….’तेरी जूती, तेरी चांद’

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लेखिका राशि सिंह
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“डाक्टर साहब आप तो भगवान हो हमारे लिए ।”पास बैठे एक मरीज ने डाक्टर से कहा ।
“अरे नहीं काका यह तो मेरा फर्ज है ।”
“आधी कीमत में दवाई देकर हम गरीबों का इलाज करना यह आपकी महानता ही तो है ।”
“रहने दीजिये आप सब । मुझे ज्यादा सिर पर न बैठायें ।”
“अस्पताल से शाम को घर आते हैं और फिर शाम को घर पर बनी इस दुकान में बैठते हैं ..आप से ज्यादा कर्मठ व्यक्ति मैंने नहीं देखा ।”
“ऐसी कोई बात नहीं हम सबको एक दूसरे की सहायता करनी ही चाहिए ।”
“साहब गाड़ी आ गयी ।”
“ठीक है माल उतरवा लीजिये ।”
“यह अलमारी तो सरकारी अस्पताल की है न ।”
“हाँ ,वहाँ ऐसे ही खड़ी थी सोचा कि अस्पताल के छोटे छोटे सामान घर लाकर तुम सबकी सेवा करूँ ।”
“यह सब दवाइयाँ इसी अलमारी में ही लगा दो ।”
“कितना काम करते हैं डाक्टर साहब ?”
“हाँ ।”
“दिन भर सरकारी ओहदे का लाभ उठा सारा माल अपने घर ढोते हैं और फिर शाम को हमारे हक को हमें ही बेचते हैं।है न ।”अन्य मरीज ने धीरे से
कहा ।
डाक्टर साहब के दोनों हाथों में लड्डू ।
“जनता की जूती उसी की चांद “।

लेखिका राशि सिंह
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
(अप्रकाशित एवं मौलिक लघुकथा )