तलाक़ की वजह से मुसलमानो में बहुओं को क़त्ल करने का रिवाज़ नहीं है

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Aahana Shaikh
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ज़िन्दगी को आसान बनाने का ज़रिया है #तलाक़
सुनने में थोड़ा अजीब लगता है मगर ये सच है

मुसलमान मर्द बीवी के साथ सिर्फ मुहब्बत की वजह से ही रहता है, क्यों की निकाह एक समझौता है, और समझौते में गुंजाइश होती है की जब निबाह मुश्किल हो जाए तो अलग हो जाओ
और वहीँ दूसरी कौमों में शादी समझौता नहीं होती, और निबाह की गुंजाइश हो या ना हो निबाह करना ही है, अब उन के पास तीन रास्ते बचते हैं,

(1) मिट्टी का तेल या पंखे का इस्तेमाल

(2) अपने धर्म से बगावत, यानी इस्लामी तरीके पर अमल करते हुए तलाक़

(3) और तीसरा रास्ता वो है जो हमारे मुल्क की ऊँची कुर्सी पर बैठे हुई महाशय ने भी अपनाया है,

यानी ना जलाना ना तलाक़ देना, बल्कि पल पल जलने के लिए छोड़ कर निकल लेना या निकाल देना

जब निबाह की कोई गुंजाइश बाक़ी ना रह जाए और ज़िन्दगी अजीरन बनने लगे तो एक दूसरे से अलग हो कर नए हमसफर के साथ ज़िन्दगी गुजारने की आजादी इस्लाम ने दी है, और सारी दुनिया में सारे मज़हब के लोग ज़िन्दगी को आसान बनाने के लिए यही इस्लामी तरीक़ा अपनाते हैं,

ये हमारे लिए फ़ख्र की बात है की सुबह शाम इस्लाम पर नुक़्ताचीने करने वाले बेगैरत लोगों की ज़िन्दगी भी किसी ना किसी शक्ल में बिना इस्लाम को फॉलो किये हुए नहीं गुज़र सकती
और इस हक़ीक़त से भी इंकार नहीं किया जा सकता की तलाक़ ही की वजह से मुसलमानो में बहुओं को क़त्ल करने का रिवाज नहीं है

अगर इस्लाम में तलाक़ नहीं होता तो मुसलमान भी बीवियों को बेदर्दी से क़त्ल करते या बिना आपसी मुहब्बत के ज़िन्दगी गुजारने पर मजबूर होते

तलाक़ की आज़ादी के बावजूद अगर सर्वे किया जाए तो मुसलमानो में औरों के मुकाबले बहुत कम तलाक़ होता है

अब यहाँ ईमानदारी से सोचना चाहिए की कौन है औरतों के हक़ की आवाज़ उठाने वाला?
कौन है जो औरतों को भी मर्दों के बराबर दर्जा देता है? बल्कि यूँ कहा जाए की मर्दों से भी ऊँचा दर्जा देता है

कौन है जो औरतों को भी अपनी मर्ज़ी और पूरी इज़्ज़त के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने का मौक़ा देता है?

कौन है जो औरतों से पहले मर्दों को पर्दा करने का हुक्म देता है ?

कौन है जिस ने एक औरत (माँ) के क़दमों में जन्नत बताई ?

कौन है जिस ने माँ बाप की जायदाद में बेटी को भी हिस्सा दिया ?

कौन है जिस ने बेटियों को रहमत बताया ?

इन सब का बस सिर्फ एक ही जवाब है , #इस्लाम और सिर्फ इस्लाम

वही दूसरी तरह देखा जाए तो एक मख़सूस उम्र में जब औरत को मर्द की सब से ज़्यदा ज़रुरत होती है तो संन्यास लेने को बताया गया है

जब एक औरत को मर्द की मौत के बाद सहारे की ज़रूरत होती है तब उस को सती करने को बताया गया है

औरत अपने आत्म सम्मान और इज़्ज़त के लिए मर मिटने के लिए तैयार रहती है, मगर वहीँ उस से संतान पाने के लिए नियोग के लिए मजबूर करने को कहा गया है

ऐसी ही बहुत सारी बातें हैं जिस पर सोचने और बोलने की तुम को हिम्मत ही नहीं है, तुम को तो मज़ा आता है किसी और के घर में झांकने में , #तो_सुनो

दिन रात #तलाक़_तलाक़ चिलाने वालों,
औरतों को बेपर्दा और नंगा देखने के शौक़ रखने वालों,
औरतों को जलाने, लटकाने, मारने, छोड़ कर भागने या भगाने वालों,

तुम्हारी मिसाल उस शख़्स की तरह है जिस का खुद का घर जल रहा हो और वो पड़ोसी की बारात में नाचने चला जाए