#जानवर : उन्होंने इंसानों जैसे कपड़े पहन रखे थे लेकिन वे इंसान नहीं थे

Posted by

Prerana Sarwan
=================
वो कमरे में परेशान – सी इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे। क्योंकि परसों के तेज तूफान में एक बार जो पॉवर गया तो अड़तालीस घण्टे हो गए अभी तक नहीं आया। मोबाइल डिस्चार्ज, लैंडलाइन भी डेड है। अब्बू को भी इन्हीं दिनों टूर पर जाना था। उसने बहुत घबराहट के साथ अपने गले में दुपट्टा डाला और कमरे से दौड़ती हुई अपने घर के मेन गेट पर पहुँची। मेन गेट बंद करना भी भूल गई। और तेज तेज चलते हुए वह गली में दौड़ती हुई – सी गली के नुक्कड़ से मुड़कर मुख्य सड़क पर आई। चार कदम भी नहीं चली थी, कि एकदम ठिठक कर रुक गई। उसने दूर से देखा, सड़क के मोड़ पर कोई पाँच जानवर खड़े थे। जानवर कोई फालतू नहीं, न ही सड़कों पर घूमने वाले कुत्ता बिल्ली गाय, बकरी, नहीं, इनमें से कोई भी नहीं था। वह जानवर भेड़िए की तरह थे, लेकिन उनका हुलिया भी सुनोगे आप तो हैरान रह जाओगे। उन्होंने इंसानों जैसे कपड़े पहन रखे थे लेकिन वे इंसान भी नहीं थे। उनके लंबे- लंबे बाल, पीले- पीले दाँत, हाथों में सिगरेट लिए पी-पी कर धुंआ उड़ाते हुए वे ठहाके लगा रहे थे।

उसके कानों तक आवाज पूरी की पूरी आ रही थी। वे हँस रहे थे। वे जानवर कुछ अश्लील भी बक रहे थे। आपस में कह रहे थे कि – ” किसी शिकार की तलाश है, कोई तो इधर आएगी ही।” उनमें से एक बोला-

” यार शिकार कोई चार, पाँच साल की या आठ, दस साल की उम्र की ही होनी चाहिए। अब इससे ज़्यादा की में मजा नहीं आता है।”

दूसरा फिर जोर से हँसा, “यार जो भी हाथ लग जाय, भूख तो मिटे।” और सभी जानवर ठहाका लगाने लगे। उनके वजूद से हैवानियत टपक रही थी।
वो तमाम आवाज़ें उसके कानों में शीशे की तरह पिघल कर पूरे ज़िस्म में फ़ैल गईं। उसे समझ में नहीं आया कि, डॉक्टर को बुलाने के लिए इसी रास्ते पर आगे बढ़ जाये या घर की तरफ वापस लौट जाये। उसे निर्भया याद आ रही थी, उसे आसिफा याद आ रही थी, उसे हेतल, मधुबन की नैंसी और जाने कितनी मासूम लड़कियाँ याद आ रही थी, जिनसे उसका कोई रिश्ता नहीं था। लेकिन उनके दर्द से उसका कोई रिश्ता तो था। उसे लगा, जैसे वो किसी कसाई खाने के बाहर खड़ी है।

उसके मुँह से एक जोरदार चीख निकल गई। अभी उन जानवरों के झुण्ड ने पलट कर चीख की दिशा में देखा उससे पहले वो अपने घर की ओर बेतहाशा दौड़ पड़ी। उसकी टाँगों के बीच कुछ बह रहा था, उसकी सलवार गीली हो गई थी। कमरे के अंदर दाख़िल हो कर उसने सभी खिड़की दरवाज़े बन्द कर लिए सभी पर्दे गिरा लिए।

उसके दिल की धड़कनें बेक़ाबू थीं। वो उसी हालत में अम्मी के पास पहुँची। उसने अम्मी को हाथ लगाया, लेकिन कोई हरक़त नहीं हुई। जिस्म बिल्कुल ठण्ड पड़ा था। वो अपनी अम्मी को झँझोड़ने लगी थी। अम्मी नहीं बोली।
वो अपनी माँ के मुर्दा ज़िस्म पर पड़ी थी।

उसकी सिसकियाँ बोल रही थीं। अम्मी जब मैं पहले दिन कॉलेज जा रही थी, अब्बू भी बैठे थे, और आपने कहा था-” बेटा आलिया, तुम कॉलेज तो जा रही हो, लेकिन बहुत ऐतिहात से रहना। बेटा, देखो हमारी इज्ज़त तुम्हारे ही हाथ में है।” वो बात मुझे आज भी याद थी। इसलिए अम्मी मैं ने आपकी इज्ज़त तो बचा ली, लेकिन आपको नहीं बचा सकी, आपको नहीं बचा सकी।

बाहर से जानवरों के हँसने की आवाज़ और तेज़ हो गई थी।