दूसरों को इल्म_ए_दीन सिखाने वाले आलिम पर अल्लाह और उसकी तमाम मख़लूक़ सलात भेजते हैं

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*उल्मा की फ़ज़ीलत*

हदीस शरीफ़
हज़रत अबू अमामह बाहिली रज़ीअल्लाहू तआला अन्ह से रिवायत है
उन्होंने फ़रमाया के👇

रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में दो (2) आदमीयों का ज़िक्र किया गया,
एक(1) इबादत गुज़ार का दूसरे आलिम ए दीन का,
तो हुज़ूर सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया👇

आलिम की फ़ज़ीलत आबिद पर ऐसी है जैसे मेरी फ़ज़ीलत तुम्हारे अदना आदमी पर,
फिर रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया के 👇
अल्लाह, उसके फ़िरिश्ते और आसमान व ज़मीन वाले यहां तक के चियूंटी अपने सुराख़ में और मछलियां (पानी में) सलात भेजते हैं लोगों को इल्म ए दीन सिखाने वाले पर,
📗मिश्कात शरीफ़, सफ़ा 34)

हज़रत फ़क़ीह ए मिल्लत मुफ़्ती जलालुद्दीन अमजदी अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं👇

अंदाज़ा करना चाहिए के इस हदीस शरीफ़ में किस क़दर आबिद पर आलिम की फ़ज़ीलत व शान का इज़हार है के जब हुज़ूर सय्यद ए आलम सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम तमाम अम्बिया व मुर्सलीन से अफ़ज़ल हैं तो एक अदना आदमी पर आपकी फ़ज़ीलत किस क़दर होगी,
📗इल्म और उल्मा, स.48=49)

(मगर अफ़सोस नाक़िस अक़्ल वाले वहाबी देवबंदी अहले हदीस वग़ैरह के गुरु घंटाल इस्माईल देहलवी लाअनातुल्लाह अलैह पर के उसने अपनी किताब👇
📕तक़्वियातुल ईमान, में लिख मारा के हर मख़लूक़ छोटी हो या बड़ी अल्लाह की शान के आगे चमार से भी ज़लील है,
*माअज़ अल्लाह*
यानी वहाबियों के नज़दीक अल्लाह तआला के यहां चमार की इज़्ज़त तो है मगर बड़ी मख़लूक़ यानी अम्बिया अलैहिमुस्सलाम व सहाबा ए किराम अलैहिमुर्रिज़वान और औलिया ए किराम, और छोटी मख़लूक़ आम मुसलमान और इंसान इनमें किसी की भी इज़्ज़त नहीं,

*माअज़‌अल्लाहि रब्बिल आलमीन,*
अल्लाह की लानत हो इन गुस्ताखों पर)

हज़रत मुल्ला अली क़ारी रहमतुल्लाहि तआला अलैह तहरीर फ़रमाते हैं के आलिम की फ़ज़ीलत आबिद पर इसलिए बहुत ज़्यादा है के इल्म का फ़ायदा दूसरे को भी पहुंचता है और इबादत का फ़ायदा सिर्फ़ इबादत गुज़ार(आबिद) को,
नीज़ इल्म या तो फ़र्ज़ ए ऐन है और या तो फ़र्ज़ ए किफ़ाया और ज़ाइद इबादत नफ़िल है और फ़र्ज़ का सवाब बहरहाल नफ़िल से ज़्यादा है,
📚मिर्क़ात शरह मिश्कात, जिल्द 1. सफ़ा 249)

और हज़रत शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी बुख़ारी रहमतुल्लाहि तआला अलैह तहरीर फ़रमाते हैं के इस हदीस शरीफ़ में इशारा है के फ़ज़ीलत उस आलिम को है जो लोगों को दीन सिखाता है ताके उसके इल्म से दूसरों को फ़ायदा पहुंचे और वो इबादत से अफ़ज़ल हो जाए जिससे लोगों को फ़ायदा नहीं पहुंचता,
📚अश्अतुल लम‌आत, जिल्द 1 सफ़ा 15🌹🌹🌹🌹