जॉनी वॉकर : ए दिल है मुश्किल जीना यहां…..

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फिल्म सीआईडी का गीत ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, ज़रा हटके ज़रा बचके ये है बॉम्बे मेरी जान, जो जॉनी वॉकर पर फिल्माया गया था. गीत में ट्राम और मिलों का जिक्र है, जो अब नहीं हैं. अब लोकल ट्रेनें और मॉल हैं. मुंबई का चेहरा काफी बदल चुका है, मगर आम आदमी की मुश्किलें वही हैं और हां, बेस्ट की बसें भी वही हैं. ऐसी ही एक बस में कंडक्टर हुआ करते थे बदरुद्दीन काज़ी. उनके पिता जमालुद्दीन काज़ी इंदौर में मिल मज़दूर हुआ करते थे. आर्थिक संकट के कारण जब लंबे-चौड़े परिवार का भरण-पोषण कठिन हुआ, तो सपरिवार मुंबई (तब बॉम्बे या बम्बई) चले आए

बदरुद्दीन को बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई. बदरुद्दीन को शुरू से सिनेमा का जुनून था और लोगों की नकल उतारने में माहिर थे, सो बस में मिमिक्री से यात्रियों का मनोरंजन करते रहते थे. माहिम में एक एक्स्ट्रा सप्लायर ने देखा, तो फिल्मों में एक्स्ट्रा का काम ऑफर किया. भीड़ में खड़े होने के लिए उन्हें 5 रुपये मिलते, जिसमें से एक रुपया सप्लायर ले लेता. शूटिंग के बीच में फुर्सत के दौरान सितारों के मनोरंजन के लिए लोग अक्सर बदरू को बुला लेते और लतीफे सुनाने को कहते. हलचल की शूटिंग पर बलराज साहनी ने जब बदरू को दिलीप कुमार, याकूब जैसे स्टार्स का मनोरंजन करते देखा, तो उन्हें बुरा लगा. उन्होंने बाद में बुलाकर बदरू से कहा, तुम कलाकार हो, भांड नहीं. कला की इज्जत करना सीखो.

बदरू ने जब अपनी मजबूरी बताई, तो बलराज साहनी ने उन्हें एक आइडिया सुझाया और अगले दिन गुरुदत्त के ऑफिस में आने को कहा. बलराज साहनी उन दिनों बाज़ी की स्क्रिप्ट लिख रहे थे. अगले दिन गुरुदत्त अपने ऑफिस में चेतन आनंद के साथ कुछ डिस्कस कर रहे थे कि बदरुद्दीन अचानक आ धमके और शराबी की ऐक्टिंग शुरू कर दी. उन्होंने न सिर्फ धमाल मचाया, बल्कि गुरुदत्त के साथ बदतमीजी भी शुरू कर दी. हरकतें जब हद को पार करने लगीं, तो गुरुदत्त को गुस्सा आ गया. उन्होंने स्टॉफ को बुलाया और शराबी को बाहर सड़क पर फेंक आने का फरमान जारी कर दिया.

तभी बलराज साहनी हंसते हुए वहां आ पहुंचे और गुरुदत्त को सारा माजरा समझाया. गुरुदत्त इतने खुश हुए कि पीठ थपथपा कर न केवल उनकी ऐक्टिंग की दिल खोलकर तारीफ की और बाज़ी में फौरन एक रोल दिया, बल्कि बदरुद्दीन काज़ी को जॉनी वॉकर (नामी शराब) का नया फिल्मी नाम दे डाला. गुरुदत्त ने अपनी अन्य फिल्मों आर पार, मिस्टर ऐंड मिसेज 55, सीआईडी, प्यासा, कागज के फूल, में भी जॉनी वॉकर को महत्वपूर्ण भूमिकाएं दीं.

प्यासा फिल्म में उन पर फिल्माया गया मोहम्मद रफी का ”चंपी मालिश” वाला गीत ‘सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए… काफी पॉपुलर हुआ. अजी बस शुक्रिया में गाना बना सच कहता है जॉनी वाकर, घर की मुर्गी दाल बराबर. हास्य भूमिकाओं में इस कदर जमे कि उन्हें मुख्य भूमिका में लेकर मिस्टर कार्टून एम.ए., जरा बचके, रिक्शावाला, मिस्टर जॉन जैसी फिल्में मिलने लगीं. एक फिल्म का तो नाम ही जॉनी वॉकर था.

लोकप्रियता का यह हाल था कि छोटे भाई कमालुद्दीन काज़ी ने अपना नाम टॉनी वॉकर कर लिया. आर पार की शूटिंग के दौरान नायिका शकीला की छोटी बहन नूरजहां से हुई मुलाकात मुहब्बत और फिर गुपचुप निकाह में बदल गई. बांद्रा और फिर अंधेरी में बने अपने बंगले का नाम नूर विला रखा. जॉनी ने 35 वर्षों में करीब 325 फिल्में की और सिनेमा से संन्यास ले लिया, मगर ऋृषिकेश मुखर्जी के आग्रह पर आनंद और गुलज़ार के आग्रह पर चाची 420 की भावनात्मक भूमिकाएं उन्हें स्वीकार करनी ही पड़ीं. रजनीकांत अक्सर कहा करते थे कि बस कंडक्टर से ऐक्टर बनने की प्रेरणा उन्हें जॉनी वॉकर से मिली.

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 बिना शराब पीए ‘शराबी’ को मात देने वाला एक्टर

बॉलीवुड में जब भी कभी शराबी की एक्टिंग करने की बात आती है, तो जॉनी वॉकर का ही नाम जेहन में आता है। और हो भी क्यों ना। बॉलीवुड में आज तक उनसे बेहतर शराबी की एक्टिंग कोई नहीं कर पाया है। आपको जानकर हैरत होगी कि जिस जॉनी वॉकर को शराबी कहकर बुलाया जाता था, उसने अपने जीवन में कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया। दरअसल, उनका नाम एक व्हिस्की के नाम पर रखा गया था, क्योंकि जॉनी वॉकर शराबी की जबरदस्त नकल उतारते थे। लेकिन सच्चाई तो ये है कि वे अपनी असल जिन्दगी में शराब से कोसों दूर रहते थे। आज जॉनी वॉकर के जम्रदिन पर जानिए उनसे जुड़ी और भी कई रोचक बातें।

एक्टर से पहले बस कंडक्टर थे जॉनी-

उनका असली नाम बदरूद्दीन जमालुद्दीन काजी था। उनका जन्म 11 नवंबर 1920 में इंदौर में हुआ था। एक्टर तो वे बाद में बने इससे पहले वे एक मामूली बस कंडक्टर थे। वो भी बॉम्बे इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट में। यहां उन्होंने कई साल कंडक्टर की नौकरी की। उसके बाद किस्मत से उनकी मुलाकात बलराज साहनी से हुई। वे दादर डिपो में काम करते थे। उनकी कॉमेडी का जलवा था। कभी-कभी तो बस में भी वे यात्रियों को खूब हंसाया करते थे। बलराज साहनी, जिन्होंने गुरूदत्त के लिए बाजी फिल्म बनाई थी, उन्होंने जॉनी के हुनर को पहचाना और उन्हें अपनी फिल्म बाजी में ही शराबी की एक्टिंग करने का मौका दिया।

छठवीं कक्षा में छोडऩी पड़ी थी पढ़ाई-

जॉनी की शादी नूरजहां से हुई थी। वे नूरजहां से 1955 में फिल्म के सेट पर मिले और दोनों से शादी कर ली। बता दें कि जॉनी प्रोड्यूसर टोनी वॉकर और एक्टर विजय कुमार के भाई हैं। जॉनी के तीन बेटे हैं, जिनमें से एक बेटा नासिर खान बॉलीवुड में अपनी किस्मत भी आजमा चुका है और आज वह स्मॉल स्क्रीन इंडस्ट्री का चर्चित चेहरा है। बता दें कि जॉनी के पिता जमालुद्दीन काजी इंदौर के रहने वाले थे। जब परिवार बढऩे से भरण-पोषण मुश्किल हो गया तो इंदौर छोड़कर मुंबई चले गए। वहां उन्होंने कंडक्टर की नौकरी की, जॉनी उस वक्त छठवीं कक्षा में थे, तब उन्हें मजबूरन अपनी पढ़ाई छोडऩी पड़ी थी, लेकिन उन्होंने तय किया था कि वे अपने बच्चों को हायर एजुकेशन दिलाएंगे।

300 से ज्यादा फिल्मों में किया काम-

जॉनी वॉकर ने अपने कॉमेडी से दर्शकों का दिल जीता। इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के बाद उन्हें कई अवॉड्र्स मिले। आखिर बार उन्हें कमल हासन की फिल्म चाची 420 में देखा गया था। जॉनी वॉकर ने 1951 में आई बाजी, 1954 में आरपार, 1955 में मिस्टर एंड मिसेज 55, सीआईडी 1956, चोरी-चोरी 1956, प्यासा 1957 के अलावा नया दौर मधुमति, मेरे महबूब, राजा जानी, आनंद के अलावा कई फिल्मों में कॉमेडियन का रोल किया था। उनका एक गाना ए दिल है मुश्किल जीना यहां बहुत मशहूर हुआ था। ये गाना खुद गुरूदत्त ने जॉनी वॉकर के लिए लिखा था। उनका निधन 23 जुलाई 2003 में हो गया था।
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जॉनी वॉकर, जिंदा होते तो व्हिस्की के ब्रांड अम्बेसडर होते

एक दौर ऐसा भी था जब लोगों के पास संस्थाएं और थिएटर जैसी चीजे नहीं हुआ करती थी। उस दौर में अभिनय उनके दिल में बसा होता था। ऐसे में हुनर के दम पर कई लोगों ने अपना रास्ता खुद बनाया। उन्हीं में से एक थे महान कॉमेडियन जॉनी वॉकर।

जॉनी वॉकर से अच्छा उदाहरण कोई और हो ही नहीं सकता। 50 और 60 के दशक में हिंदी सिनेमा में उन्होंने कई तरह के किरदार निभाए लेकिन सबसे ज्यादा उन्हें शराबी के रूप में पसंद किया गया। जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी हैं। मिडिल क्लास फैमिली में जन्में जॉनी वॉकर के 10 भाई बहन थे जिनमें वे दूसरे नंबर पर आते थे।

मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के रहने वाले जॉनी वॉकर को बचपन से ही कॉमेडी का बहुत शौक था। परिवार की गरीबी हालत को देखते हुए उन्होंने अपने इस शौक के बार में किसी को कभी नही बताया। जॉनी का परिवार पूरी तरह से उनके पिता पर निर्भर था। पिता एक मिल में काम किया करते थे लेकिन मिल बंद हो जाने के कारण पूरे परिवार के साथ उन्हें मुबंई शिफ्ट होना पड़ा। परिवार में कुल 15 लोग थे जिनके पालन-पोषण उनके पिता को काफी परेशानी उठानी पड़ती थी।

परिवार की परेशानी थोड़ी कम हो जाए इसके लिए जॉनी बेहद कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने कई जगहों पर काम किया लेकिन उनका दिल कहीं नहीं लगता और वे उस काम को छोड़ देते। ऐसा बार-बार होता तभी उनके पिता ने एक पुलिस इंस्पेक्टर से कहकर जॉनी को बस कंडक्टर की नौकरी दिलवा दी। बस कंडक्टर की नौकर पाकर जॉनी काफी खुश थे। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें बिना पैसे के पूरा मुबंई घूमने का मौका जो मिल रहा हैं।


इसी बहाने जॉनी अपने सपने को जीने का मौका भी मिल रहा था। जॉनी बस कंडक्टर की नौकरी के साथ मुंबई के स्टूडियो में भी जाने लगे। जॉनी अपने कॉमेडी अंदाज से बस में पब्लिक का खूब मनोरंजन किया करते थे। जॉनी बस में अलग अलग अंदाज में आवाज निकालते जिसे देख महिलाएं काफी हंसती थी। जॉनी बस से उतने के लिए पैसेंजर से कहते ‘माहिम वाले पैसेंजर उतरने को रेडी हो जाओ लेडिज लोग पहले।’

इसी दौरान बस में जॉनी वॉकर की मुलाकात मशहूर खलनायक एन.ए.अंसारी से हुई। इस मुलाकात से उन्हें ये फायदा हुआ और फिल्म ‘आखिरी पैमाने’ में काम करने का मौका मिला। धीरे-धीरे ही सही जॉनी अपने सपने के करीब जाने की कोशिश करने लगे। एक दिन जॉनी की मुलाकात एक्टर बलराज साहनी से हुई। उन्होंने गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी।

जॉनी और गुरुदत्त की मुलाकात बेहद दिलचस्प तरीके से हुआ। दरअसल जॉनी गुरुदत्त से जब मिले तो एक शराबी की तरह मिले। जॉनी वॉकर को शराबी समझ गुरुदत्त काफी गुस्सा हुए। उन्होंने वहां मौजूद वॉचमैन को बुलाया और जॉनी वॉकर को बाहर करने के लिए कहा। तब वहां मौजूद लोगों ने बताया कि असल जिंदगी में जॉनी कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाते। सच्चाई जानने के बाद गुरुदत्त जॉनी से काफी प्रभावित हुए उन्होंने जॉनी को गले लगा लिया।

गुरुदत्त ने जॉनी वॉकर की प्रतिभा से खुश होकर अपनी फिल्म बाजी में काम करने का अवसर दिया। इसके बाद जैसे जॉनी वॉकर की किस्मत खुल गई। कहा ता ये जाता है कि उन्हें ‘जॉनी वॉकर’ नाम देने वाले गुरुदत्त ही थे। जॉनी वॉकर ने गुरुदत्त की कई फिल्मों मे काम किया जिनमें आर पार, मिस्टर एंड मिसेज 55, प्यासा, चौदहवी का चांद, कागज के फूल जैसी सुपर हिट फिल्में शामिल हैं। हिंदी सिनेमा जब किसी फिल्म जॉनी वॉकर को लिया जाता था उस फिल्म में जॉनी के ऊपर एक या दो गाने जरूर फिल्माए जाते थे। वे सभी गानें आज भी सुपरहिट है।