#दिल्ली दलदलों की!

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Shashi Pandey
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दिल्ली के नखरे होना लाजिम है दिल्ली नाम से स्त्रिलिंग जो है नखरे तो होंगे ही । एक गाना आया था सोंड़ी के नखरे करके …था तो सोड़ी के लिए लेकिन दिल्ली की हालत पे ये बात दिल्ली को जम गयी । दिल्ली की हर बात निराली है। दिल्ली दिल वालों की कब थी मालुम नहीं लेकिन अब फन वालों के लिये बढिया है । देश के गर्मी सर्दी का थर्मामीटर यहीं से नापा तौला जाता है । फिर वैद्य और वैदिकी भी यहीं से हो जाती है । दिल्ली की सर्दी के लिए भी एक गाना खूब चला लेकिन अब नौटंकी ही दिल्ली के खाते रह गयी है ।

यहां शासन से लेकर प्रशासन तक सब कुछ अलग सा चाक चौबंद है। शहर की बाहरी सीमाओं से कोई कहीं से भी आसानी से आ जा सकता है । चोर आराम से बैंक , एटीएम, लूट सकता है । रोडरेज में लोग एक दूसरे का सर फोड़ सकते हैं । कोई भी किसी को खुल्ले आम धमका सकता है। कहीं अतिक्रमण बड़े आराम से किया जा सकता है । कहीं भी रेहड़ी लगा धंधा जमाया जा सकता है । और तो और चाहें तो फुटपाथ पर शौचालय बना कर स्वच्छता अभियान का हिस्सा बना जा सकता है । बिना सिगरेट पिये धुंयें का लुफ्त उठाया जा सकता है। एसएमसी मेम्बर बन सरकारी स्कूलों में घुसपैठ कर लाखों का माल उड़ाया जा सकता है । धर्म के नाम पर किसी भी पार्क या खाली पड़ी जगह पर इमारत बनाया जा सकता है ।ये सब दिल्ली में बड़े आराम से किया जा सकता है । फिर भी दिल्ली है कि इसके नखरे ही थमने का नाम नही लेते।

एक शाम खबर चल पड़ी कि फला बाज़ार में बम है । साहब दिल्ली होने की चुस्ती दिल्ली ने दिखायी और बम निरोधक टोली मौके पर पहुंचायी ..उधर शादी के जैसे शूंटिंग करने मीडिया वाले जम गये सबसे पहले खबर की खलिहान मारने को । काफी देर मस्सकत करने के बाद बम निरोधक दस्ता जिस नतीजे में पहुंचा वह चुनाव परिणामों की तरह बेहद हैरान करने वाला था । जिस बम की खबर थी पता चला वह बम नहीं कुत्ते का मल था । मीडिया के पहले मै ,पहले मैं की ऐसी तैसी हो गयी..लेकिन क्या करें दिल्ली है तो उसकी हर बात खबर है । अपने ही घर में घरवालों का राम नाम सत्य करने से भी संकोचियाते नही हैं ।

“घर वापसी” धर्म के चलते ये इस कदर दिल्ली पर असर छोड़ गया कि लोग अपने ही डिपार्टमेंट में अपने ही लोगों की नि:शुल्क सेवा करने लगे हैं । अच्छा है न चोर – सिपाही खेल की जगह, चोर-चोर और सिपाही – सिपाही हुआ करेगा । सब अपने से अपने तक के बीच रहेगा । इन्हीं के बीच अब दिल्ली दिलवालों की कम, दलदलों की ज्यादा हो चुकी है ।झूठ लगे तो शाम पांच बजे के बाद न्यूज का कोई भी चैनल खोल कर बैठ जाइये इतने दल दिखेंगे जैसे बारिश में कुकुरमुत्ता । फिर उसी ले क्यां – क्यां, भे -भे मचाए रहते हैं । साला न्यूज चैनल क्या लगा लो जिंदगीं नरक कर देते हैं । खैर दलदलों से याद आया दिल्ली में दलों की और जामुनों के पेड़ों की संख्या लगभग बराबर पायी जाती है । जिनकी अहमियत गिनती और आबादी बढाने तक । पेड़, जलवायु को साफ करते हैं और ये ..दल सब कुछ !

अब दिल्ली समझ से परे है । ये किसी पागलाएं ऊंट सी किसी भी करवट जा बैठती है । किसी के हांकने पर चल पड़ती है तो किसी के दुत्कारने पर रुक पड़ती है । यहां के हाहाकार के पैटर्न पर सारा देश टिका होता है ।दिल्ली बेचारी होने की लाचारी पर दुख कम मनाती है तांडव ज्यादा करती है। किसी महान आत्मा की भांति इसके आगे एक सौ आठ लगा पायें तो हैरान मत होइयेगा। इतिहास दिल्ली को यूं ही नही कहता फिरता “ दिल्ली अभी दूर है” ।

•शशि पाण्डेय