जयपुर : कांग्रेस समान विचार धारा वाले दलो से समझोता करेगी!

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आज दिल्ली मे कांग्रेस कार्यसमिति की हुई मीटिंग से मिले संकेत।
।अशफाक कायमखानी।जयपुर।कांग्रेस राष्ट्रीय कार्यसमिति की आज दिल्ली मै हुई महत्वपूर्ण मीटिंग मे समान विचारधारा वाले ललो से कांग्रेस के चुनावी समझौता करने का मुद्दा प्रमुख रुप से छाये रहने के बाद जो छनकर बाते बहार आई उनमे खास यह है कि दो कदम हम बढते ओर दो कदम तुम बढो वाली कहावत पर काम करते हुये 2019 मे यूपीऐ का तीनसो सीट पाने के लक्ष्य पर विचार हुवा।

हालांकि 2019 के आम लोकसभा चुनावों के पहले भाजपा शासित राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ मे भी इसी साल होने वाले आम विधानसभा चुनावों मे भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिये कांग्रेस इन तीनो प्रदेशों मे बीना कोई शंसय रखे समान विचारधारा वाले दलो से कुछ दबकर भी समझोता करेगी, ताकि कांग्रेस को इन राज्यो मे स्पष्ट बहुमत मिल जाये। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना बताते है कि प्रदेशों मे पहले सरकार बनने पर 2019 का रण जीतना उसके लिये बडा आसान हो सकता है।

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी व बसपा नेता मायावती के पीछले दिनो से गहरे मिठ्ठे होते रिस्तो एवं यूपी के उपचुनावों मे कांग्रेस-बसपा, सपा व लोकदल के साथ आने के आये सार्थक परिणाम एव कर्नाटक मे साझा सरकार बनाने के बाद समान विचारधारा वाले दलो की आपसी दूरी काफी कम हुई है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दिल्ली मे संगठन महामंत्री बनने के बाद अब राहुल गाधी के डे बाई डे के फैसलो मे भी गहलोत की बडी सहभागिता रहने की चर्चा होती रहती है। गहलोत के नीसाने पर हमेशा भाजपा ओर भाजपा के नीसाने पर गहलोत रहते आये है। लगता है कि गहलोत हाईकमान को यह समझाने मे शायद कामयाब रहे है कि पहले भाजपा को प्रदेशो मे सरकार बनाने से रोको फिर 2019 मे समान विचारधारा वाले दलो के साथ यूपीऐ की केन्द्र मे सरकार बनाऐ।

कांग्रेस की समान विचारधारा वाले दलो के साथ चुनावों समझोता होने की पूरी सम्भावना के चलते राजस्थान मे भी सियासी अटकलो का जोर गर्माने लगा है। प्रदेश स्तरीय बसपा नेताओं के आखबारात मे समझोता नही होने के ब्यान शाया होते रहने के बावजूद दिल्ली स्तर से मिल रहे समाचारों से कांग्रेस के साथ बसपा व शरद यादव की लोकतान्त्रिक जनता दल , शरद पंवार की एनसीपी के साथ समझौता होना तय है। इसके साथ साथ वामपंथी दलो के साथ भी ऐन वक्त पर समझोता होना सियासी समीक्षक मान कर चल रहे है। 2008 मे जीते बसपा के छ विधायकों के बाद मे दल बदले से आज तक उनसे खफा मायावती की शर्त के मुताबिक उन्हें कांग्रेस अपना उम्मीदवार नही बनायेगी। साथ ही एनसीपी को सीकर व लोकतांत्रिक जनता दल को बांसवाड़ा मे व सपा को अलवर की बहरोड़ जैसी एक एक सीट उनके जनाधार को मानकर कांग्रेस उन्हें देने को तैयार लगती है। जबकि बसपा के हिस्से मे आठ से दस सीट आसानी आ सकती है। पर वामपंथी दलो से समझोता होने मे जरा कांग्रेस को माथापच्ची करनी होगी। 2008 के चुनावों मे धोद, दांतारामगढ़ व अनूपगढ़ से माकपा के तीन विधायक जीते थे। अगर वो तीनो सीट माकपा को मिलती है तो कांग्रेस के दिग्गज नेता परशराम मोरदिया व चोधरी नारायण सिंह को अन्य जगह से चुनाव लड़ाने पर तैयार करना होगा। साथ ही माकपा उक्त तीन सीटो के अलावा कुछ अन्य सीटो पर भी दावा करेगी। सियासी समीक्षक तो यहा तक बताते है कि कांग्रेस राजस्थान मे 15-20 सीट समान विचारधारा वाले दलो के लिये छोड सकती ओर बाकी 180-185 सीट मे से अधीकांश सीट जीत कर भारी बहुमत वाली सरकार राजस्थान मे बनाने की पूरी चेष्टा करेगी।

कुल मिलाकर यह है कि 2019 को मध्य नजर रखते हुये कांग्रेस व उसके समान विचारधारा वाले दलो के केन्द्रीय नेताओं के मध्य राजस्थान, मध्यप्रदेश व छतीसगढ़ प्रदेशों मे 2018 के अंतिम मे होने वाले विधानसभा चुनावों मे आखिरकार कुछ उठापटक के बाद समझोता होना तय है। क्योंकि दिल्ली की सरकार बनाने के लिये प्रदेशों मे मजबूत स्थिति होना की आवश्यकता को सभी दलो ने भांप लिया है। ज्यो ज्यो चुनावी समय नजदीक आते जायेगा, त्यो त्यो समझोता होने के रास्ते हमवार होते नजर आते रहेगे।