“देशद्रोही कहीं की, ऐसा क्यों बोलती है हमारी टीम है!!!

“देशद्रोही कहीं की, ऐसा क्यों बोलती है हमारी टीम है!!!

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Abbas Pathan भाई की वाल से via Arham Zubairi
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एक महिला मित्र है मेरी, भारत की हार के बाद उसका कॉल आया.. कहने लगी की “भारत मैच हारा मुझे बहुत मज़ा आया, हारना ही चाहिए.. मेने ठहाके के साथ हसंते हुए कहा “देशद्रोही कहीं की, ऐसा क्यों बोलती है हमारी टीम है।

तो कहने लगी की “मुझे क्रिकेट में रूचि नही है, आज सुबह मेने यूँही अपने एक बेहद करीबी मित्र से कह दिया था कि इंडियन टीम आज मैच हारेगी.. इतनी सी बात पे वो मुझे बहुत बुरा भला कहने लगा , मेने विरोध किया तो औऱ ज्यादा आपे से बाहर होने लगा.. मुझे मुल्ले की औलाद और नजाने क्या क्या कहने लगा। ग़नीमत रही की पब्लिक पैलेस था वरना हाथ भी उठा लेता वो। “”इसलिए मुझे इंडिया के हारने पे ख़ुशी हुई….””
“लड़की ईसाई थी और लड़का ब्रह्मा के मुख से पैदा हुआ संसार का सबसे शुद्ध प्राणी था”

दूसरी घटना है एक होस्टल की… एक मुस्लिम छात्र कोटा के हॉस्टल में रहता है .. बता रहा था कि उसके सीनियर छात्र भारत पाक के मैच को लेकर मज़हब पे टिपण्णी करते है.. पिछले मैच में भारत की जीत पे कह रहे थे मुल्लो की फाड़ डाली , कटुओ की ऐसी की तैसी कर दी क्रिकेट के मैदान में.. उनका ये व्यवहार मुझे परेशान करता है। यहां के अध्यापक और वार्डन भी मुझसे ऐसे बात करते है जैसे मैं पाक टीम से हूँ।

मेने दोनों घटनाओं पे एक ही प्रतिक्रिया दि की “गोबर चाट चाट कर इन लोगो का दिमाग सड़ चूका है, नजरअंदाज कीजिये, इन्होंने गोबर को च्यवनप्राश समझ लिया है, वैसे ही क्रिकेट को इन्होंने जंग समझ लिया.. यही कारण है कि इनके मुंह से नफरत की दुर्गन्ध निकलती है। इनके मुंह बिलकुल ना लगिये, लात मारिये , इग्नोर कीजिये…

अब मेरा निजी अनुभव… 2011 वर्ल्डकप में मैं एक जगह जॉब करता था, मेरा बॉस बनिया था, वो बहुत अच्छा इंसान था। उसने कभी मुझे अहसास नही होने दिया की मैं किसी गैरकौम का हूँ। वो सबसे यही कहता था कि “अब्बास मेरा छोटा भाई है”… वर्ल्डकप में मैं जिद करके बॉस के पैसे से टीवी लेकर आया ताकि हम सब मैच देख सके। भारत पाक सेमीफाइनल मैच से कुछ दिन पहले ही मुझे इधर उधर से फब्तियां मिलनी शुरू हो गयी पाकिस्तान के नाम की.. बॉस के अलावा हर कोई मैच को हिन्दू मुसलमान का मैच समझकर देख रहा था, मिडिया के महासंग्राम ने उस वक़्त भी सबका दिमाग खराब कर दिया था। यहां के लोग भारत के मुसलमानो की भावनाएं पाकिस्तान से जोड़ने में लग गए। जहीर खान उस वक्त सबसे अधिक विकट लेने वाले खिलाड़ी थे, मेने सोचा अगर ये जहीर दर्शक होता तो ये लोग इसे तुर्की बना देते। मैं कुछ ओवर का मैच देखने के बाद घर आ गया और अपने गैर मुस्लिम दोस्तों के साथ मैच देखा जिसमे मेने पाकिस्तानी टीम का खुलकर समर्थन किया पहली बार… पाकिस्तान के हारने के बाद मेने जीती हुई टीम के पक्ष में जश्न मना लिया।

स्कुल में पढता था तब साथी स्टूडेंट मुझे तुर्की कहते थे, मुझे देखकर दलेर मेहँदी का गाना गाते थे ” तुर्क तुर्क तुर्र तुर्क तुर्क तुर्र तारा रा रा” .. स्कुल के अध्यापक और प्रधानाचार्य भी पीछे नही थे। एक लड़का मुझे देखकर गाने गाता था “आओ बच्चो तुम्हे दिखाए दाढ़ी मुसलमान की, इसमें भरी रहती है अक्सर जुंए पाकिस्तान की, वन्दे मातरम वन्दे मातरम…. मेरे वे अजीज दोस्त अभी मेरी लिस्ट में है और मुझे पढ़ते भी होंगे। शायद ये पढ़कर उनका सर शर्म से झुक जाए और वो मुझे आकर गले लगा ले, मैं उन्हें माफ़ करदु और ये बात हमेशा के लिए भूल जाऊ ..काश ऐसा हो जाए।

इसके बाद मेने 9th क्लास में “मुस्लिम स्कुल” में दाखिला लिया, ताकि अपने लोगो के बीच मुझे मानसिक रैंगिंग का शिकार नही होना पड़े। मेरी पूरी क्लास में 4 गैर मुस्लिम लड़के थे और वही मेरे अंत तक दोस्त रहे। हमारी क्लास में कभी धार्मिक आधार पे भेदभाव नही किया गया किसी से… ना ही जातिगत ऊंच नीच थी। मेने ऐसी कोई बात उन तक आने ही नही दी। हमारे अध्यापको की कोशिश भी सौहार्द बनाने की रहती थी। हम हिंदी की किताबो में कबीर रसखान और मीरा के दोहे पढ़ते थे और अच्छे से समझते थे। आज क्रन्तिकारी नारे पढ़ रहे है।

बहरहाल मुझे इनसे 100 गुना ज्यादा तादाद में अच्छे लोग मिले है.. ये अनुभव छोटा है। सारे नारंगीलाल भारत पाक मैच में निकल आते है और इनसे 100 गुना तादाद में जो अच्छे लोग है वे इन्हें चुप नही कराते..

इनकी हालत ये है कि किसी शादी में भी पटाखा फुट रहा हो तो वे इसे पाकिस्तान की जीत का पटाखा समझते है। यानि हिंसा कराना सिर्फ एक पटाखे का काम रह गया।
हम वाकेही बारूद के ढेर पे बेठे है…कल को भारत पाक मैच में फूटे एक पटाखे से बस्तिया जल सकती है।

-Abbas Pathan भाई की वाल से