तालेबान और अमरीका हाथ मिलाने को तैयार, मगर क्यों??

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अमरीका ने वर्ष 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और इस हमले में तालेबान की सरकार का तख़्ता उलट दिया गया। अमरीका अलक़ायदा और तालेबान को ख़त्म करना चाहता था।

अलक़ायदा के बारे में अमरीका का कहना है कि उसने इस संगठन के नेतृत्व का ख़ात्मा कर दिया और ओसामा बिन लादेन को मार कर संगठन की कमर तोड़ दी मगर अलक़ायदा के बारे में लंबा अध्ययन करने वाले और ओसामा बिन लादेन के साथ कई दिन गुज़ार चुके वरिष्ठ अरब पत्रकार अब्दुल बारी अतवान ने अपनी पुस्तक में लिखा कि अलक़ायदा संगठन ख़त्म नहीं हुआ बल्कि वह फैल गया। बल्कि यदि लक्ष्यों और विचार की बात की जाए तो दाइश को भी अलक़ायदा का ही एक रूप माना जा सकता है और इस नए रूप में यह चरमपंथी संगठन कई देशों में फैल चुका है।

अलक़ायदा को ख़त्म करने के लिए अमरीका ने तालेबान को भी ख़त्म करने की लड़ाई लड़ी और 17 साल से जारी इस लड़ाई का अंजाम देखा जाए तो तालेबान आज ही मौजूद हैं और कोई भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि तालेबान आतंकियों की ताक़त कम हो गई है। अफ़ग़ानिस्तान से बार बार ख़बरें आ रही हैं कि कुछ इलाक़ों पर तालेबान ने क़ब्ज़ा किया है।

इस बीच अफ़ग़ानिस्तान में नई समस्या यह उभरी है कि दाइश ने अपनी गतिविधियां तेज़ और व्यापक कर दी हैं। स्थिति यह हो गई है कि तालेबान को भी दाइश की बढ़ती ताक़त से गहरी चिंता होने लगी है।

लंदन से प्रकाशित होने वाली टाइम्ज़ पत्रिका ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि तालेबान दाइश के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमरीका की मदद हासिल करना चाहते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि तालेबान ने अफ़ग़ानिस्तान में दाइश के ख़िलाफ़ बड़ा हमला शुरू करने की तैयारी की है और उनकी कोशिश है कि अमरीका और अफ़ग़ान फ़ोर्सेज़ से उनका गठबंधन हो जाए और जब तालेबान दाइश पर हमला करें तो उस दौरान अमरीकी विमान उन पर बमबारी न करें।

अमरीकी अधिकारियों से तालेबान की वार्ताएं भी हुई हैं और उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान से तालेबान ने दाइश को खदेड़ दिया है और अब कोशिश है कि नंगरहार पर हमला किया जाए जो दाइश का सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता है। यह हमला कुछ ही दिनों में शुरू हो सकता है और कई हफ़्ते तक चलने की संभावना है।

हमले में पाकिस्तान की सीमा से लगे तीन इलाक़ों को निशाना बनाया जाएगा जहां दाइश ने अपने ठिकाने बना रखे हैं।

कुछ टीकाकार यह भी मानते हैं कि दाइश के संबंध में अमरीका की रणनीति पर नज़र रखना बहुत ज़रूरी है। अमरीका के इस दावे को कभी भी सही नहीं माना जा सकता कि वह दाइश के विरुद्ध युद्ध में पूरी तरह गंभीर है। अमरीका का रिकार्ड दर्शाता है कि वह दाइश को अपने हितों के लिए प्रयोग करता है।

सीरिया के दैरुज़्ज़ूर इलाक़े को जब सीरियाई सेना ने अपने घेरे में लिया और दाइश के बड़े सरग़ना घेरे में आ गए तो उस समय अमरीकी हेलीकाप्टरों ने हस्तक्षेप करके दाइशी सरग़नाओं को वहां बचाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था।

अमरीका दाइश को एक आतंकी संगठन के रूप में कभी भी अपने लिए समस्या नहीं समझता उसे समस्या तब होती है जब इस संगठन से अमरीकी हितों को नुक़सान पहुंचे वरना यदि दाइश या कोई भी संगठन किसी अन्य देश के ख़िलाफ़ आतंकी गतिविधियां करे तो इसे न केवल यह कि अमरीका रोकने में रूचि नहीं लेता बल्कि कभी कभी तो एसी आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन भी देता है।

अफ़ग़ानिस्तान में बहुत ख़तरनाक खेल चल रहा है और खेद की बात यह है कि इसका ख़मियाज़ा इस देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।