जब प्रधानमंत्री से लेकर देश की न्यायमूर्तियाँ तक गाय की सेवा में लगे हों, तब पहलू ख़ान को कौन बचा सकता है?

जब प्रधानमंत्री से लेकर देश की न्यायमूर्तियाँ तक गाय की सेवा में लगे हों, तब पहलू ख़ान को कौन बचा सकता है?

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राजेश जोशी – रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
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पहली तस्वीर: सितंबर 2011 – गुजरात के एक स मारोह में मंच पर बैठे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी खेड़ा के ईमाम शाही सैयद महदी हुसैन बाबा के हाथ से मुसलमानों की गोल टोपी पहनने से इनकार कर देते हैं.

राजस्थान के अलवर शहर में तेरह साल का विपिन यादव अपने घर में टीवी पर ये दृश्य देख रहा है.

दूसरी तस्वीर: मार्च 2017 – रुद्राक्ष की भारी मालाओं से लदे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी की एक गौशाला में गायों को हरा चारा और गुड़ खिलाते हैं. विपिन यादव अब 19 वर्ष का जवान ‘गौरक्षक’ बन चुका है और अपने घर में टीवी पर प्रधानमंत्री मोदी की गौसेवा को भी देख रहा है.

तीसरी तस्वीर: अप्रैल 2017 – अलवर के पास 55 वर्ष का पहलू ख़ान मेले से ख़रीदी गायों को एक ट्रक पर लादकर अपने साथियों के साथ जा रहा है. लंबी दाढ़ी से ही पता चल जाता है कि वो मुसलमान है. रास्ते में ‘गौरक्षकों’ का एक दल गाड़ी रोकता है क्योंकि उन्हें शक है कि गायों को क़साईख़ाने ले जाया जा रहा है. वो उस ट्रक को रोक कर पहलू ख़ान और उसके साथियों को नीचे खींच लेते हैं और दौड़ा दौड़ा कर पीटते हैं. बाद में पुलिस कहती है कि विपिन यादव इनमें सबसे आगे था. पहलू ख़ान बाद में अस्पताल में दम तोड़ देता है.

आप पूछ सकते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गाय को चारा खिलाने या फिर गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार करने और पहलू ख़ान को पीट पीट कर मार डालने की घटना में क्या संबंध है?

कोई सीधा संबंध नहीं है. बहुत मुमकिन है कि विपिन यादव ने टीवी पर वो दृश्य देखे ही न हों.

लेकिन तेरह साल के बच्चे से ‘गौरक्षक’ बनने के सफ़र में जिन प्रतीकों ने उनपर असर डाला होगा उनमें वो नरेंद्र मोदी ज़रूर रहे होंगे जो मुख्यमंत्री होने के बावजूद मुसलमानों की टोपी को ख़ारिज करने में हिचकते नहीं हैं और प्रधानमंत्री बनने के बाद हज़ार काम छोड़कर सबसे पहले गौसेवा के लिए तैयार रहते हैं.
विपिन यादव को अलवर के पास 1 अप्रैल 2017 को वो मुसलमान मिला जो गायों को लाद कर ले जा रहा था. संभवत: गोरक्षकों के दिमाग़ में शत्रु की तस्वीर पहले से साफ़ थी. अलवर के हाईवे पर वो ‘शत्रु’ उनके हत्थे चढ़ गया.

राजीव गांधी का वो बयान
कुछ देर के लिए गाय, गोरक्षक और मुसलमानों को बिसरा दीजिए और याद कीजिए 1983-84 के उस देर की जब जरनैल सिंह भिंडराँवाले के मरजीवड़ों ने पंजाब में ख़ालिस्तानी लहर उठा रखी थी.

इंदिरा गाँधी ने भिंडराँवाले का ख़ात्मा करने के लिए सेना के ज़रिए हरमंदर साहब पर धावा बोल दिया. सिखों में ग़ुस्सा फैल गया और 31 अक्तूबर को उन्हीं के दो सिख सिक्युरिटी गार्ड्स ने इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी.

अगले कई दिनों तक दिल्ली, कानपुर और बोकारो से लेकर कलकत्ता तक जगह जगह पर लोगों ने सिखों को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

सैकड़ों बेगुनाह सिखों का दिल्ली की सड़कों पर क़त्ल कर दिया गया या ज़िंदा जला दिया गया.

अपनी माँ की मौत के बाद नए नए प्रधानमंत्री बने राजीव गाँधी ने कहा, “कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है. लेकिन जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है.”

बहुत से लोगों ने इसे सिख़ों की हत्याओं को उचित ठहराने की कोशिश की तरह देखा.

मोदी के बयान में झलक
ठीक इसी तरह जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुसलमान विरोधी दंगों के बाद कहा कि “गुजरात में जो मैंने किया है उसके लिए 56 इंच की छाती होनी चाहिए” तो इस बयान के पीछे का संदेश किसी से छिपा नहीं रहा.

यानी राजनीतिक गोलबंदी के लिए भीड़ का इस्तेमाल किया जाता रहा है. खुली सड़क पर अपने दुश्मन को चिन्हित करके ठौर मार देने वाले लोगों को भरोसा रहता है कि पर्दे के पीछे से उन्हें शासनतंत्र की मदद और समर्थन मिलेगा.

इसलिए अब वो अपनी हिंसक कार्रवाइयों का विडियो तैयार करके सोशल मीडिया पर भी डालने लगे हैं.

पुलिस, पैरामिलिटरी, अदालत, दंडसंहिता और जेल जैसे राजसत्ता के हथियार मौजूद रहने के बावजूद हिंसक भीड़ से निपटने में प्रशासन अकसर ढिलाई बरतता है.

समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं, “आम तौर पर इलाक़े के विधायक या सांसद इसलिए तुरंत सक्रिय नहीं होते क्योंकि उन्हें जन समर्थन खोने का डर रहता है. वो पहले दंगे को चलने देते हैं और सब कुछ ठंडा पड़ जाने का इंतज़ार करते हैं. जैसा बाबरी मस्जिद ध्वंस के वक़्त पीवी नरसिंहराव ने किया.”

गौरक्षक दल
लेकिन विजिलांटी गिरोह का अपने दुश्मन को पीट पीट कर मार डालने और सांप्रदायिक दंगे में मूलभूत अंतर होता है.
विजिलांटी समूह एक ख़ास विचार से प्रभावित होते हैं और अपने आदर्श को हासिल करने के लिए वो क़ानून अपने हाथ में लेने में भी नहीं हिचकते.
उन्हें भरोसा होता है कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि वो ये काम एक “बड़े सामाजिक उद्देश्य” के लिए कर रहे हैं – ऐसा उद्देश्य जिसे हासिल करने के लिए ख़ुद प्रधानमंत्री भी जुटे हुए हैं.
मसलन, मुस्लिम टोपी ख़ारिज करते हुए या गाय की सेवा करते हुए प्रधानमंत्री की तस्वीर एक ख़ास संदेश देती है.
ये तस्वीर बहुत से लोगों को जीवन का ध्येय तय करने में मदद करती है और उस ध्येय के रास्ते में आने वाली किसी भी अड़चन को हटा देने का दुस्साहस भी.

कहां से मिलती है गौरक्षकों को ताक़त?
इसे और ताक़त मिलती है जब कोई जज रिटायर होने से एक दिन पहले गाय को राष्ट्रपशु घोषित करने की सिफ़ारिश करता है या फिर अदालत के आदेश में गाय को राष्ट्रधन बताया जाता है.
द वायर के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं कि ऐसे अदालती आदेशों से “भीड़ की मानसिकता वाले लोगों का उत्साह बढ़ता है और उनमें ये विश्वास भी बढ़ता है कि हम सड़क पर उतर कर जो चाहें कर सकते हैं पुलिस हमारे ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करेगी और अगर करेगी भी तो अदालत में जजों की ओर से भी हमारे प्रति नरम रवैया लिया जाएगा.”
फिर अफ़वाहें, तथ्यों की अनदेखी, एक ख़ास समुदाय के पहनावे या धार्मिक विश्वासों के प्रति पूर्वाग्रह या घृणा जैसी कई चीज़ें सड़क पर तुरंत मरने-मारने का फ़ैसला करने को प्रेरित करती हैं.
जैसा कि सितंबर 2015 में दिल्ली के पास दादरी में हुआ जहाँ हिंदुओं की भीड़ ने 50 वर्ष के अख़लाक़ को उनके घर से खींचकर निकाला और पीट पीट कर मार डाला क्योंकि हमलावरों को शक था कि अख़लाक़ ने अपने फ़्रिज में गोमांस रखा है.

लिंच मॉब
हमलावरों के प्रति सख़्त रवैया अपनाने की बजाए बीजेपी नेता और मोदी कैबिनेट में संस्कृति मंत्री महेश चंद्र शर्मा का बयान आता है कि इसे “दुर्घटना माना जाए और इसे किसी भी तरह का सांप्रदायिक रंग न दिया जाए.”
और जब एक अभियुक्त की जेल में बीमारी से मौत हो जाती है तो उसके शव को तिरंगे में लपेटा जाता है और महेश शर्मा उसके सामने दोनों हाथ जोड़कर ऐसे नमन करते हैं जैसे सीमा ओपर दुश्मन से लड़ते हुए मारे गए किसी शहीद को श्रद्धांजलि दे रहे हों.
ऐसा समर्थन मिलने पर लिंच मॉब या हिंसक गिरोह का हिस्सा बनना फ़ख़्र की बात हो जाती है और इससे इलाक़े में रोब-दाब भी बढ़ता है.
समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता कहते हैं- “ये नशे की लत की तरह होती है. मैं नशे का आदी हो जाता हूँ और नशा करता हूँ पर आपको ये पता नहीं लगेगा कि नशीली दवाओं का सप्लायर कौन है.”

दुर्घटना मानने की फ़ितरत
यानी क़ानून अपने हाथ में लेकर सड़क पर न्याय करने की भावना से भरे हुए लोगों की भीड़ के पीछे अगर राजनीतिक समर्थन होता भी हो तो आपको उनका पता नहीं लग पाएगा.
मेघालय, जहां बीफ़ है बीजेपी के ‘गले की हड्डी’
हत्या हो जाने के बाद राजनीतिज्ञ या तो ख़ामोश रहते हैं और अगर मजबूरी होती है तो वो रस्मी शब्दों में घटना की आलोचना कर देते हैं या फिर उसे सामान्य घटना बताकर रफ़ा दफ़ा करने की कोशिश करते हैं.
इसलिए बलात्कार की घटनाओं पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का वो बयान कि “लड़के हैं लड़कों से हो जाती है ग़लती. तो क्या रेप के लिए उन्हें फाँसी चढ़ाएँगे?” ठीक वैसा ही है जैसे अख़लाक़ की हत्या के बाद नरेंद्र मोदी कैबिनेट में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का बयान था.
उन्होंने कहा था कि इसे “एक दुर्घटना माना जाए और इसे किसी भी तरह का सांप्रदायिक रंग न दिया जाए.”
या फिर 2002 में गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये बयान कि “एक छोटा कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाता है तो हमें पेन फ़ील होता है कि नहीं? होता है.”

हिंसा कहां तक सही है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतकार रह चुके केएन गोविंदाचार्य को संघ परिवार के कुछ बेहद सुलझे हुए विचारकों में गिना जाता है.
भीड़ की हिंसा को वो उचित नहीं ठहराते और दो टूक शब्दों में कहते हैं कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
लेकिन वो भी गौरक्षकों की कार्रवाइयों का कारण और आधार ढूंढने की कोशिश करते हैं.
गोविंदाचार्य ने बीबीसी से कहा, “वो (गौरक्षक) सोचते होंगे कि अभी तक तो हम बहुत कुछ सहते ही रहे हैं. गौहत्या आम होते हुए देखते रहे हैं….राजसत्ता की ओर से हमेशा हमारी ही बाँहें मरोड़ने की कोशिश हुई है. ऐसा हिंदू समाज के अंदर लोगों को लगता है.”

सही ठहराने की प्रवृत्ति
इस तर्क के प्रिज़्म से देखें तो अख़लाक़ से लेकर पहलू ख़ान गोरक्षा दलों की ओर से की गई मार पीट और डर फैलाने की कार्रवाई को न्यायोचित ठहराया जा सकता है.
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यही नहीं, गोविंदाचार्य भी हिंसा को आत्मरक्षा बताते हैं और कहते हैं, “अपनी आत्मरक्षा के लिए तो (हिंसा) कर ही सकते हैं ये लोग. या तात्कालिक उत्तेजना में भी लोग आ सकते हैं. ऐसा नहीं माना जा सकता कि सभी लोग बौद्धिक क्षमता के हिसाब से काम करेंगे. भावनात्मक आधार भी तो होता है.”
पर हिंसक भीड़ के प्रति नर्मी बरतने, उसे उकसाने या उनकी ख़ूनी कार्रवाइयों को उचित ठहराने के लिए सिर्फ़ ये राजनेता ही ज़िम्मेदार नहीं हैं. राज्य सरकारें और पुलिस-प्रशासन भी ये काम करते रहे हैं.

क़ानूनी जामा पहनाने की कोशिश
जैसे कि देवेंद्र फड़नवीस की सरकार ने महाराष्ट्र में गोहत्या पर पाबंदी पर नज़र रखने के लिए “कार्यकर्ताओं” को आइडेंटिटी कार्ड देने के लिए विज्ञापन छाप दिया था, जिसके जवाब में सैकड़ों लोगों ने अर्ज़ी दाख़िल की.
इनमें से ज़्यादातर हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े वही लोग थे जो अपने हाथ में आई ग़ैरक़ानूनी ताक़त पर क़ानून की मुहर लगवाना चाहते थे.
कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में सरकार और पुलिस की मदद से शुरू किया गया सलवा जुड़ूम भी भीड़ के ख़ूनी इस्तेमाल का एक उदाहरण है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और स्वराज अभियान से जुड़े प्रशांत भूषण हिंसक भीड़ को ‘लेजिटिमेसी’ देने के लिए न्यायपालिका सहित पूरे प्रतिष्ठान या एसटेबलिशमेंट को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “मेनस्ट्रीम राजनीतिक पार्टियाँ, जो सत्ता में रही होती हैं या जिनमें सत्ता में आने की क्षमता होती है उनके ख़िलाफ़, ताक़तवर लोगों के ख़िलाफ़ – जो भले ही आज विपक्ष में हों – गंभीर कार्रवाई करने का दम बहुत कम देखा जाता है.”

और फिर जब प्रधानमंत्री से लेकर देश की न्यायमूर्तियाँ तक जिस गाय की सेवा में लगे हों, उसे ट्रक में लाद कर ले जाने वाले पहलू ख़ान को ‘गौरक्षकों’ के क्रोध से कौन बचा सकता है?
अपने एक भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद माना था कि ख़ुद को गौरक्षा के नाम पर अनेक लोग आपराधिक गतिविधियों में लगे हुए हैं.