आईजी एस एम मुशरिफ अपने कार्यकाल के अनुभव पर कहते हैं कि यह सभी कारनामे भारत की खूफिया जाँच एजेंसी “इंटेलिजेंस ब्यूरो” कराती है इसीलिए इन घटनाओं के असली अपराधी पकड़े नहीं जाते और मुसलमानों को इन घटनाओं के नाम पर यहाँ वहाँ से उठा कर जेल में ठूस दिया जाता है और फिर भाँड मीडिया के ज़रिए यह माहौल बनवाया जाता है कि “मुसलमान आतंकवादी होता है” और इसका कारण उसका कट्टर होना और कुरान के प्रति उसकी अपार श्रृद्धा होता है। ऐसे ही छद्म खेल खेलकर मुसलमान और इस्लाम को डरावना बनाने की कोशिशें की गयीं।
दरअसल ऊपर से नीचे तक “इंटेलिजेंस ब्यूरो” में बैठे संघी यह साजिश करते हैं जिसको एस एम मुशरिफ ने सबके सामने नंगा करके रख दिया है , वह भी तमाम प्रमाणों के साथ।
आज “इंडियन मुजाहिद्दीन” का कुछ अता पता नहीं , कौन थे लोग ? कहाँ था हेडक्वार्टर ? सब बातें हवा हो गयीं , और वह यूँ कि इस संगठन का कोई वजूद कभी रहा ही नहीं , इसके वजूद को पुलिस और जाँच एजेंसी अदालतों में सिद्ध ही नहीं कर सकी। इसके नाम से फँसाए गये मुसलमान एक एक करके बाइज्ज़त बरी होते गये तो आईबी का गढ़ा “इंडियन मुजाहिद्दीन” भी हवा हो गया।
कभी कभी मुझे लगता है कि “आइएस” भी झूठ का पुलिंदा है , ठीक “इंडियन मुजाहिद्दीन” की तरह जिससे इसके नाम के सहारे पूरी दुनिया में मुसलमानों का कत्ले-आम किया जा सके।
केवल दुनिया को डराने के लिए इसके मुखिया को रोज मारा जाता है रोज जिन्दा किया जाता है और यह सारी दुनिया की भाँड मीडिया के माध्यम से किया जाता है , प्रतिदिन उसके खौफनाक किस्सों से देश और दुनिया को डराया जाता है और उसके लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ओसामा बिन लादेन तो सदैव दुनिया के सामने रहा परन्तु “बगदादी” अदृश्य ही रहा जैसे भारत में “इंडियन मुजाहिद्दीन” अदृश्य रहा।
दरअसल यह छद्म युद्ध कहा जाता है और यहूदी अपने जन्म से यह युद्ध लड़ते रहे हैं , सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत मुहम्मद के समय से ही , और तब इनकी रणनीति दूसरी थी , ये युद्ध विराम के समझौते करके मुसलमानों को युद्ध करने से रोकते थे और अपनी औरतों और बच्चों को आगे करके समझौता तोड़ कर लोगों को मारते थे।
यही छद्मयुद्ध आज पूरी दुनिया में खेला जा रहा है जो यहूदी सदैव से खेलते आएँ हैं , अब यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं कि “संघी” और “यहूदियों” का डीएनए एक है।
सच तो यह है कि देश का जो मुसलमान अपने विरुद्ध हो रहे इतने उत्पीड़न पर सड़क पर एक विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकता वह अपनी और अपने परिवार की जान जोखिम में डाल कर आतंकवादी क्या बनेगा।
दरअसल आज के मुसलमानों को हक और संघर्ष से अधिक जरूरत “दो वक्त की रोटी” की है , वह झंडा लेकर हक के लिए खड़ा हो जाएगा तो उसके घर में रात की रोटी नहीं बन पाएगी , दो वक्त की रोटी उसके सभी संघर्ष और हक की माँग पर भारी पड़ जाती है , उसे रोज़ कूँआ खोदना होता है रोज़ पानी पीना होता है , वह कूँआ खोदना छोड़कर आंदोलन करेगा तो पानी कहाँ से मिलेगा ? वह पंचर नहीं बनाएगा , कपड़े नहीं सिलेगा , मोटर मशीन नहीं बनाएगा तो रात में घर की रोटी कैसे बनेगी ? वह इस कारण आंदोलन नहीं करता तो आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने की बात तो बहुत दूर की बात है।
दरअसल , आंदोलन भरे पेट के लोग करते हैं जिनको घर की रोटी की चिंता नहीं होती , 50 साल पहले दलित भी आंदोलन नहीं करते थे , क्युँकि वह भी तब आज के मुसलमान जैसे ही थे , आरक्षण और तमाम योजनाओं ने उनको समृद्ध किया उनको नौकरी मिली और उन्हीं नौकरी वालों से हर दफ्तर में जा जा कर कांशीराम ने दलित आंदोलन को जन्म दिया। दलित आंदोलन कोई भूखे पेट से नहीं जन्मा।
मुसलमानों के संदर्भ में ऐसे आरक्षण और लाभ संविधान में या तो प्रतिबंधित किया या तुस्टीकरण की गाली बना कर सभी को डराया गया कि वह मुसलमान के साथ खड़े होने की हिम्मत ना कर सकें। राहुल हों अखिलेश हों या मायावती , सब इसी कारण डरते हैं।
राजनाथ सिंह जी पूरा सच बोलिए , आप गृहमंत्री हैं आपको तो सब सच पता ही है ?
इस छद्म युद्ध में मारे जाना ही फिलहाल देश के मुसलमानों की किस्मत है। आज कहीं कल कहीं परसों कहीं।

-एक भारतीय की कलम से