तीन तस्वीरें और…इस्लामोफ़ोबिया!

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Khan Riyaz
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उठो जागो लिखो और बदनाम करने वाले को कलम से झपङियाते रहो।

सुप्रीम कोर्ट हिन्दूओं की बुराई नहीं कर रहा हैं वो मुसलमानो और इस्लाम की टांग खींच रहे हैं तालिबान को निशाना बना के …उनका पैटर्न बिलकुल वही है जो अख़बार और खबरिया चैनल का होता उस वक़्त जब देश में कोई जाति आधारित ज़ुल्म होता है तो उसको मनुवादी कहने के बजाये तालिबानी कहते हैं …शब्दों और तस्वीरों का चयन करके ये घाघ लोग इस्लामोफ़ोबिया बढ़ा रहे हैं और तुर्रा ये है की सेक्युलर भी बने हुए हैं और राष्ट्रवादी भी।

किसी और का जुर्म किसी और पे थोपना कहाँ तक सत्य है।

तालिबानीयों का जुर्म बुद्ध की प्रतिमा को तोङा जाना है बस इतने से भारत के मुसलमानों को तालिबानी कह कर कोसा जाता है।

कोई ये नहीं कहता कि भारत मे उससे पहले हिन्दू आतंकवादी द्वारा मस्जिद तोङ दिया गया।

कोई ये कभी नहीं कहता कि उससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने अपने सारे बम सिर्फ इस्लामिक टेर्रिटरी मे टेस्ट किये है।

कोई ये नहीं कहता की नाकाशाकी, हिरोशिमा मे जो आज भी करोङो अपाहिज पैदा होते है वो किसकी देन है।

कोई ये नहीं कहता कि आज भी क्रूड ऑयल के लिए 3 देश कौन लुट रहा है।

लेकिन हमारी मीडिया कमजोर है और हम गुनाहगार बन के इस्लाम=शांति वाले धर्म बन कर जुर्म कबूल किये जा रहे है।

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Khan Riyaz·
सर पर कलश लेकर यात्रा करते हुए ये किसी आम आदमी की तस्वीर नहीं है बल्कि ये कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी की तस्वीर है ||

ये वही कम्युनिज्म है जो धर्म को अफ़ीम कहता है, ये वही कम्युनिज्म है जिससे जुड़े हुए नए नए मुस्लिम लड़के इस्लाम और मुसलमानों का मखौल उड़ा कर खुद को प्रगतिशील समझने की ग़लतफ़हमी पाले हुए रहते है |||

ये वही कम्युनिज्म है, जो आज़ादी और प्रगतिशीलता के नाम पर शराब और इल्लीसिट सेक्सुअल रिलेशनशिप का समर्थन करता है, ये वही कम्युनिज्म है जिससे जुड़ने वाले जामिया और ए एम यू जैसे संस्थानों के मुस्लिम लड़के लड़कियां इल्लीसिट सेक्सुअल रिलेशन को सशक्तिकरण समझते है, शराब पीने को आज़ादी समझते है और समलैंगिकता के समर्थन को क्रांति समझते है |||

ये वही कम्युनिज्म है जिसकी छदम बौद्धिकता के काल्पनिक बोझ तले दबकर मुस्लिम नौजवानों का एक बड़ा तबका एहसासे कमतरी का शिकार होकर अपने आपको इस्लाम और मुसलमानों से खुलकर जोड़ने में शर्म महसूस करता है |||

ये वही कम्युनिज्म है जो मुस्लिम नौजवानों में एक बड़ी तादाद को सेल्फ हैट्रेड का शिकार बना चुकी है, जिसे अपनी तहजीब, अपने कल्चर, अपनी विरासत, अपने दीन और ईमान से खुद को जोड़ने में भी शर्म आती है |||

ये उसी कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रतिनिधि पार्टी के जनरल सेक्रेटरी है जो सर पर कलश लेकर यात्रा कर रहे है |||

– Md Iqbal
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और अगर तुम मुंह फेरोगे तो वो तुम्हारे बदले दूसरी कौम को ले आएगा जो तुम्हारी तरह नहीं होंगे ( कुरआन, सुरः मुहम्मद :38)
अगर ईमान सुरैया के सितारों के करीब भी होगा तो अहले फारस में से बाज़ लोग उसको हासिल कर लेंगे (बुखारी )
अगर ईमान सुरैया के पास भी होगा तो अहले फारस में से एक शख्स उस में अपना हिस्सा हासिल कर लेगा, (मुस्लिम)
अगर इल्म सुरैया के सितारों पर भी होगा तो अहले फारस में से एक शख्स उस को हासिल कर लेगा (तब्रानी ),,,

मुफस्सिर ए क़ुरआन शैख जलालुद्दीन सुयुती शाफई ने अपनी किताब “تبییض الصحیفۃ فی مناقب الامام ابی حنیفہؒ ” में इस आयत और इन अहादीस को ज़िक्र करने के बाद तहरीर फरमाया कि मैं कहता हूं के हुज़ूर अकरम स. अ. व. ने इमाम अबू हनीफा रह. के बारे में इन हदीस में बशारत दी है और ये अहादीस इमाम साहब की बशारत और फज़ीलत के बारे में ऐसी साफ हैं कि उन पर एतमाद किया जाता है,,,,

शैख इबनुल हजर अल हैतमी अलमक्की शाफई ने अपनी मशहूर किताब “الخیرات الحسان فی مناقب امام ابی حنیفہ” में तहरीर किया है कि शैख जलालुद्दीन सुयुती के बाज़ तलाबा ने फरमाया और जिस पर हमारे असलाफ ने भी एत्माद किया है कि इन अहादीस की मुराद बिला शक इमाम अबू हनीफा रह. ही हैं इस लिए के अहले फारस में उनके ज़माने में से कोई भी इल्म के उस दर्जे को नहीं पहुंचा जिस पर इमाम साहब थे,,,

इन हदीस की मुराद में इख्तिलाफ ए राय हो सकता है मगर पुराने ज़माने से आज के ज़माने तक हर ज़माने के मुहद्दिसीन व फुकहा व उलामा की एक जमात ने लिखा है कि इन अहादीस से मुराद इमाम अबू हनीफा रह. हैं
उलामा शावाफे ने खास तौर पर इस बात को दलील से साबित किया है जैसा के शाफई मकतबे फिक्र के दो मशहूर जय्यद आलिम और मुफस्सिर के अकवाल ज़िक्र किए गए हैं,,,
#इमाम_अबू_हनीफा_रह.