दीवाली का त्यौहार पूर्ण रूप से बाज़ारवाद का शिकार बन चुका है

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Seema Passi
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दीवाली को देखकर लगने लगा है कि अब यह त्यौहार पूर्ण रूप से बाजारवाद का शिकार बन चुका है, जिन मिट्टी के दीयों की बात जोर-शोर से सोशल मीडिया में घूमती रहती है, वो जमीन पर दिखाई नहीं देती है । सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर सीमित प्रतिबन्ध लगाया तो सभी तरफ से विरोध हो रहा है लेकिन मिट्टी के दीप जलाने पर कोई रोक नहीं है । दीवाली का मतलब ही दीपों का त्यौहार है और पटाखें इस त्यौहार का जरूरी हिस्सा नहीं हैं । बिना किसी रोकटोक के आप कुत्रिम रोशनी में खोते जा रहे हैं और दीपों के त्यौहार को मंहगे झालरों और लड़ियों वाले त्यौहार में तबदील कर चुके हैं । प्रदूषण फैलाने के नाम पर पटाखों के बैन पर हम लोग बकरीद की कुर्बानी पर सवाल खड़े करते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि एक सक्षम मुस्लिम बकरीद पर कुर्बानी के गोस्त को गरीब रिश्तेदारों, पड़ोसियों तथा उन लोगों के साथ बाँटकर खाता है, जो कुर्बानी नहीं कर पाते हैं । बकरीद पर कितने ही लोगों का खाना ऐसी कुर्बानी का परिणाम होता है । हमें खुद से सवाल पूछना चाहिये कि क्या हम लोग दीवाली पर अपनी अमीरी का प्रदर्शन करके गरीबों का मजाक नहीं उड़ातें ? आप जानते हैं कि कितने ही लोग पटाखों तथा बनावटी सजावट से अपने गरीब पड़ोसियों को चिढ़ाते हैं । दूसरों से सवाल करने से पहले खुद से सवाल करना बेहतर है, क्या हमारे सबसे बड़े त्यौहार को बाजार खा चुका है…………………..?