धरती पर मानव की उत्पत्ति 200,000 वर्ष पूर्व हुई, राम त्रेतायुग में 21 लाख साल पहले : देखें वैज्ञानिक, ऐतिहासिक तथ्य!

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विजानाति-विजानाति-विज्ञान …डा एस.बी. गुप्ता का ब्लोग….
आधुनिक-विज्ञान व पुरा वैदिक-विज्ञान, धर्म, दर्शन, ईश्वर, ज्ञान के बारे में फ़ैली भ्रान्तियां, उद्भ्रान्त धारणायें व विचार एवम अनर्थमूलक प्रचार को उचित व सम्यग आलेखों, विचारों व उदाहरणों, कथा, काव्य से जन-जन के सम्मुख लाना—ध्येय है, इस चिठ्ठे का …

यह आदि-सृष्टि कैसे हुई, ब्रह्मांड कैसे बना एवं हमारी अपनी पृथ्वी कैसे बनी व यहां तक का सफ़र कैसे हुआ, ये आदि-प्रश्न सदैव से मानव मन व बुद्धि को निरन्तर मन्थित करते रहे हैं । इस मन्थन के फ़लस्वरूप ही मानव धर्म, अध्यात्म व विग्यान रूप से सामाजिक उन्नति में सतत प्रगति के मार्ग पर कदम बढाता रहा । आधुनिक विग्यान के अनुसार हमारे पृथ्वी ग्रह की विकास-यात्रा क्या रही इस आलेख का मूल विषय है । इस आलेख के द्वारा हम आपको पृथ्वी की उत्पत्ति, बचपन से आज तक की क्रमिक एतिहासिक यात्रा पर ले चलते हैं।….प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अंतिम भाग पांच ..खंड ब. मानव का सामाजिक विकास |

( सृष्टि व ब्रह्मान्ड रचना पर वैदिक, भारतीय दर्शन, अन्य दर्शनों व आधुनिक-विज्ञान के समन्वित मतों के प्रकाश में इस यात्रा हेतु — मेरा आलेख ..मेरे ब्लोग …श्याम-स्मृति the world of my thoughts…, विजानाति-विजानाति-विज्ञान , All India bloggers association के ब्लोग …. एवं e- magazine…kalkion Hindi तथा पुस्तकीय रूप में मेरे महाकाव्य “सृष्टि -ईशत इच्छा या बिगबैंग – एक अनुत्तरित उत्तर” पर पढा जा सकता है| ) —–


इस भाग को दो खण्डों में वर्णित किया जायगा….
(अ) मानव का संरचनात्मक विकास
(ब) मानव सभ्यता का विकास

(अ) मानव का संरचनात्मक विकास
जल में जीवन व प्रथम कोशिका उत्पत्ति से मत्स्य, स्थलीय प्राणी व वानर बनने के क्रम में — छुद्र ग्रहों के पृथ्वी पर प्रहार- बम्बार्डमेंट, महाद्वीपों के निर्माण व विनाश, वातावरण के क्रमिक रासायनिक व भौतिक बदलाव… ज्वालामुखीय घटनाओं, किसी उल्का-पिण्ड के प्रभाव, मीथेन हाइड्रेट के गैसीकरण, समुद्र के जलस्तर में परिवर्तनों, ऑक्सीजन में कमी की बड़ी घटनाओं या इन घटनाओं के किसी संयोजन आदि — के कारण पृथ्वी पर जीवन का लगातार बार-बार निर्माण व विनाश का क्रम चलता रहा। प्रकृति ने भी हर बार नवीन प्रयोग किेये, प्रत्येक बार नवीन जीव-सृष्टि उत्पन्न होती रही जो वातावरण व जीवन-संघर्ष के अधिकाधिक उपयुक्त थी। अनुपयुक्त जीव-सृष्टि नष्ट हो जाती थी व शेष.. जीवन को आगे विकसित करके अपनी आगे की पीढी को अधिकाधिक उपयुक्तता प्रदान करती थी…शारीरिक संरचना व जीवन प्रक्रियाओं में भी उसी प्रकार परिवर्तन व उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) आते गये। समर्थ प्रजातियों में से कुछ जीव म्यूटेशन या विपर्यय-प्रज़नन द्वारा नवीन प्रजातियों की उत्पत्ति भी करते गये। जो प्रथम मानव की उत्पत्ति तक चलता रहा। साथ ही साथ जीवन के अन्य सभी रूपों में एक साथ विकास जारी रहा।

एक बार पुनः जल ( महासागर ) में —- यद्यपि –पैलियोशीन काल में, स्तनधारी जीवों में तेजी से विविधता उत्पन्न हुई, उनके आकार में वृद्धि हुई और वे प्रभावी कशेरुकी जीव बन गए| परन्तु इन प्रारंभिक जीवों का अंतिम आम पूर्वज शायद इसके 2 मिलियन वर्षों (लगभग 63 Ma में) बाद समाप्त हो गया| कुछ ज़मीनी-स्तनधारी महासागरों में लौटकर गए, जिनसे अंततः डाल्फिनों व ब्लयू-व्हेल आदि महासागरीय जीवन का विकास हुआ |

इस प्रकार सेनोज़ोइक युग (नव–काल) में .. लगभग 6 मिलियन के आस-पास पाया जाने वाला स्तनधारी छोटा अफ्रीकी वानर के वंशजों में आधुनिक मानव व उनके निकटतम संबंधी, बोनोबो तथा चिम्पान्ज़ी दोनों शामिल थे—कुछ कारणों से एक शाखा के वानरों ने सीधे खड़े होकर चल सकने की क्षमता विकसित कर ली | उनके मस्तिष्क के आकार में तीव्रता से वृद्धि हुई और 2 मिलियन तक, होमो -वंश के पहले प्राणी का जन्म हुआ। इसी समय के आस-पास, आम चिम्पांज़ी के पूर्वजों और बोनोबो के पूर्वजों के रूप में दूसरी शाखा निकली । और जीवन के अन्य सभी रूपों में एक साथ विकास जारी रहा।


—मानव के पूर्वज की विभिन्न शाखाये….
आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स ) की उत्पत्ति— लगभग 200,000 वर्ष पूर्व या और अधिक पूर्व अफ्रीका में हुई |
आध्यात्मिकता के संकेत देने वाले पहले मानव – नियेंडरथल वे अपने मृतकों को दफनाया करते थे, अक्सर भोजन या उपकरणों के साथ | परन्तु इसका कोई वंशज शेष नहीं बचा |

अधिक परिष्कृत विश्वासों के साथ मानव – क्रो-मैग्नन – गुफा-चित्रों, पत्थर की कुछ आकृतियां बनाने वाले व जादुई या धार्मिक महत्व वाले मानव की उत्पत्ति लगभग 32,000 वर्ष के उपरान्त ही लगभग हुई होगी क्योंकि गुफ़ा चित्र ३२००० वर्ष तक नहीं मिलते। क्रो-मैग्ननों ने अपने पीछे पत्थर की कुछ आकृतियां जैसे विलेन्डॉर्फ का वीनस, भी छोड़ी हैं|

11,000 वर्ष पूर्व की अवधि तक आते-आते, होमो सेपियन्स विश्व भर में फ़ैल गए व दक्षिणी-अमरीका के दक्षिणी छोर तक पहुंच गये, जो कि अंतिम निर्जन महाद्वीप था | औज़ार व हथियार आदि उपकरणों का प्रयोग और संवाद में सुधार जारी रहा और पारस्परिक संबंध अधिक जटिल होते गए |

यद्यपि अभी तक मानव का प्रथम अवतरण अफ़्रीका में माना जाता रहा है …. परन्तु आधुनिकतम खोजों से मानव का उद्भव व विकास एशिया से ही सिद्ध होता है। प्रोसीदिंग्स ऑफ नॅशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज के अनुसार — म्यामार में अन्थ्रोपोइड्स… [ मानव के पूर्वज ..बानर, (मंकी ) , लंगूर (एप्स) व पूर्व-मानव ]… के दांतों के जीवाश्म (फौसिल) प्राप्त हुए हैं जो अफ्रीका व एशिया के ‘मिसिंग लिंक्स ‘ हैं| वे एशिया में उत्पन्न हुए व अफ्रीका में स्थानांतरित होकर गए|
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मानव- इतिहास का पुनर्लेखन… टाइम्स ऑफ इंडिया ..साभार
मानव का जन्म भारतीय भूखंड पर होने के प्रमाण–वस्तुतः प्रत्येक भूखंड…(भूगर्भीय प्लेट )..पर अपने समयानुसार ..मानव उद्भूत हुआ परन्तु … उचित जीवन विकास योग्य वातावरण के अभाव में नष्ट होता रहा…जैसा चित्र ३ में वर्णित लुप्त मानव शाखाओं से पता चलता है |
भारतीय-टेक्टोनिक प्लेट सदा से ही प्रत्येक हलचल में पृथक अस्तित्व में रही है….१३०० मि. सुपर कोंटीनेंट रोडेनिया के समय भी ….पेंजिया के समय भी एवं गोंडवाना लेंड.. के विघटन पर विभिन्न महाद्वीप बनने के समय से भारतीय-भूखंड बनने तक भी … अतः इस भूखंड पर जीवन सबसे अधिक काल तक रहा |

विभिन्न मानव प्रजातियों का लुप्त होना भी….सुपर कोन्टीनेन्ट..पेन्ज़िया (२५० मिलियन वर्ष) के लारेशिया व गोन्डवाना में टूटने पर व गोंडवाना लेंड के स्थलीय महाद्वीपों के पुनः-पुनः जुडने- बिखरने के कारण होता रहा, जिसका मुख्य भाग, भारतीय भूभाग था । पुनः जब बाल्टिक व साइबेरिया जुडकर यूरेशिया बना तथा आस्ट्रेलिया गोन्डवाना से अलग हुआ, चाइना भाग युरेशिया के एक ओर तथा भारतीय भूभाग युरेशिया के मध्य में स्थिर हुआ और पृथ्वी का सबसे स्थिर भूभाग बना ( ….जो बाद में पृथ्वी का सबसे उपजाऊ व समृद्ध क्षेत्र बना और मानव की प्रथम जन्म भूमि व प्रथम पालना…..)

हिमालय की उत्पत्ति…. ४०-५० मिलियन वर्ष पहले टीथिस सागर के स्थान पर प्रारम्भ हुई ..गोंडवाना लेन्ड के विखंडन व भारतीय प्लेट के उत्तरीय प्लेट से टकराने से ५–६ मि. में टेथिस –समुद्र लुप्त होने लगा व ३ मि.में उसके स्थान पर तिब्बत के पठार ने ले लिया तथा हिमालय शिवालिक श्रेणी की उत्पत्ति हुई | भारतीय टेक्टोनिक प्लेट के उत्तरी भाग के डूबने पर शेष गोंडवाना लेंड के भाग से द. भारतीय भूखंड बना | भारत में आज भी गोंडवाना लेंड मौजूद है|

लगभग ५ से २ मि. तक हिमालय श्रेणी विक्सित होती रही व आज भी विकासमान है|
— अतः उत्तरीय हिम-प्रदेशीय हवाओं से सुरक्षित क्षेत्र होने से पृथ्वी के अन्य स्थानों की अपेक्षा जीवन के सर्वाधिक उपयुक्त होने के कारण …प्राणी का तेजी से विकास हुआ, और लघु बानर से मानव का जन्म स्थल भारत बना….एवं लगभग २ मि. में होमो वंश के पहले प्राणी …आधुनिक मानव का जन्म यहीं हुआ| यही समय ५-६ मि. मानव के उद्भव का भी निश्चित हुआ है…|


अन्य प्रमाण —-भारतीय पौराणिक-कथायें…..
१- अवतार कथायें…मत्स्यावतार से वामन अवतार तक….व आगे ……मत्स्य से छोटा -वानर के उद्भव व पुनः उन्नत -मानव के उद्भव व विकास की कथा से मेल खाती है।
२-जम्बू-द्वीप का वर्णन – वस्तुतः जीवमय सम्पूर्ण विश्वखंड को गोन्डवना लेन्ड या भारत या जम्बू द्वीप कहा गया है जो… = भारत+अफ़्रीका+साउथ पोल+आस्ट्रेलिया+ चाइना…युक्त भूमि थी| राजा सगर के रथ के पहियों से सात सागर व सात महाद्वीप बनने की कथा …अर्थात समस्त जम्बू-द्वीप के बनने का वर्णन…
३-सुमेरु ..आज मानव निवास की सबसे ऊंची चोटी हिमालय की बंदर-पूंछ चोटी है….जिसे सुमेरु भी कहा जाता है.. अर्थात बन्दर की पूंछ लुप्त होकर मानव बनने का स्थान | सुमेरु विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का स्थान कहा जाता है|
४- हिमालय की पुत्री पार्वती व शिव … से आगे मानव जाति के कल्याण की कथाएं ..अर्थात मानव का विकास व वृद्धि ..
५- मनाली …प्रथम मानव मनु की तपस्या स्थली मनाली हिमाचल प्रदेश में स्थित है |

मानव का विश्व भर में प्रयाण … निरंतर विकास के उपरांत मानव जनसंख्या विकास के अगले चरण में …मानव भारतीय भूभाग से उत्तर-पश्चिम की ओर से ..अफ़्रीका, योरोप, एशिया,
चाइना, और ग्रेट-बेरियर रीफ़ पार करके उत्तरी अमेरिका पहुंचा,…वहां से दक्षिण -अमेरिका-( जो इस समय तक लारेशिया के विघटन से लारेन्शिया…उत्तरी अमेरिका व गोन्डवाना के विघटन व द.अमेरिकी भूभाग के बनने पर आपस में जुड चुके थे-)– तत्पश्चात.. विभिन्न महाद्वीपों के विचलन व वातावरण के परिवर्तन..बार बार हिमयुग…आदि के कारण…मानव…..पूरे भूभाग पर एक स्थान से दूसरे स्थान पुनः पुनः परिवर्तन व गति करता रहा। अतः विभिन्न स्थानों पर अवशेष-फ़ौसिल्स आदि मिलने पर …आधुनिक वैग्यानिकों द्वारा उसी स्थान के नाम से ..उसे पुकारा जाने लगा।

आर्य जाति.. प्रथम सुसंस्कृत मानव समूह…सिंधु क्षेत्र में जन्म व विकास होने के उपरांत… पूर्व में गंगा क्षेत्र की तरफ बढे… हिन्दुस्तान ….ब्रह्मावर्त..की स्थापना एवं सुदूर पूर्व में फैले ,….. दक्षिण की ओर ..विन्ध्य पार करके दक्षिण भारत में स्थापित हुए | जो अगस्त्य मुनि की कथा से तादाम्य करता है| इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में स्थापित हुए|

मानव के वैज्ञानिक – विकास का क्रम….
अग्नि की खोज व प्रयोग – आग का प्रयोग संभवतः प्रारंभिक मानव -पैलियोलिथिक होमिनिड ..होमो हैबिलिस –द्वारा किया जाता था | अग्नि को नियंत्रित कर पाने की क्षमता शायद होमो इरेक्टस में शुरु हुई, 790,000 वर्ष पूर्व |
भारतीय वैदिक व पौराणिक देव अग्निदेव एवं अंगिरा ऋषि-कुल को अग्नि के प्रथम आविष्कारक कहा जा सकता है | यज्ञ की परम्परा भी अग्नि के आविष्कार व सर्व-प्रथम प्रयोग प्रमाण हैं|

भाषा की उत्पत्ति व सामूहिकता का उद्भव – – जैसे-जैसे मस्तिष्क का आकार बढ़ा, इसके परिणामस्वरूप उनकी सीखने की क्षमता में वृद्धि हुई, भावनाएं, विशिष्ट-कौशल, विशेषज्ञता, अनुभव-विशिष्टता के कारण मनुष्य को एक दूसरे पर निर्भरता की एक लंबी अवधि की आवश्यकता पड़ने लगी अतः सामूहिकता, सहजीवन व सामाजिकता का विकास हुआ| सामाजिक कौशल अधिक जटिल बन गए तो आपस में समन्वय व समझ हेतु … इशारों के पश्चात भाषा विक्सित व परिष्कृत हुई, विविध विधियां, प्रक्रियाएं व उपकरण विक्सित व विस्तरित हुए| जिसने आगे और अधिक सहयोग तथा बौद्धिक विकास में योगदान दिया|

(ब) मानव-सभ्यता का विकास —
युगों तक प्रारंभिक होमो सेपियन घूमंतू शिकारी-संग्राहक — के रूप में छोटी टोलियों में रहा करते थे | जैसे जैसे मस्तिष्क व सामाजिकता का विकास होता गया, सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया तीब्रतर होती गयी|

सांस्कृतिक उत्पत्ति व कृषि एवं पशुपालन — ने सांस्कृतिक उत्पत्ति के साथ जैविक उत्पत्ति व विकास का भी रूप ले लिया| लगभग 8500 और 7000 ईपू के बीच, मध्य पूर्व के उपजाऊ अर्धचन्द्राकार क्षेत्र में रहने वाले मानवों ने वनस्पतियों व पशुओं के व्यवस्थित पालन की व्यवस्था कृषि शुरुआत की जो प्रारम्भ में खानाबदोश थे व विभिन्न क्षेत्रों में घूमते रहते थे |

यह अर्ध-चंद्राकार क्षेत्र वास्तव में भारतीय भूभाग का ब्रह्मावर्त क्षेत्र था जहां सर्वप्रथम कृषि व पशुपालन प्रारम्भ हुआ| मथुरा-गोवर्धन क्षेत्र विश्व में प्रथम पशुपालन व कृषि सभ्यताएं थीं, जिसका वर्णन ऋग्वेद में भी है |

स्थाई बस्तियों का विकास— कृषि का प्रभाव दूर दूर तक पड़ोसी क्षेत्रों तक फैला व अन्य स्थानों पर स्वतंत्र रूप से भी विकसित हुआ | कृषि व पशु-पालन की विभिन्न स्थिर पद्धतियों के विकास ने मानव को खानाबदोश जीवन की बजाय एक स्थान पर स्थिर होकर रहने को वाध्य किया और मानव (होमो सेपियन्स ) कृषकों के रूप में स्थाई बस्तियों में स्थानबद्ध हुए |

जनसंख्या वृद्धि – सभी समाजों ने खानाबदोश जीवन का त्याग नहीं किया—अतः वहाँ सभ्यता तेजी से नहीं बढ़ी |विशेष रूप से जो पृथ्वी के ऐसे क्षेत्रों में निवास करते थे, जहां घरेलू बनाई जा सकने वाली वनस्पतियों व पशु-पालन योग्य प्रजातियां बहुत कम थीं (जैसे ऑस्ट्रलिया, ) … कृषि को न अपनाने वाली सभ्यताओं में, कृषि द्वारा प्रदान की गई सापेक्ष-स्थिरता व बढ़ी एवं स्थिरता के कारण जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्ति बढ़ी |
पृथ्वी की पहली उन्नत सभ्यता विकसित — कृषि का एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा; मनुष्य वातावरण को अभूतपूर्व रूप से प्रभावित करने लगे | अतिरिक्त खाद्यान्न ने एक पुरोहिती या संचालक वर्ग को जन्म दिया, जिसके बाद श्रम-विभाजन में वृद्धि हुई| परिणामस्वरूप मध्य पूर्व के सुमेर में 4000 और 3000 ईपू पृथ्वी की पहली सभ्यता विकसित हुई | शीघ्र ही सिंधु नदी की घाटी, प्राचीन मिस्र तथा चीन में अन्य सभ्यताएं विकसित हुईं|
वास्तव में सुमेरु हिमालयन क्षेत्र का केन्द्र-स्थान है, यहीं कैलाश पर्वत व मानसरोवर झील क्षेत्र है जो महादेव का धाम है | यहीं से विश्व की सर्व -प्रथम उन्नत सभ्यता भारतीय सभ्यता देव-सभ्यता के नाम से सर्व-प्रथम विक्सित हुई | पुनः सिंधु-क्षेत्र में आर्य-सभ्यता के नाम से विक्सित हुई व् ब्रह्मावर्त के अर्धचंद्राकार क्षेत्र में स्थापित हुई|

आज मानव निवास की सबसे ऊंची चोटी हिमालय की बंदर-पूंछ चोटी है….जिसे सुमेरु भी कहा जाता है.. अर्थात बन्दर की पूंछ लुप्त होकर मानव बनने का स्थान | सुमेरु विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का स्थान कहा जाता है|
धर्मों का विकास — 3000 ईपू, हिंदुत्व – विश्व के प्राचीनतम धर्मों में से एक, जिसका पालन आज भी किया जाता है, की रचना शुरु हुई. इसके बाद शीघ्र ही अन्य धर्म भी

विकसित हुए जो वस्तुतः ज्ञान व अनुभव के वैज्ञानिक आधार पर रचित सामाजिक व्यवस्थाएं थीं | हिंदुओं के पारंपरिक -मौखिक ज्ञान – वैदिक साहित्य ने विश्व-समाज में धर्म, समाज, साहित्य, कला व विज्ञान की उन्नति व विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया |
सभ्यता के इतिहास का अंधकार-मय काल….( डार्क पीरियड ऑफ हिस्ट्री )…

भारतीय विद्वान मानव जाति के स्वर्णिम युग –वैदिक-युग का काल १०००० हज़ार ई.पू. का मानते हैं | महाभारत युद्ध ( ५५००-३००० ई.पू.) एक विश्व-युद्ध था एवं जैसे वर्णन मिलते हैं वह एक परमाणु-युद्ध था जिसमें भीषण जन-धन-संसाधन व स्थानों व जातियों-कुलों व संस्कृति का विनाश हुआ | सभ्यता के महा-विनाश से इस काल के आगे का इतिहास प्राय: अँधेरे में है| विश्व भर के लिए प्रेरक, उन्नायक व उन्नति-कारक भारतीय-सभ्यता के अज्ञानान्धकार में डूब जाने से सारे विश्व इतिहास का ही यह एक अन्धकार-मय काल रहा | जिसमें सभ्यता का कोइ विकास नहीं हुआ| …….अंतत लगभग ५०० ई.पू में नई-सभ्यता के चिन्ह प्राप्त होते हैं|

नई सभ्यताओं का विकास( मध्यकाल ) –
भाषा व लेखन के आविष्कार— ने जटिल समाजों के विकास को सक्षम बनाया था | मिट्टी की तख्तियों, लौह-पत्र, ताम्र-पत्र, शिला-लेख, चर्म, सिल्क एवं भोज-पत्र का लेखन हेतु उपयोग ने प्राचीन ग्रंथों व ज्ञान के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | वैदिक युग से महाभारत-काल तक विश्व व भारतीय सभ्यता के स्वर्ण-काल में संस्कृत भाषा व भोजपत्रों पर लिखित ग्रंथों का सभ्यता के विकास में अति-महत्वपूर्ण योगदान था |
महाभारत काल- (५५००-३००० ईपू ) के पश्चात पुनः लगभग ५०० ई.पू. में विज्ञान के प्राचीन रूप में विभिन्न विषय विकसित हुए जो मानव के सुख-सुविधा के हेतु बने | नई सभ्यताओं का विकास हुआ जो एक दूसरे के साथ व्यापार किया करतीं थीं और अपने इलाके व संसाधनोंके लिये युद्ध किया करतीं थीं|

साम्राज्यों का विकास —500 ईपू के आस-पास मध्य-पूर्व, ईरान, भारत, चीन और ग्रीस, रोमन साम्राज्य आदि विभिन्न सभ्यताओं के केन्द्र थे इन सभी में लगभग एक जैसे साम्राज्य थे जो आपस में एक दूसरे से युद्ध में रत रहते थे और हारते व जीतते रहते थे इसप्रकार देशों के अधिकार क्षेत्र व् सीमा-क्षेत्र घटते व बढ़ते रहते थे | युद्ध के कारण मूलतः व्यापार या प्रयोगार्थ संसाधन हुआ करते थे| कभी-कभी व्यक्तिगत झगड़े व स्त्रियाँ भी |

विश्वविद्यालयों (प्राचीनतम शिक्षा केन्द्र– भारतीय वि.वि. तक्षशिला व नालंदा थे ) द्वारा ज्ञान के प्रसार को सक्षम बनाया गया | पुस्तकालयों के उद्भव ने ज्ञान के भण्डार का कार्य किया और ज्ञान व जानकारी के सांस्कृतिक संचरण को आगे बढ़ाया | भारत में इस काल में एक पुनर्जागरण हुआ जिसके कारण इस युग में भी भारत व भारतीय-सभ्यता विश्व में सिरमौर बन चुकी थी| अब मनुष्यों को अपना सारा समय केवल अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये कार्य करने में खर्च नहीं करना पड़ता था- जिज्ञासा और शिक्षा ने ज्ञान तथा बुद्धि द्वारा नई-नई खोजों की प्रेरणा दी|


आधुनिक विज्ञान का युग
प्रथम शताब्दी में कागज़ के आविष्कार (१०५ ई….त्साई लूँ ..चीन का हान-साम्राज्य ) व चौथी शताब्दी से पूर्ण प्रचलन में आने पर एवं मुद्रण-कला (१४३९ई. ..जर्मनी के गुटेनबर्ग द्वारा ) के आविष्कार से ज्ञान-विज्ञान व उसका संरक्षण तेजी से बढ़ा |

चौदहवीं सदी में, धर्म, कला व विज्ञान में तेजी से हुई उन्नति के साथ ही इटली से पुनर्जागरण काल ( रेनेशां ) का प्रारम्भ हुआ| जो पूरे योरोप में फ़ैल गया| पुनर्जागरण सचमुच वर्तमान युग का आरंभ है। सन 1500ई. में वास्तव में यूरोपीय सभ्यता की नवीनीकरण की शुरुआत हुई, जिसने वैज्ञानिक तथा औद्योगिक क्रांतियों को जन्म दिया, जिसके बल पर उस महाद्वीप द्वारा पूरे ग्रह पर फैले मानवीय समाजों पर राजनैतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाने के प्रयास से सन 1914 से 1918 तथा 1939 से 1945t तक, पूरे विश्व के देश विश्व-युद्धों में उलझे रहे |

यह वास्तव में योरोप द्वारा उच्च-ज्ञान,उन्नत-सभ्यता व सुस्संकारिता का प्रथम स्वाद था जो भारतीय ज्ञान-विज्ञान, लूटे हुए शास्त्रादि-पुस्तकें व अकूत धन, खजाने आदि .. के अरब व्यापारियों, मुस्लिम आक्रान्ताओं व अन्य योरोपीय व ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा मध्य-एशिया से योरोप तक फैलाये जाने से प्राप्त हुआ| जिनके आधार पर व प्रकाश में योरोप में वैज्ञानिक नवोन्नति व औद्योगिक क्रान्ति हुई|

सांस्कृतिक दृष्टि से यह युग अधि-भौतिकता के विरुद्ध भौतिकता का एवं मध्ययुगीन सामंती अंकुशों-अत्याचारों से व्यथित समाज द्वारा सामाजिक अंकुशों के विरुद्ध व्यवस्था है। यह कथित रूप में व्यक्तिवाद व अंधविश्वास के विरुद्ध विज्ञान के संघर्ष का युग था |

यह भारतीय प्रभाव में यूनानी और रोमन शास्त्रीय विचारों के पुनर्जन्म का काल था | परन्तु भारतीय ज्ञान-विज्ञान के दर्शन व धर्म से समन्वय नीति को न समझ पाने के कारण पुनर्जागरण के साथ प्रक्षन्न मानववाद भी पनपा| अर्थात लौकिक मानव के ऊपर अलौकिकता, धर्म और वैराग्य को महत्व नहीं चाहिए। जिसने अंत में उसी व्यक्तिवाद को जन्म दिया जिसके विरुद्ध विज्ञान का संघर्ष प्रारम्भ हुआ था| इसने एक नए शक्तिशाली मध्यवृत्तवर्ग को भी जन्म दिया, बौद्धिक जीवन में एक क्रांति पैदा की। पुनर्जागरण और सुधार आंदोलन दोनों पाश्चात्य प्राचीन पंरपराओं से प्रेरणा लेते थे, और नए सांस्कृतिक मूल्यों का निर्माण करते थे।

अठारहवीं सदी तर्क और रीति का उत्कर्षकाल व पुनर्जागरण काल की समाप्ति है। तर्कवाद और यांत्रिक भौतिकवाद का विकास हुआ| धर्म की जगह, मनुष्य के साधारण सामाजिक जीवन, राजनीति, व्यावहारिक नैतिकता इत्यादि पर जोर | यह आधुनिक गद्य के विकास का युग भी है। दलगत संघर्षों, कॉफी-हाउसों और क्लबों में अपनी शक्ति के प्रति जागरूक मध्यवर्ग की नैतिकता ने इस युग में पत्रकारिता को जन्म दिया।-

उन्नीसवीं सदी में —रोमैंटिक युग में फिर व्यक्ति की आत्मा का उन्मेषपूर्ण और उल्लसित स्वर सुन पड़ता है| तर्क की जगह सहज गीतिमय अनुभूति और कल्पना; अभिव्यक्ति में साधारणीकरण की जगह व्यक्ति निष्ठता; नगरों के कृत्रिम जीवन से प्रकृति और एकांत की ओर मुड़ना; स्थूलता की जगह सूक्ष्म आदर्श और स्वप्न, मध्ययुग और प्राचीन इतिहास का आकर्षण; मनुष्य में आस्था | विक्टोरिया के युग में जहाँ एक ओर जनवादी विचारों और विज्ञान पर अटूट विशवास जन्म हुआ वहीं क्रान्तिवादिता का भी जन्म हुआ|

वीसवीं सदी —- फासिज्म, रूस की समाजवादी क्रांति, समाजवाद की स्थापना और पराधीन देशों के स्वातंत्र्य संग्राम; प्रकृति पर विज्ञान की विजय व नियंत्रण से सामाजिक विकास की अमित संभावनाएँ और उनके साथ व्यक्ति व जीवन की संगति-समन्वय की समस्यायें- अति-भौतिकतावाद से उत्पन्न ..पर्यावरण, प्रदूषण, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अनाचार , स्वच्छंदता आदि…भी उत्पन्न हुईं । व्यक्तिवादी आदर्श का विघटन तेजी से हुआ अतः यौन कुंठाओं के विरुद्ध भी आवाज उठी। जिसमें चिंता, भय और दिशाहीनता और विघटन की प्रवृत्ति की प्रधानता है।

फिर से भारत —–भारतीय दृष्टि से अंधकार-युग के पश्चात विश्व के सामंती युग का प्रभाव भारत पर भी रहा| अपनी सांस्कृतिक धरोहर की विस्मृति से उत्पन्न राजनैतिक अस्थिरता के कारण उत्तर–पश्चिम की असभ्य व बर्बर जातियों के अधार्मिक, खूंखार व अनैतिक चालों से देश गुलामी में फंसता चला गया | योरोप के पुनर्जागरण से बीसवीं शताब्दी तक विश्व के सभी देश भारत पर अधिकार को लालायित रहे एवं योजनाबद्ध तरीकों से भारतीय पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों, शैक्षिक केन्द्रों, संस्कृति का विनाश व प्राचीन शास्त्रों की अनुचित व्याख्याओं द्वारा उन्हें हीन ठहराने के प्रयत्नों में लगे रहे| जिसमें असत्य वैज्ञानिक, दार्शनिक, व साहित्यिक तथ्यों का सहारा भी लिया जाता रहा, ताकि भारतीय अपने गौरव को पुनः प्राप्त न कर पायें एवं उनका साम्राज्य बना रहे| परन्तु १९ वीं सदी में भारतीय नव-जागरण काल प्रारम्भ हुआ और भारतीय स्वाधीनता संग्राम द्वारा १९४७ ई. में विदेशी दासता के जुए को उतार कर भारत एक बार फिर अपने मज़बूत पैरों पर उठ खडा हुआ है अपने समर्थ, सक्षम, सुखद अतीत के ज्ञान-विज्ञानं को नव-ज्ञान से समन्वय करके अग्रगण्य देशों की पंक्ति में |

समाज का वैश्वीकरण
प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४—१९१८ ) के बाद स्थापित लीग ऑफ नेशन्स विवादों को शांतिपूर्वक सुलझाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की ओर पहला कदम था| जब यह द्वितीय विश्वयुद्ध को रोक पाने में विफल रही, तो इसका स्थान संयुक्त राष्ट्र संघ ने ले लिया| द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद विश्व क्षितिज पर नई शक्ति अमेरिका का उदय हुआ जो संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय भी बना| 1992 में अनेक यूरोपीय राष्ट्रों ने मिलकर यूरोपीय संघ की स्थापना की. परिवहन व संचार में सुधार होने के कारण, पूरे विश्व में राष्ट्रों के राजनैतिक मामले और अर्थ-व्यवस्थाएं एक-दूसरे के साथ अधिक गुंथी हुई बनतीं गईं| इस वैश्वीकरण ने अक्सर टकराव व सहयोग दोनों ही उत्पन्न किये हैं, जो विभिन्न द्वंद्वों को जन्म देते रहते हैं |

कम्प्युटर युग–
बीसवीं सदी से प्रारम्भ, वर्त्तमान इक्कीसवीं सदी में कम्प्युटर व सुपर-कम्प्युटर के विकास ने मानव व सभ्यता के सर्वांगीण विकास को को नई-नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है | आज मानव सागर के अतल गहराइयों से लेकर आकाश की अपरिमित ऊंचाइयों को छानने में सक्षम है और मानव व्यवहार के दो मूल क्षेत्र –विज्ञान व अध्यात्म दोनों ही को यदि अतिवाद से परे ..समन्वित भाव में प्रयोग-उपयोग किया जाय तो वे भविष्य में एक महामानव के विकास की कल्पना को सत्य करने में सक्षम हैं | जो शायद आपसी द्वंद्वों से परे व्यवहार कुशल-सरल मानव होगा |

Refrences….
1-The age of earth….Donlrymps G S, Newman williyam.et el..US geological society 1997.
2.-evidence for Ancient bombardment on earth…by Robert rock
3-Evolution of fossils & plants…taylor et el.
4-oigin of earth & moon..NASA .by taylor
5-Did life come from another world?…wanflesh david etc..scientific American press.
6-cosmic evolution…tufts university..by cherssan eric…
7-Trends in ecology & evolution…Xiao S, lafflame S…
8-A natural history of first 4 billions of life on earth., newyork, nature & earth..by forggy and richmand…
9- First step on land….mac newtan, Robert B and jeniffar M..
10-The mass Extinction …science Aug 05…
11- पृथ्वी का इतिहास एवं चन्द्रमा की उत्पत्ति व विशाल संघात अवधारणा…..विकीपीडिया
१२- भारत कोश ..

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आनुवंशिकी: आर्यों की वापसी
एक नए आनुवंशिकीय शोध में 4,000 साल पहले कैस्पियन स्तेपी से भारी संख्या में आर्यों के संभावित आगमन की जो बात सामने आई है, उसने इतिहास की इस पुरानी बहस को फिर सियासी रंग दे दिया.

आनुवंशिकी आनुवंशिकी

राज़ीब खान
नई दिल्ली, 01 अगस्त 2017

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मारे पूर्वज कहां से आए थे? यह एक जबरदस्त भावनात्मक और राजनैतिक मुद्दा हो सकता है. कई लोगों के लिए यह सवाल अहम है और आधुनिक जेनेटिक्स यानी आनुवंशिकी काफी हद तक इसका जवाब दे चुकी है. बीएमसी इवॉल्यूशनरी बायोलॉजी नामक जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक पर्चे ने भारतीय मीडिया में एक विवाद को जन्म दे डाला है. यह पर्चा भारतीय उपमहाद्वीप में ‘भारोपीय विस्तार’ को रेखांकित करता है जिसका ‘निर्णायक स्रोत पॉन्टिक-कैस्पियन क्षेत्र’ है.

यूरेशियाई स्तेपी जीन्स कहां-कहां केंद्रित हैं

पर्चे की भाषा थोड़ी गूढ़ और विद्वतापूर्ण है. इसमें कहा गया है कि सभी आधुनिक भारतीयों के पूर्वजों की आनुवंशिकी इस बात के साक्ष्य दर्शाती है कि आज से 4,000-5,000 साल पहले उत्तरी ईरान और कैस्पियन क्षेत्र से जो आबादी उपमहाद्वीप की ओर आई थी, उसके साथ यहां का पर्याप्त सम्मिश्रण हुआ था. इस पर्चे पर बहस इसलिए गरम हो गई है क्योंकि वैदिक आर्यों के प्राचीन उद्भव को लेकर लंबे समय से चली आ रही एक राजनैतिक बहस को इसने फिर से ताजा कर दिया है.

आर्यः मिथकों की वंशावलीदशकों तक इतिहासकारों, भाषाविदों और पुरातत्वविदों ने भारत के साथ आर्यों के संबंध पर बहस की है जिसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है—बल्कि उलटे हुआ यह है कि सारी दलीलें संघ परिवार की उग्र-राष्ट्रवादी राजनीति और सेकुलर तथा उदार विपक्ष के दो खांचों में बंटकर रह गई हैं. कई हिंदू राष्ट्रवादी इस विचार पर असहज हो जाते हैं कि भारतीयों की जड़ें इस उपमहाद्वीप के पावन भूगोल से बाहर भी हो सकती हैं. उसी तरह विजयी ‘आक्रांताओं’ के रूप में वैदिक आर्यों और बाद में इस्लामिक तथा यूरोपीय साम्राज्यों के बीच की समांतर तुलनाओं को स्वीकारने में उदारपंथियों का भी पाखंड सामने आ जाता है.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान जेनेटिक विज्ञान ने अपने निष्कर्ष इस संबंध में देने शुरू किए हैं जो कहीं ज्यादा पुख्ता तरीके से संकेत करते हैं कि 4,000 से 5,000 साल पहले कुछ लोग—जो आर्य हो सकते हैं—इस उपमहाद्वीप में आए होंगे. बहुत संभव है कि प्राचीन डीएनए शोध का क्षेत्र जल्द ही इस सवाल को हमेशा के लिए हल कर दे. बीएमसी का दस्तावेज इस दिशा में दशकों से चल रहे सिलसिलेवार शोधों का महज एक हिस्सा है जो हर नई प्रौद्योगिकीय तरक्की के साथ और ज्यादा सटीक होते जा रहे हैं. आधुनिक मनुष्यों के जेनेटिक मार्कर के पैटर्न को देखते हुए आनुवंशिकी विज्ञानियों ने हमारी नस्ल का एक वंशवृक्ष तैयार किया है. शोधकर्ता दसियों हजार साल पुराने अवशेषों की आनुवंशिकीय सामग्री का भी परीक्षण कर रहे हैं. इसी सामग्री ने आज अफ्रीका से बाहर के सभी मनुष्यों में निएंडरथल मानव की विरासत की मौजूदगी को पुष्ट किया है.

जेनेटिक विज्ञान के अगुआ चूंकि अमेरिकी शोधकर्ता हैं, लिहाजा पूछे जाने वाले सवालों में भी कुछ पूर्वाग्रहों को जगह मिल जाती है लेकिन जिस तरीके से इस क्षेत्र का लोकतंत्रीकरण हुआ है, उसने और ज्यादा विविध विषयों के अन्वेषण को सुगम बनाने का काम किया है जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़े प्रश्न भी हैं.

आर्यों की वापसीयूरोप केंद्रित विचारधाराओं का अपना प्रतिविमर्श रहा है. भारतीय राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक ने जहां 1903 में उस दौर के प्रवास से जुड़ी आस्थाओं के मद्देनजर द आर्कटिक होम इन द वेदाज की रचना की थी, वहीं आज की तारीख में कोनराड एल्स्ट जैसे भारतीय विषयों के पश्चिमी जानकार उस सिद्धांत को सिर के बल खड़ा करके ”आउट ऑफ इंडिया” विमर्श का प्रचार कर रहे हैं.

ये दलीलें राजनीति और राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर हैं. अर्थशास्त्री और लेखक संजीव सान्याल कहते हैं कि ”1,500 ईपू. एकरेखीय आर्य आक्रमण या पलायन का विचार अब निर्णायक ढंग से गलत साबित हो चुका है. ” अपनी पुस्तक द ओशन ऑफ चर्न में सान्याल लोगों की परस्पर आवाजाही पर जोर देते हैं. वे इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि पुरातत्व विज्ञान सिंधु घाटी की किसी भी सभ्यता को मध्य एशिया से नहीं बांधता और ऐसा लगता है कि वेद खुद दक्षिणी एशिया से बाहर के भूगोल से बेखबर थे.

दस साल पहले आप आनुवंशिकीय दृष्टिकोण से सान्याल की प्रस्थापनाओं का समर्थन कर सकते थे. उस वक्त तक माइटोकॉन्ड्रिया के आधार पर मातृवंश की पहचान ही निष्कर्ष का एक साधन हुआ करती थी. इसी से पता चलता था कि सारे मनुष्य अफ्रीका से निकलकर आए हैं. उसके आधार पर मिले साक्ष्य इस ओर ठोस रूप से इशारा करते हैं कि दक्षिण एशियाई आबादी की जड़ें अपने उपमहाद्वीप में ही हैं.

दूसरे शोधकर्ता वाइ क्रोमोसोम के क्वयूटेशन के आधार पर पितृवंश की तलाश कर रहे थे. इन नतीजों से निकले साक्ष्य कहीं ज्यादा संदिग्ध थे. एक ज्यादा समान दक्षिण एशियाई वाइ वंशावली आर1ए1ए पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में भी बहुत समान है. इस वंशावली की खोज करने वाल जेनेटिक विज्ञानी स्पेंसर वेल्स कहते हैं कि नब्बे के दशक के अंत में किया उनका काम ”इस बात का ठोस संकेत देता है कि 5,000 साल पहले पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के स्तेपी से भारत की ओर पर्याप्त पलायन हुआ था. ” वेल्स ने इसे भारोपीय भाषाएं बोलने वाले बंजारों के साथ जोड़ा था और वे मानते हैं कि हालिया नतीजे वही बात कह रहे हैं. जाहिर है, यह माइटोकॉन्ड्रिया के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों से हटकर है. आर1ए1ए चूंकि बहुत विविधतापूर्ण नहीं है इसलिए इस बात का बोध होना कठिन है कि उसकी उत्पत्ति कहां या कब हुई रही होगी. वेल्स को छोड़कर कई शोधकर्ताओं का कहना था कि आर1ए1ए हो सकता है, विशुद्ध दक्षिण एशियाई ही रहा हो.

आज हम पहले के मुकाबले आर1ए1ए के बारे में ज्यादा जानते हैं. पहले शोधकर्ता वाइ क्रोमोसोम पर कुछेक सौ मार्करों को देखते थे या फिर उन क्षेत्रों को जहां सघनता ज्यादा थी लेकिन आज तकरीबन पूरे वाइ क्रोमोसोम की ही सीक्वेंसिंग कर ली गई है.

आर्यों की वापसीवेल्स के आरंभिक संशय को पुष्ट करते हुए आज कई शोधकर्ता मान रहे हैं कि आर1ए1ए ने यूरेशियाई स्तेपी से दक्षिण एशिया में 4,000 से 5,000 साल पहले प्रवेश किया होगा. आर1ए1ए के विविधतापूर्ण न होने की एक वजह यह है कि उसका हाल ही में बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है; क्वयूटेशनों को इकट्ठे हुए बहुत वक्त नहीं गुजरा है. संपूर्ण जीनोम विश्लेषण से हम पा सकते हैं कि पूर्वी यूरोपीय आर1ए1ए की वंशावली एक है जबकि इसके मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई संस्करण एक जैसे हैं. बीएमसी पर्चे के सहलेखक मार्टिन रिचर्ड्स कहते हैं, ”यह हाइ रेजॉल्यूशन हमें विस्तृत वंशावली सूचना और सटीक जेनेटिक डेटिंग मुहैया करवाता है—इसलिए हम देख पाते हैं कि वंशावलियां कब और कहां नई शाखाओं में परिवर्तित हो जाती हैं.”

प्राचीन डीएनए ने आर1ए1ए की विभिन्न शाखाओं के बीच संबंधों पर भी प्रकाश डालने का काम किया है. मध्य एशिया के विलुप्त गड़रिये, स्कायथियन और उनके भौगोलिक परिजन स्रुबना लोग जो 3,750 साल पहले कैस्पियन सागर के उत्तर में रहा करते थे, उनमें भी यही वाइ वंशावली मिलती है. ध्यान देने वाली बात है कि स्कायथियनों और स्रुबना की आर1ए1ए वंशावली यूरोपियों से नहीं बल्कि मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई लोगों से मिलती है.

माइटोकॉन्ड्रिया के आधार पर मिले निष्कर्ष और वाइ क्रोमोसोम के आधार पर निकली वंशावली के बीच के विरोधाभास को भी अब हल कर लिया गया है. इसका जवाब यह है कि भारत में जो पलायन हुआ उसमें यौन संतुलन नहीं था. बीएमसी के पर्चे में यह एक अहम बिंदु है. रिचड्र्स कहते हैं, ”ताम्र युग में पूर्वी यूरोप के स्तेपी क्षेत्र से खासकर नए लोगों के आगमन में बिल्कुल स्पष्ट लैंगिक झुकाव था” (यूरोप में भी ऐसा ही मामला है जहां स्तेपी से पलायन करने वाले मुख्यत: पुरुष ही थे).

आज हमारी समझदारी अकेले वाइ क्रोमोसोम या माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए अध्ययन तक सीमित नहीं है. आज जबकि पूरे के पूरे जीनोम का अध्ययन किया जा सकता है, वैज्ञानिकों ने दक्षिण एशिया के अतीत पर हमारी समझदारी को नई शक्ल दी है. 2013 में आनुवंशिकी विज्ञानी प्रिया मूरजानी और उनके सहयोगियों ने एक शोध प्रकाशित किया था जिसका निष्कर्ष था कि 2,000 से 4,000 साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में दो निहायत अलहदा आबादियों का मिश्रण हो रहा था. मूरजानी कहती हैं कि ”4,000 साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में विशुद्ध और अमिश्रित एएनआइ और एएसआइ समूह मौजूद हुआ करते थे. ”

पैतृक उत्तर भारतीयों को एएनआइ और पैतृक दक्षिण भारतीयों को एएसआइ कहते हैं. एएनआइ की आबादी आनुवंशिक स्तर पर पश्चिम एशियाइयों और यूरोपियों से मिलती थी. भारतीय मूल के इस मॉडल को विकसित करने वाले एक मौलिक शोधकर्ता निक पैटर्सन एएनआइ और यूरोपीय आबादियों के बीच जेनेटिक दूरी को इतना कम करके बताते हैं कि अगर आपको किसी की उत्पत्ति का पता नहीं है तो आप उसे यूरोपीय आबादी करार देंगे. दूसरी ओर, एएसआइ के कोई करीबी परिजन नहीं मिलते हैं. वे अंडमान के मूल निवासियों के सुदूर परिजन थे. मूरजानी यह भी बताती हैं कि हालिया अतीत में भले ही इन समूहों की नुमाइंदगी करने वाली गैर-मिश्रित आबादी रही हो लेकिन आज सभी दक्षिण एशियाई मूल निवासी दोनों से ही निकले हुए लगते हैं.

मूरजानी ने 2013 के अपने पर्चे में अनुमान लगाया था कि तमिलनाडु के दलित 40 फीसदी एएनआइ हैं (बाकी जाहिरा तौर पर एएसआइ). पठान 70 फीसदी एएनआइ हैं, कश्मीरी पंडित 65 फीसदी एएनआइ जबकि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण और क्षत्रिय 55 से 60 फीसदी एएनआइ हैं. जब एएनआइ और एएसआइ के मिश्रण की बात आती है तो इसे पता करने के दो नियम हैं. आप जितना ज्यादा उत्तर पश्चिम में जाएंगे, आपको उतने एएनआइ मिलेंगे. उच्च जातियों में ज्यादा एएनआइ पाए जाते हैं (बंगाली और मुंडा जनजाति पूर्वी एशियाई हैं जो न एएनआइ है और न ही एएसआइ). ऐसे ही पैटर्न की उक्वमीद वाइ क्रोमोसोम की आर1ए1ए वंशावली से की जा सकती है जिसके बारे में आनुवंशिक विज्ञानियों का अंदाजा है कि वे मध्य एशिया से 4,000-5,000 साल पहले आए रहे होंगे.

आबादी से जुड़ी आनुवंशिकी पर नजर रखने वाले भारतीय पर्यवेक्षकों ने इन निष्कर्षों को अपनी समझदारी में पिरोने का काम किया है. सान्याल कहते हैं कि ”भारतीय कई जेनेटिक धाराओं के मिश्रण हैं, खासकर एएनआइ और एएसआइ जो पाषाण युग से भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे हैं. ” मूरजानी कहती हैं कि उन्होंने अपने अध्ययन में ”पलायन की दिशा पर विशिष्ट काम नहीं किया है” लेकिन वे मानती हैं कि ”एएनआइ तक पलायन की दिशा भारत की ओर ही रही. ”

आर्यों की वापसीवे ऐसा क्यों कह रही हैं? आइए, पहले आउट ऑफ इंडिया वाली प्रस्थापना में निहित दो बिंदुओं को संबोधित करते हैं. जैसा कि सान्याल कहते हैं, दक्षिणी एशिया और मध्य एशिया के बीच पुरातात्विक संबंध सूक्ष्म हैं. आर्यों को भारत से पहले का काल याद नहीं पड़ता लेकिन पिछले 10 साल के दौरान प्राचीन डीएनए में हुई खोजों ने दिखाया है कि जहां कहीं पुरातत्वविदों को कोई पलायन नहीं दिखा, वहां बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था. इसके भौतिक रिकॉर्ड अधूरे हैं लिहाजा इसे इतिहास के व्यापक चलन के साथ जोडऩा आसान नहीं है, लेकिन इसका एक अंश यह कहता है कि कुछ आबादी, जैसे बंजारे, अपने पीछे पुरातात्विक निशान नहीं छोड़ जाती. जहां तक भारतीय धार्मिक व मौखिक इतिहास की दलीलों का सवाल है, तो इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि यूनान के लोगों की भी स्मृति यूनान से पहले की नहीं है बावजूद इसके वे भारोपीय लोगों के जितने ही प्राचीन हैं. इस मामले में सांस्कृतिक स्मृतियों के आधार पर कोई फैसला इसीलिए नहीं दिया जा सकता.

यही वजह है कि तमाम अनिश्चयों का एक ही समाधान है—प्राचीन डीएनए. पांच हजार से दस हजार साल पहले यूरोप का निकटवर्ती पूर्व और यूरोप के नमूनों का परीक्षण दिखाता है कि पलायन के कुछ अध्यायों के बाद वह प्रभुत्वकारी जेनेटिक पैटर्न उभरा जिसे हम आज देख पाते हैं. हमारे पास यूरोप के निकटवर्ती पूर्व, मध्य एशिया और यूरोप के प्राचीन व्यक्तियों के पर्याप्त नमूने हैं जिनके आधार पर हम पाते हैं कि बीते दस हजार साल के दौरान आबादी में भारी बदलाव हुए हैं. तो क्या हम भारत को इससे कुछ अलग मान सकते हैं?

दक्षिण एशियाई जेनेटिक परिदृश्य की एक समझदारी कायम करने के लिए यह जानना जरूरी है कि पश्चिमी यूरेशिया की दो प्राचीन आबादियों की इस उपमहाद्वीप के लोगों से काफी निकटता है. पहली, पश्चिमी ईरान के आरंभिक किसान जो जागरोस में थे. उनकी विरासत आज समूचे यूरेशिया में पाई जाती है और भारत के कई आबादी समूहों के साथ उनकी समानताएं मिली हैं. दूसरे, ताम्र युग में पॉन्टिक स्तेपी निवासी यमना संस्कृति के गड़रिये जो 4,000 से 5,500 साल पहले मौजूद रहे. इनकी दक्षिण एशियाई लोगों से, खासकर उत्तर पश्चिमी क्षेत्र और ब्राह्मणों के साथ काफी ज्यादा समानता है. यमना संस्कृति ताम्र युग के बाद और कांस्य युग के शुरू में 4,000 से 2,300 ईस्वी पूर्व में पॉन्टिक स्तेपी में थी. यमना संस्कृति प्रोटो-इंडो-यूरोपिय के साथ जुड़ी है.

 

हारवर्ड में डेविड राइश की प्रयोगशाला में शोधकर्ताओं ने इस बात का परीक्षण किया कि आखिर कौन से संभावित समूहों ने मिलकर दक्षिण एशियाइयों में एएनआइ तत्व को जन्म दिया होगा. काफी सघन तुलना के बाद उन्होंने पाया कि एएनआइ का सबसे सही मॉडल पॉन्टिक गड़रियों और आदिम ईरानी किसानों के सक्विमश्रण के तौर पर बनता है.

दि ओशन ऑफ चर्न में कहा गया है कि विचार और मनुष्य, दोनों दिशाओं में आवाजाही करते हैं. पाइथागोरस और अफलातून के माध्यम से भारत के धार्मिक विचारों और फलसफे का पश्चिम पर प्रभाव पड़ा. इसके उलट भारतीय वर्णमाला की संभावित उत्पत्ति यूरोप के निकटवर्ती पूर्व में रही होगी जबकि इस्लाम और ईसाइयत, दोनों ने इसी उपमहाद्वीप में अपनी जड़ें जमाईं.

यही हाल जीन्स का भी है. दक्षिण एशियाई जेनेटिक मार्कर थाईलैंड से लेकर बाली तक दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाए जाते हैं. इसके उलट, बंगाली, असमिया और मुंडा लोगों की दक्षिण-पूर्वी विरासत उनके चेहरों और जीन्स में दिखती है और खासकर मुंडा के मामले में तो यह समानता उनकी भाषा से जाहिर होती है. जीन प्रवाह के इस विचार की हालांकि कुछ सीमाएं भी हैं.

हरियाणा के राखीगढ़ी में 4500 साल पुराने कंकाल मिले हैं

भारत की विशिष्ट जेनेटिक विरासत एएसआइ की जड़ें भले उपमहाद्वीप में गहरी हों और इसका कहीं और की आबादी के साथ निकटवर्ती रिश्ता न हो लेकिन ईरान और अफगानिस्तान में कम अनुपात में ही सही, ये मिलती हैं. रोमा लोगों को अपवाद मान लें तो एएसआइ की विरासत समूचे पश्चिमी यूरेशिया में अनुपस्थित है (रोमा खानाबदोश लोग हैं जो मुख्यत: यूरोम और अमेरिका में रहते हैं. वे मूलत: उत्तर भारत के राजस्थान, हरियाणा और पंजाब इलाके के रहने वाले थे). इससे पता चलता है कि भारत के बाहर पश्चिम की ओर पलायन पिछले कुछ हजार वर्षों में बहुत कम हुआ था क्योंकि जैसा कि मूरजानी कहती हैं, भारत की सभी आबादियों की पिछले 4,000 साल में वंशावली एएसआइ की ही रही.

कई जेनेटिक विज्ञानी अब मानते हैं कि नियोलिथिक और ताम्र युग में मध्य यूरेशिया व पश्चिमी एशिया से दक्षिण एशिया में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था और यही हमारे पास मौजूद आंकड़ों को समझाने का सबसे सहज मॉडल है. आउट ऑफ इंडिया वाला मॉडल सैद्धांतिक रूप से असंभव तो नहीं है लेकिन कई लोगों को यह संग्रहित डेटा की व्याख्या के लिहाज से दूर की कौड़ी जान पड़ता है.

संभावनाओं के पार जाने के लिए हमें वापस उसी चीज पर लौटना होगा जिसने अतीत में हमें राह दिखाई है: प्राचीन डीनए. दुर्भाग्यवश, कायदे से दक्षिण एशिया का कोई प्राचीन डेटा उपलब्ध नहीं है. आज भी शोधकर्ता हरियाणा के राखीगढ़ी से जुटाए हड़प्पाकालीन नमूनों के आधार पर जेनेटिक नतीजे निकालने में जुटे हुए हैं. इनके नमूना परीक्षण के नतीजे आने के बाद प्रायिकताओं को दूर किया जा सकता है. इंडिया टुडे को पता चला है कि राखीगढ़ी से जुटाए नमूनों से निकले नतीजों का ऐलान इसी साल सितंबर में होना है.

सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के जेनेटिक विज्ञानियों के साथ मिलकर इस परियोजना पर काम करने वाले डेकन कॉलेज के एक पुरातत्वविद् डॉ.वसंत शिंदे राखीगढ़ी के नमूनों से निकले संकेत देने में थोड़ा संकोच बरतते हैं. वे कहते हैं, ”राजनैतिक रूप से यह बहुत संवेदनशील है. ” चूंकि ये नमूने जिन कब्रों से जुटाए गए, वे 2300 से 2500 ईसा पूर्व के हैं—यानी वही अवधि जब मार्टिन रिचड्र्स और उनके सहयोगी पॉन्टिक-कैस्पियन से भारत में व्यापक पलायन की बात करते हैं—लिहाजा एक संभावना यह कायम रहती है कि राखीगढ़ी से आर1ए1ए डीएनए निकलेगा जो बहस का अंत नहीं कर पाएगा.

यह तो केवल एक स्थल है, बाकी सैकड़ों स्थल यूरोप और यूरोप के निकटवर्ती पूर्व के हैं जहां से हमें आश्चर्यजनक नतीजे देखने को मिले हैं. एक वक्त ऐसा होगा जब हमारे पास दक्षिण एशिया से सैकड़ों नमूने होंगे और बेशक चौंकाने वाले नतीजे भी आएंगे.

जनसंख्या के इतिहास के जेनेटिक अध्ययन की दिशा अब पलायन की ओर मुड़ चुकी है लेकिन कुछ लोग अब भी निरंतरता के मॉडल को पकड़े बैठे हैं. ज्ञानेश्वर चौबे बीते 10 साल से मानव जेनेटिक्स पर अध्ययन कर रहे हैं और अपने निष्कर्ष प्रकाशित कर रहे हैं. भारतीय आबादी के इतिहास में उनका योगदान पर्याप्त है. वे आर्यों के व्यापक पलायन की अवधारणा से कतई विचलित नहीं हैं. इसकी बजाए वे मानते हैं कि प्रकाशित शोध ने दिखाया है कि ”इस पलायन (अगर हम मान भी लें तो) की जेनेटिक छाया न्यूनतम है. ”

बिना प्राचीन डीएनए के हम जीवित मनुष्यों के बीच अंतर के आधार पर मोटी बातें कर सकते हैं, मसलन, अतीत के अवशेषों को आज जीवित लोगों के डेटा के आधार पर पुनर्संयोजित करना. हमारा सारा अनुमान अवधारणाओं पर आधारित है. चौबे नियोलिथिक ईरानी किसानों और ताम्र युग के पॉन्टिक गड़रियों के साथ आधुनिक भारतीयों के जेनेटिक साक्ष्य वाले आंकड़ों का खंडन नहीं करते. वे उसी समान संभाव्यता से यह दलील देते हैं कि ”जो समूह कांस्य युग या नियोलिथिक युग में भारत में रह रहे थे, हो सकता है कि उनकी वंशावली स्तेपी की आबादी या नियोलिथिक ईरानियों की आबादी से मेल खाती हो. ” अवधारणाओं को पुनर्संयोजित करते हुए वे इस बात से भी असहमति जताते हैं कि आर1ए1ए के इतिहास में कोई संशोधन किया जाना चाहिए.

वे कहते हैं कि बीएमसी के पर्चे से उन्होंने खुद को आर1ए1ए के कारण ही अलग कर लिया था. भले कुछ लोगों को यह स्वीकार्य न हो, लेकिन चौबे की दलील का आधार डेटा और सैद्धांतिकी में निहित है. असहमति संभाव्यताओं पर है. जेनेटिक आंकड़ों के मामले में यह सामान्य बात है. बहुत जल्द ही प्राचीन डीएनए इन तमाम टकरावों का समाधान कर देगा, लेकिन यह मुद्दा बेहद राजनैतिक रंगत का है.

कुछ चीजें फिर भी हम जानते हैं. जेनेटिक विज्ञानियों ने भारतीयों के जीनोम में जाति और क्षेत्र की विविधता की पुष्टि की है. ऐसा लगता है कि भारी पैमाने पर मिश्रण बीते 4,000 साल के दौरान हुआ है. उससे पहले अधिकांश उपमहाद्वीप ऐसे लोगों से भरा था जो आज जीवित लोगों से जेनेटिक रूप से बहुत भिन्न थे. शायद यह संयोग हो—या नहीं भी—कि आर1ए1ए पितृवंशीय लिंकेज जो कई भारतीय पुरुषों को योरोपियों और मध्य एशियाइयों के साथ बांधता है, वह काफी तेजी से विस्तृत होने लगता है जब एएनआइ और एएसआइ के बीच दक्षिण एशिया में आखिरी सम्मिश्रण हो रहा होता है.

कई ऐसी अहम जेनेटिक प्रयोगशालाएं जिन्होंने यूरोप और उसके निकटवर्ती पूर्व के इतिहास की हमारी समझ को प्राचीन डीएनए अध्ययन के रास्ते समृद्ध किया है, वे अब भारत की ओर देख रही हैं. बहुत दिन नहीं बचे हैं जब एक पुराने विवादास्पद सवाल का हल नए उपकरणों से होगा. अब आप कम से कम यह नहीं कह सकते कि भारतीय आर्यों के भारी संख्या में इस उपमहाद्वीप में आने की सैद्धांतिकी गलत है. उपमहाद्वीप के बाहर प्राचीन समूहों के साथ संपर्क बहुत संभावित है और कई जेनेटिक विज्ञानी अब पलायन और आबादी के कायाकल्प पर आधारित नजरिए का प्रसार कर रहे हैं जो यूरोप और निकटवर्ती पूर्व में एक मानक बन चुका है.

इसके बावजूद कुछ अहम संस्थानों में ऐसे विश्वसनीय वैज्ञानिक मौजूद हैं जो नए मॉडलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं. एक नई सहमति भले ही बन रही हो, लेकिन यह अब तक स्थापित नहीं हो सकी है. जेनेटिक विज्ञान एक मोटी झलक दे सकता है और इसमें त्रुटियों का आकार एक झटके में हजार साल आगे या पीछे का हो सकता है. यहां हर नई खोज व्यापक तस्वीर के विवरणों को थोड़ा और साफ करती है. हम जबरदस्त संक्रमण और महान बौद्धिक उबाल के दौर में हैं.

यह उबाल राजनीति तक चला जाता है. जिस तरह आर्यों के आक्रमण का मूल मॉडल राजनीति-प्रेरित था, उसी तरह आउट ऑफ इंडिया सैद्धांतिकी को भी राजनैतिक वैधता प्राप्त है. हकीकत यह है कि मानव इतिहास के ये मॉडल या तो सही हैं या फिर गलत. ये समझ में आएं या नहीं लेकिन तथ्य तो हमारे पास ही हैं. इन तथ्यों की राजनैतिक व्याख्या में बदलाव होता रहता है. मनुष्य परिवर्तनशील है लेकिन प्रकृति अनंत है.

फिलहाल हम अंधेरे में आईना देख रहे हैं. आने वाले कुछ वर्षों में यह बात शायद शीशे की तरह साफ हो जाएगी कि 4,000 साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ नए लोग आए थे. आज अधिकतर प्रतिष्ठित शोधकर्ताओं के लिए यह आस्था का मामला है. एक सदी की सैद्धांतिकी और वैचारिकी ने हमें तथ्यों और प्रति-तथ्यों से समृद्ध किया है लेकिन हो सकता है कि जेनेटिक्स की खोह से निकला इतिहास हमारी रूढ़ और भव्य धारणाओं को चमत्कृत करके तोड़ दे. इस शोध का सबसे उत्साहजनक पहलू यही होगा कि सदियों पुराने तर्कों के साथ यह शोध कैसे अपना मेल बैठा पाता है.

(राज़ीब खान जेनेटिसिस्ट हैं जो इनसिटोम में काम करते हैं और यूसी डेविस में पीएचडी कैंडिडेट हैं. वे ‘जीन एक्सप्रेशन’)
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धरती पर मानव की उत्पत्ति का इतिहास विज्ञानं की दृष्टि से

मनुष्य की उत्पत्ति : मनुष्य की उत्पत्ति का सिद्धांत हर धर्म में अलग-अलग है। हालांकि विज्ञान सभी से अलग सिद्धांत प्रतिपादित करता है। यदि हम बाइबल में उल्लेखित आदम से लेकर ईसा मसीह तक के ईशदूतों की उम्र की गणना करें तो 3,572 वर्ष मनुष्य की उत्पत्ति के होते हैं। ईसाई मत के जानकार स्पीगल के अनुसार यह अवधि 6,993 वर्ष की मानी गई है और कुछ और संशोधनवादियों ने यह समय 7,200 वर्ष माना है अर्थात मनुष्य की उत्पत्ति हुए मात्र 7,200 वर्ष से कुछ अधिक समय व्यतीत हो चुका है। लेकिन हिन्दू धर्म में इसको लेकर भिन्न मान्यता है।
संसार के इतिहास और संवतसरों की गणना पर दृष्टि डालें तो ईसाई संवत सबसे छोटा अर्थात 2016 वर्षों का है। सभी संवतों की गणना करें तो ईसा संवत से अधिक दिन मूसा द्वारा प्रसारित मूसाई संवत 3,583 वर्ष का है। इससे भी प्राचीन संवत युधिष्ठिर के प्रथम राज्यारोहण से प्रारंभ हुआ था। उसे 4,172 वर्ष हो गए हैं। इससे पहले कलियुगी संवत शुरू 5,117 वर्ष पहले शुरू हुआ।

इब्रानी संवत के अनुसार 6,029 वर्ष हो चुके हैं, इजिप्शियन संवत 28,669 वर्ष, फिनीशियन संवत 30,087 वर्ष। ईरान में शासन पद्धति प्रारंभ हुई थी तब से ईरानियन संवत चला और उसे अब तक 1,89,995 वर्ष हो गए। ज्योतिष के आधार पर चल रहे चाल्डियन संवत को 2,15,00,087 वर्ष हो गए। खताई धर्म वालों का भी हमारे भारतीयों की तरह ही विश्वास है कि उनका आविर्भाव आदिपुरुष खता से हुआ। उनका वर्तमान संवत 8,88,40,388 वर्ष का है। चीन का संवत जो उनके प्रथम राजा से प्रारंभ होता है वह और भी प्राचीन 9,60,02,516 वर्ष का है।

अब हम अपने वैवस्तु मनु का संवत लेते हैं, जो 14 मन्वंतरों में से एक है। उससे अब तक का मनुष्योत्पत्ति काल 12,05,33,117 वर्ष का हो जाता है जबकि हमारे आदि ऋषियों ने किसी भी धर्मानुष्ठान और मांगलिक कर्मकांड के अवसर पर जो संकल्प पाठ का नियम निर्धारित किया था और जो आज तक ज्यों का त्यों चला आता है उसके अनुसार मनुष्य के आविर्भाव का समय 1,97,29,447 वर्ष होता है।

हिन्दू धर्म अनुसार धरती और मनुष्य की उत्पत्ति का रहस्य जानिए

एवं विद्येरहौरात्रै: काल गत्योप लक्षितै:।
अपक्षितामि वास्यापि (ब्रह्माण:) परमापुर्वय: शतम्।।
यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते।
पूर्व: परार्धोउपक्रान्तो हृपरोऽद्य प्रवर्तते।। -3/11-32-33

अर्थात ब्रह्माजी की आयु 100 वर्ष की है। उसमें पूर्व परार्ध (50 वर्ष) बीत चुका है व द्वितीय परार्ध प्रारंभ हो चुका। त्रैलोक्य की सृष्टि ब्रह्माजी के दिन प्रारंभ होने से होती है और दिन समाप्त होने पर उतनी ही लंबी रात्रि होती है। एक दिन एक कल्प कहलाता है।
मनुस्मृति में कल्प की लंबाई के लिए लिखा है:-
देविकाना युगाना तु सहस्रं परिसंख्यया।
ब्राह्ममेकमहज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च।। 1/72
अर्थात ब्रह्माजी का एक दिन (कल्प) देवताओं के 1,000 युगों (चतुर्युगों) के बराबर होता है तथा उतनी ही लंबी रात्रि होती है।

यह एक दिन 1. स्वायम्भुव, 2. स्वारोचिष, 3. उत्तम, 4. तामस, 5. रैवत, 6. चाक्षुष, 7. वैवस्वत, 8. सावर्णिक, 9. दक्ष सावर्णिक, 10. ब्रह्म सावर्णिक, 11. धर्म सावर्णिक, 12. रुद्र सावर्णिक, 13. देव सावर्णिक और 14. इन्द्र सावर्णिक- इन 14 मन्वंतरों में विभाजित किया गया है। इनमें से 7वां वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है। 1 मन्वंतर 1000/14 चतुर्युगों के बराबर अर्थात 71/3/8 चतुर्युगों के बराबर होता है।

भिन्न संख्या पृथ्वी के 27/1/4 प्रतिशत झुके होने और 365/1/4 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा करने के कारण होती है। इस भिन्न को जैसा कि सूर्य सिद्धांत 1/19 के अनुसार 2 मन्वंतरों के बीच का संधिकाल मान लिया गया है जिसका परिमाण 4,800 दिव्य वर्ष (सतयुग काल) माना गया है अत: अब मन्वंतरों का काल=14*71=994 चतुर्युग।

15 संधियों का समय=8400*15=72,000=6 चतुर्युग कुल 994+6=1,000 चतुर्युगों में मन्वंतर बंटे हैं और एक चतुर्युग 1,200 दिव्य वर्षों का हुआ। यहां प्रत्येक मन्वंतर के बीच 4,800 वर्ष का सतयुग होना बताया गया है। उससे यह बात पुष्ट हो जाती है कि कलयुग का द्वितीय चरण प्रारंभ होने से पूर्व 4,800 वर्षों तक धर्म की चरम उन्नति होगी और सतयुग जैसा सुख लोगों को मिलेगा। एक युग में अनेक युग बर्तने के सिद्धांत के आधार पर ऐसा प्रत्येक मन्वंतर में होता रहेगा।

महाभारत वन पर्व 188/22-26 में चतुर्युगों का परिमाण अलग-अलग बताते हुए लिखा गया है-
4,000 दिव्य वर्षों (अर्थात 4-4 सौ वर्ष) उसके संध्या व संध्यांश होते हैं अर्थात कुल 8,400 वर्ष का सतयुग, 3,000 वर्षों का त्रेतायुग उसकी संध्या व संध्यांश के 3-3 सौ वर्ष कुल 3,600 वर्ष, 2,000 दिव्य वर्ष और 2-2 सौ संध्या व संध्यांश=2,400 वर्ष का द्वापर और 1,000 वर्ष व 1-1 सौ वर्ष का कुल 1,200 वर्ष का कलियुग। इस हिसाब से एक चतुर्युग 4800+3600+2400+1200 वर्ष =1,200 दिव्य वर्ष हुए।

अब दिव्य वर्ष का मनुष्य वर्ष से हिसाब लगाएं तो मनुस्मृति के अनुसार-

दवे रात्रहनी वर्ष प्रविभागस्तयो:पुन।
अहस्तत्रोद गयनं रात्रि: स्याद् दक्षिणायनम्।।

अर्थात देवताओं का एक दिव्य रात-दिन मनुष्य के 1 वर्ष के बराबर होता है। उत्तरायन सूर्य दिन और दक्षिणायन रात्रि होती है।

1. ब्रह्माजी (पृथ्वी की उत्पत्ति काल) 15वें वर्ष के प्रथम दिन के 6 मन्वंतर और 7 संधियां बिता चुके। 2. 7वें वैवस्वत मन्वंतर के 27 चतुर्युग अपनी संधियों के साथ बीत चुके। 3. प्रचलित 28वें चतुर्युग में भी प्रथम तीनों (सतयुग, द्वापर, त्रेता) युग बीत चुके। 4. अब कलियुग के विक्रम संवत 2073 तक 5,119 वर्ष बीत चुके।

इस हिसाब से 6 मन्वंतर=671 चतुर्युग=6*71*12,000 दिव्य वर्ष=51,12,000 दिव्य वर्ष। इनकी 7 संधियों का समय 33,600 दिव्य वर्ष, 7वें वैवस्वत मन्वंतर के 12,000*27=3,24,000 दिव्य वर्ष, 3 युग इस वैवस्वत के बीत चुके उनका योग 4,800+360+2,400 दिव्य वर्ष=10,800 कुल, 51,12,000+33,600+3,24,000+10,800= 5,480-400 दिव्य वर्ष।

दिव्य वर्ष में 360 का गुणा करने से मनुष्य वर्ष आ जाते हैं। (भारतीय मतानुसार वर्ष 360 दिन का ही होता है। प्रक्षेप संधियों के रूप में जुड़ गया)। वह 54,80,400*360=1,97,29,44,000 मनुष्य वर्ष होते हैं। इसमें कलियुग के 5,119 वर्ष जोड़ने से 1,97,29,44,000+5,119=19,72949,119 वर्ष अक्षरों में 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख उनपचार हजार 119 वर्ष पृथ्वी की आयु हुई। भूगर्भ शास्त्री यह आयु 1 अरब 98 करोड़ वर्ष निकालते हैं जबकि उनकी गणना पदार्थों के गुण से संयुक्त है और भारतीय आंकड़े शुद्ध गणित। दोनों में इतने हद तक साम्य भारतीय दर्शन की सत्यता और प्रामाणिकता ही सिद्ध करते हैं।

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धरती पर जन्म लेनेवाला पहला मानव कौन था !

संसार का पहला मानव स्वयंभुव मनु को माना जाता है, जबकि स्त्री थीं शतरूपा.

कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने जब 11 प्रजातियों और 11 रुद्रों की रचना की, तब अंत में उन्होंने स्वयं को दो भागों में विभक्त कर लिया. पहला भाग मनु के रूप में और दूसरा शतरूपा के रूप में प्रकट हुआ. कहते हैं कि ब्रह्मा ने प्रजापतियों को प्रकाश से, रुद्रों को अग्नि से और स्वायंभुव मनु को मिट्टी से बनाया था.

मनु से बना मानव

संसार में आने वाला सबसे पहला मानव मनु था. इसलिए इस जाति का नाम ‘मानव’ पड़ गया. संस्कृत में इसे मनुष्य कहा जाने लगा और अंग्रेजी भाषा में भी मिलते-जुलते नाम ‘मैन’ का प्रयोग हुआ.

यह सभी नाम पहले मनुष्य मनु से ही जुड़े हुए हैं.

क्या कहती है पौराणिक कथा ?

पुराणों के मुताबिक एक बार ब्रह्मा जी अपने कुछ कार्यों में व्यस्त थे. अचानक उनके भीतर से एक काया उत्पन्न हुई और उनके सामने आकर खड़ी हो गई. वह कोई मामूली काया नहीं थी बल्कि हूबहू उनके जैसी दिखनेवाली परछाईं थी.

उस परछाईं को देख कुछ देर तक तो भगवान ब्रह्मा समझ ना सके कि उनके साथ आखिरकार हुआ क्या है. आगे जाकर यही मानव संसार का पहला मानव कहलाया. जिसे स्वयंभु मनु के नाम से भी जाना जाता है.

एडेम के जन्म की कहानी

जैसे हिंदु मान्यता के मुताबिक भगवान ब्रह्मा के शरीर से मनु की उत्पत्ति हुई, ठीक वैसे ही बाइबल में भी ईश्वर के शरीर से एक परछाईं ने जन्म लिया था. यह परछाईं मनु की तरह ही ईश्वर की छाया थी और उन्ही की तरह दिखती थी. बाइबल में इस परछाई यानी कि पहले मनुष्य को ‘एडेम’ का नाम दिया गया.

इन दोनों कथाओं से यह पता चलता है कि मनु ही वह पहला मानव था जिसने मनुष्य के रूप में धरती पर जन्म लिया.

जन्म के बाद समानता

इन सभी तथ्यों पर गौर करें तो पुराण में मनु और शतरुपा के जन्म को लेकर कुछ असमानताएं देखी गई. वहीं बिना किसी गर्भ द्वारा इस संसार में आने की बात पुराण के तथ्य से मिलती जुलती है.

पुराण के अनुसार मनु तथा शतरूपा के जन्म के बाद भगवान ब्रह्मा द्वारा उन्हें धरती पर मानवीय संसार को स्थापित करने का आदेश दिया गया था.

ठीक उसी तरह एडेम के जन्म के बाद धरती पर मानवीय संसार को स्थापित करने की कहानी का ज़िक्र बाइबल में मिलता है.

बहरहाल धरती के पहले मनुष्य मनु के जन्म से लेकर उसके विस्तार तक की कई अलग-अलग कहानियां सुनने को मिलती है, जो रोचक होने के साथ ही हैरत में डालने वाली हैं.

लेकिन इन कहानियों में छुपे तथ्य ही मानव जाति से जुड़े इतिहास को हमारे सामने उजागर करने में हमारी मदद करते हैं.

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मानव की उत्पत्ति के विकास की कहानी

धरती पर मानव इतिहास को लेकर उलझन और बढ़ गई है. इंसान की उत्पत्ति सबसे पहले कब और कहां हुई इस बात को लेकर एक नई खोज सामने आई है. भारत में मिले औजारों से ये बात सामने आ रही है कि अफ्रीका में इंसान के पूर्वज कहीं और से आए थे.

बता दें कि वैज्ञानिकों ने चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर अत्तिरमपक्कम में मिले 7200 पत्थर के औजारों को देखने के बाद इस बाद का अनुमान लगाया है कि इन औजारों की आयु 385,000 साल से 172,000 साल के बीच मध्य पुरापाषाण युग के शुरू होने से पहले की है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये युग 125000 साल पहले शुरू हुआ था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि चेन्नई में जो हथियार मिले हैं वो काफी उन्नत किस्म के हैं. इन हथियारों ने 400000 साल पहले ही पुराने औजारों की जगह ले ली थी. इससे पहले ये माना जा रहा था कि धरती पर इंसान की उत्पत्ति 3 लाख साल पहले हुई थी.

लेकिन अब इन हथियारों ने पहले के इस तथ्य को ध्वस्त कर दिया है. पहले ऐसा माना जाता था कि इंसान के पूर्वज होमो सेपियंस का 3 लाख साल पहले अफ्रीका में अभ्युदय हुआ था.

इसके बाद धीरे-धीरे वो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गए और वहीं बसते चले गए. हालांकि इस बात को लेकर भी खोजकर्ताओं और वैज्ञानिकों में मतभेद बना हुआ है कि ये कब और कैसे हुआ? इसी के साथ ही वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर भी मतभेद है कि वो अकेले ही गए या फिर समुदायों में पलायन किया.

जानकारी के अनुसार एक हफ्ते पहले ही इस्राएल में इंसान का एक जबड़ा मिला, जिससे ये बात सामने आई कि इंसानों ने 180000 साल पहले अफ्रीका छोड़ दिया था और दूसरे इलाकों के लिए पलायन कर गए थे.

अभी तक वैज्ञानिकों का मानना था कि अफ्रीका और यूरोप में 3-4 लाख साल पहले पत्थरों से औजार बनाए जाते थे, वहीं भारत में पत्थरों से औजार बनाना 125,000 साल पहले शुरू हुआ था.

लेकिन अब इन नए औजारों की खोज ने इस दावे को झुठला दिया है. इस बारे में वैज्ञानिकों ने कहा कि औजारों के पास कोई जीवाश्म नहीं मिला है

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बौद्ध धर्म का केंद्र था अयोध्या, पहले साकेत था नाम : राम त्रेतायुग के मानव थे, त्रेतायुग आज से लगभग 21 लाख साल पहले था

रामायण के अनुसार राम त्रेतायुग के मानव थे और त्रेतायुग आज से लगभग 21 लाख साल पहले हुआ करता था
इतिहास में अयोध्या का ज़िक्र लगभग बुद्ध के साथ शुरू होता है. 600 ईसा पूर्व में राजा प्रसेनजीत के समय ये श्रावस्ती की राजधानी साकेत थी. चीनी यात्री फाह्यान के लिखे विवरणों में भी इसका नाम ‘सा-शी’ लिखा मिलता है. गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त अपनी राजधानी पाटलीपुत्र से यहां लेकर आए और इसका नाम अयोध्या रखा. गुप्त काल में अयोध्या बड़ा व्यापारिक केंद्र बना. ईसा पूर्व के बड़े शहरों में अयोध्या का ज़िक्र मिलता है. प्राचीन भारत की सप्तपुरियों में मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका और द्वारिका के साथ अयोध्या का ज़िक्र आता है.

बौद्ध धर्म का केंद्र
अयोध्या बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र रहा है. ये शहर श्रावस्ती, कुशीनगर जैसे बौद्ध केंद्रों के पास बसा है. कहा जाता है कि बुद्ध कई बार अयोध्या आए. चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने विवरणों में यहां के बौद्ध मठों का ज़िक्र किया है. इसके अलावा दक्षिण पूर्वी एशिया के जिन देशों में बौद्ध धर्म है, वहां के साहित्य में अयोध्या का काफी ज़िक्र मिलता है. थाईलैंड का शहर ‘अयुथ्या’ और ‘इंडोनेशिया’ के योग्यकारता शहर का नाम भी अयोध्या के नाम पर रखा गया है.

जैन तीर्थंकरों की ज़मीन
जैन धर्म के 24 में से 5 तीर्थंकर अयोध्या में पैदा हुए. इनमें जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव भी हैं. जैन ग्रंथों में भगवान महावीर के भी अयोध्या आने का ज़िक्र है. यहां ऋषभदेव का मंदिर भी है.

अयोध्या का अवध बनना
1226 ईसवी में दिल्ली सल्तनत के बनने के साथ अयोध्या में फिर बदलाव आए. अयोध्या से अवध बनने के इस दौर में शहर का बड़े स्तर पर कोई खास ज़िक्र नहीं मिलता है. मुगल काल में मीर बाक़ी ने बाबर के नाम पर बाबरी मस्जिद बनवाई. मुगल काल के कमज़ोर होते-होते अवध आज़ाद हो गया. वहां के शिया नवाबों के शासन में गंगा-जमुनी तहज़ीब अच्छे से फली-फूली. कला और संस्कृति को खूब बढ़ावा मिला. ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ जैसी ठुमरियां लिखी गईं. लखनऊ का कत्थक घराना बना. अंग्रेज़ आए तो अयोध्या फैज़ाबाद का हिस्सा बना. जागीरें दी गईं. नए-नए राजा बने. राजा महमूदाबाद, फैज़ाबाद जैसे तमाम राज परिवार इसी काल में स्थापित हुए.

साहित्य और कला में अयोध्या
तुलसी की रामचरितमानस काशी के घाट पर लिखी गई. शैव संप्रदाय के शहर में वैष्णव कथा लिखे जाने के कारण कई लोग मानते हैं कि इस काल में अयोध्या की राम से जुड़ी पहचान वैसी नहीं थी, जैसी आज-कल है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लिखी गई रामायणों जैसे रामकियन, कृतिवास रामायण, कंब रामायण आदि में भी राम कथा के बाकी शहरों (पंचवटी, चित्रकूट, किष्किंधा, रामेश्वरम, लंका) की चर्चा अयोध्या से ज़्यादा है. इसके अलावा अयोध्या का ज़िक्र ‘होली खेले रघुवीरा अवध में’ जैसे गीतों में खूब आता है. उमरावजान अदा की मशहूर कहानी भी फैज़ाबाद में बुनी गई है. जिस अवध की तहज़ीब और मुजरों का ज़िक्र गाहे-बगाहे होता रहता है, वो भी अयोध्या या अवध का ही एक हिस्सा है.

हर शहर के कई किरदार होते हैं. अयोध्या के भी हैं. मगर 2000 साल का इतिहास, कला और संस्कृति समेटे अयोध्या की तमाम पहचानों पर 1992 भारी पड़ता है. राम जन्मभूमि मामले में आगे चाहे जो हो, मगर अयोध्या को उसकी बाकी पहचान शायद ही मिल पाए.

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अयोध्या भारत के राज्य उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर है। कुछ सालो से यह शहर भारत के सबसे चर्चित शहरो में से भी एक रहा है। जिसका कारण यहा राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद है और यह विवाद अयोध्या का इतिहास को कलंकित कर रहा। आपने इस लेख में हम अयोध्या का इतिहास, अयोध्या हिस्ट्री इन हिंदी में जानेगें।

अयोध्या, उत्तर प्रदेश, भारत का इतिहास एक आकर्षक है। प्राचीन इतिहास के अनुसार, अयोध्या सबसे पवित्र शहरों में से एक था जहां हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, इस्लाम और जैन धर्म के धार्मिक धर्म एक साथ पवित्र स्थान का निर्माण करने के लिए एकजुट थे।अयोध्या का इतिहास एक चेकर्ड है। अथर्ववेद में, इस जगह को एक ऐसे शहर के रूप में वर्णित किया गया था जो देवताओं द्वारा बनाया गया था और स्वर्ग के रूप में समृद्ध था।

अयोध्या का इतिहास

प्राचीन कोसाला के शक्तिशाली साम्राज्य में अयोध्या की राजधानी थी। यह शहर 600 ईसा पूर्व में एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र भी था। इतिहासकारों ने इस स्थान की पहचान 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान एक प्रमुख बौद्ध केंद्र साकेत, (यह व्यापक रूप से धारणा है कि बुद्ध ने कई अवसरों पर अयोध्या का दौरा किया) जो यह 5 वीं शताब्दी ईस्वी तक बना रहा। वास्तव में, चीनी भिक्षु फा-हियान ने यहां देखा कि कई बौद्ध मठों का रिकॉर्ड रखा गया है।

जैन समुदाय के लिए अयोध्या का ऐतिहासिक महत्व भी है। यहा दो महत्वपूर्ण जैन तीर्थंकरों का जन्म स्थान है जो सदियों की शुरुआत में पैदा हुए थे। जैन ग्रंथ भी इस शहर के जैन धर्म के संस्थापक महावीर की यात्रा के लिए गवाही देते हैं।

7 वीं शताब्दी ईस्वी में, चीनी भिक्षु जुआन झांग (ह्यूएन त्संग) ने अयोध्या में कई हिंदू मंदिरों को खोजते हुए रिकॉर्ड किया। महाकाव्य रामायण में, अयोध्या शहर भगवान श्री राम के जन्मस्थान के रूप में उद्धृत किया गया है, एक हिंदू देवता जिसे भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में पूजा की गई थी। 1400 के दशक में अयोध्या एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बन गया जब रामानंद, हिंदू रहस्यवादी ने राम के भक्ति संप्रदाय की स्थापना की।

16 वीं शताब्दी में अयोध्या मुगल साम्राज्य के शासन में आने के साथ सत्ता में बदलाव आया। 1856 में ब्रिटिश शासकों द्वारा अयोध्या को कब्जा कर लिया गया था। 1857 और 185 9 के बीच, यह स्थान उन मुख्य केंद्रों में से एक था जहां भारतीय स्वतंत्रता के पहले युद्ध की चमक शुरू हुई थी। बाद में इन स्पार्कों ने कलकत्ता में शुरू हुई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरोध में भारतीय सैनिकों के राष्ट्रव्यापी विद्रोह का नेतृत्व किया

अयोध्या का इतिहास का एक और पहलू
धार्मिक दृष्टि से अयोध्या का प्राचीन इतिहास बताता है कि वर्तमान अयोध्या महाराज विक्रमादित्य का बसाया हुआ है। महाराज विक्रमादित्य देशाटन करते हुए संयोगवश यहा सरयू नदी के किनारे पहुंचे थे। यही पर उनकी सेना ने शिविर डाला था। उस समय यहा वन था।कोई प्राचीन तीर्थ चिन्ह यहा नही था। महाराज विक्रमादित्य को इस भूमि में कुछ चमत्कार दिखाई पडा। उन्होने खोज आरंभ की और पास के योगी संतो की कृपा से उन्हे ज्ञात हुआ कि यह श्री अवध भूमि है। उन संतो के निर्देश से महाराज ने यहां भगवन लीलास्थली को जानकर यहां मंदिर, सरोवर, कूप इत्यादि बनवाए।

यह भी कहा जाता है कि श्रीराम जी के साथ अयोध्या के कीट पतंगे तक उनके दिव्य धाम में चले गए। इससे त्रेता युग में ही अयोध्या उजड गई थी। माना जाता है कि श्रीराम के पुत्र कुश ने इसे फिर से बसाया था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार:– यह पवित्र नगरी पवित्र सरयू नदी के तट पर बसी हुई है। और सर्वप्रथम इसे मनु ने बसाया था।

अयोध्या दर्शन धार्मिक दृष्टि से – अयोध्या तीर्थ यात्रा
भारत की प्राचीन सांस्कृतिक सप्तपुरियो में अयोध्या का प्रथम स्थान है। श्रीराम के पूर्ववर्ती राजाओ की यह राजधानी रही है। इश्वाकु सेश्री रघुनाथ जी तक सभी चक्रवर्ती नरूशो ने अयोध्या के सिंहासन को भूषित किया है। श्रीरामज की अवताय भूमि होने के बाद अयोध्या को साकेत कहा जाने लगा।

अयोध्या का महात्मय
वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह पवित्र नगरी सरयू नदी के तट पर बसी हुई है। सर्वप्रथम मनु ने इसे बसाया था।

स्कंद पुराण के अनुसार अयोध्या नगरी सुदर्शन चक्र पर बसी है।

“भूतशुद्धितत्व” के अनुुसार अयोध्या नगरी राम चंद्र के धनुषाग्र पर स्थित है।

स्कंद पुराण में अयोध्या का अर्थ का निर्वचन करते हुए कहता है कि “अ” कार ब्रह्मा है। “य” कार विष्णु है। तथा “ध” कार रूद्र का स्वरूप है। इसलिए अयोध्या ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर इन तीनो का समन्वित रूप है। समस्त उप पातको के साथ ब्रह्मात्यादि महापातक भी इससे युद्ध नही कर सकते इसलिए इसे अयोध्या कहते है।

पहले ब्रह्माज ने अयोध्या की यात्रा की थी। और अपने नाम से एक कुंड बनाया था। जो ब्रह्माकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। एक कुंड सीताज द्वारा बनाया गया था, जिसका नाम सीता कुंड है। इस कुंड को भगवान राम ने वर देकर समस्त कामपूरक बनाया, इसमे स्नान करने से मनुष्य सब पापो से मुक्त हो जाता है।

ब्रह्माकुंड से पूर्वोत्तर में ऋणमोचन तीर्थ (सरयू) है। यहा लोमेशजी ने विधिपूर्वक स्नान किया था। सरयू में ही रूक्मणि तीर्थ है। जहा भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी, रूक्मणि जी ने स्नान किया था।कहा जाता है कि जो अयोध्या में स्नान, जप, तप, हवन, दान, दर्शन, ध्यान आदि करता है वह सब अक्षय होता है।

अयोध्या दर्शनीय स्थल
अयोध्या के घाट
अयोध्या में सरयू नदी किनारे कई सुंदर व पक्के घाट बने है। यदि पश्चिम से पूर्व की ओर चले तो यह घाट इस क्रम से मिलेगें
1. ऋणमोचन घाट
2. सहस्त्रधारा घाट
3. लक्ष्मण घाट
4. स्वर्गद्वार
5. गंगामहल
6- शिवाला घाट
7. जटाई घाट
8- अहिल्याबाई घाट
9. धौरहरा घाट
10. रूपकला घाट
11. नया घाट
12. जानकी घाट
13. राम घाट

अयोध्या के मंदिर – अयोध्या के प्रमुख दर्शनीय स्थल

लक्ष्मण घाट
इस घाट पर लक्ष्मण का एक मंदिर है। इसमे पांच फुट ऊंची एक लक्ष्मण जी की मूर्ति है। यह मूर्ति सामने वाले कुंड में पायी गई थी। कहते है कि यही से लक्ष्मण जी परम धाम पधारे थे।

स्वर्गद्वार घाट
इस घाट के निकट श्री नागेश्वरनाथ महादेव जी का मंदिर है। कहा जाता है कि बाबर ने जब जन्म स्थान के मंदिर को तोडा था। तब पुजारियो ने वहा से यह मूर्ति उठाकर यहा स्थापित कर दी। इसी घाट पर यात्री पिंडदान करते है।

अहिल्याबाई घाट
इस घाट के थोडी दूर त्रेतानाथजी का मंदिर है। कहते है कि श्रीराम ने यहा यज्ञ किया था। इसमे राम सीता की मूर्ति है।

हनुमानगढी
यह स्थान सरयू तट से लगभग एक मील दूर नगर में स्थित है। यह एक ऊंचे टिले पर चार कोट का छोटा सा दुर्ग है। 60 सीढियां चढकर हनुमानजी के मंदिर में जाया जाता है। मंदिर के चारो ओरर मकान है जिसमे साधु संत रहते है। हनुमानगढी के दक्षिण में सुग्रीव टिला और अंगद टिला है।

कनक भवन
अयोध्या का मुख्य मंदिर यही है। यह मंदिर ओरछा नरेश का बनवाया हुआ है। यह सबसे विशाल एवं भव्य है। इसे श्रीराम का अत:पुर या सीताजी का महल कहते है। इसमे मुख्य मूर्तिया राम सीता की है। सिंहासन पर जो बडी मूर्तिया है। उनके आगे सीता- राम की छोटी मूर्तिया है। जिन्हे प्राचीन बताया जाता है। यह मंदिर अयोध्या का इतिहास का मुख्य मंदिर है।

दर्शनेश्वर
हनुमानगढी से थोडी दूरी पर अयोध्या नरेश का महल है। इस महल की वाटिका में दर्शनेवर महादेव का सुंदर मंदिर है।

जन्म स्थान
कनक भवन से आगे श्रीराम जन्मभूमि है। अयोध्या का यही वो विवादित स्थान है। जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां के प्राचीन मंदिर को तुडवाकर बाबर ने बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था। परंतु अब यहा फिर से श्रीराम की मूर्ति आसीन है। उस प्राचीन मंदिर के घेरे में जन्मभूमि का एक छोटा मंदिर और भी है। जन्म स्थान के पास कई मंदिर है। गीता रसोई, चौबीस अवतार, कोप भवन, रत्नसिहासन, आनंदभवन, रंगमहल इत्यादि।

तुलसी चौरा
राजमहल के दक्षिण में खुले मैदान मे तुलसी चौरा है। यह वह स्थान है जहा गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित्र मानस की रचना की थी।

मणि पर्वत
तुलसी चौरा से लगभग एक मील दूर अयोध्या रेलवे स्टेशन के पास वन में एक टीला है। टीले के ऊपर मंदिर है। यही पर अशोक के 200 फुट ऊंचे एक स्तूप का अवशेष है।

दातुन कुंड
यह स्थान मणिपर्वत के निकट है। कहा जाता है कि यहा भगवान श्रीराम दातुन किया करते थे। कुछ लोग यह भी कहते है कि जब गौतम बुद्ध अयोध्या में रहते थे, तब एक दिन यहां उन्होने अपनी दातुन गाड दी थी। बाद में वह सात फुट ऊंचा वृक्ष हो गई। वह वृक्ष अब नही है। परंतु उसका स्मारक अब भी है। अयोध्या में बहुत अधिक मंदिर है। हम यहा केवल प्राचीन स्थानो का उल्लेख किया है। नए मंदिर तथा संतो के स्थान तो यहा बहुत अधिक है।

दशरथ तीर्थ
यह सरयू तट पर स्थित है। रामघाट से इसकी दूरी लगभग 8 मील है। यहा महाराजा दशरथ का अंतिम संस्कार हुआ था।

छपैया
यह एक गांव है। जो सरयू नदी के पार है। अयोध्या से इसकी दूरी लगभग 6 मील है। यह स्वामी सहजानंदजी की जन्मभूमि है।

नंदिग्राम
यह स्थान फैजाबाद से लगभग 10 मील तथा अयोध्या से 16 मील दूर है। यहा राम वनवास के समय भरतजी ने 14 वर्ष तपस्या की थी। यहा पर भरतकुंड सरोवर और भरत जी का मंदिर है।

सोनखर
यहा महाराजा रघु का कोषागार था। कुबेर ने यही सोने की वर्षा की थी।

सूर्य कुंड
रामघाट से इस स्थान की दूरी लगभग पांच मील है। यहा के लिए पक्का सडक मार्ग है। यहा एक बडा सरोवर है। जिसके चारो ओर घाट बने हुए है। पश्चिम किनारे पर सूर्य नारायण का मंदिर है।

गुप्तारघाट
यह स्थान अयोध्या से पश्चिम की ओर सरयू किनारे लगभग 9 मील की दूरी पर है। यहा सरयू स्नान का बहुत बडा महत्व माना जाता है। घाट के पास गुप्तहरि का मंदिर है।

जनौरा
महाराजा जनक जब अयोध्या पधारते थे तो उनका शिविर यही पर रहता था। अयोध्या से सात मील दूर फैजाबाद सुल्तानपुर सडक पर यह स्थान है। यहा गिरिजाकुंड नामक एक सरोवर तथा एक शिव मंदिर है।

अयोध्या के मेले
अयोध्या का इतिहास और अयोध्या दर्शन में यहा लगने वाले मेलो का बहुत बडा योगदान है। अयोध्या मे श्रीराम नवमी पर सबसे बडा मेला होता है। दूसरा मेला 8-9 तक श्रावण शुकलपक्ष में झूले का होता है। कार्तिक पूर्णिमा पर भी सरयू स्नान करने यात्री यहा आते है।

अयोध्या की परिक्रमा
अयोध्या की दो परिक्रमाए है। जिनका अयोध्या का इतिहास, अयोध्या तीर्थ यात्रा में बडा महत्व है। बडी परिक्रमा स्वर्गद्वार से आरंम्भ होती है। वहा से सरयू किनारे सात मील जाकर और फिर मुडकर शाहनवाजपुर, मुकारस नगर होते हुएदर्शन नगर में सूर्यकुंड पर पहला विश्राम किया जाता है। वहा से पश्चिम कोसाह, मिर्जापुर, बिकानेर ग्रामो में से होते हुए। जनौरा पहुंचने पर दूसरा विश्राम किया जाता है। जनौरा से खोजमपुर, निर्मलीकुंड, गुप्तारघाट होते हुए स्वर्गद्वार पहुचने पर परिक्रमा पूरी हो जाती है।

छोटी परिक्रमा केवल 6 मील की है। यह रामघाट से प्रारंम्भ होती है। इसके बाद बाबा रघुनाथदास की गद्दी, सीता कुंड, अग्निकुंड, विद्या कुंड, मणिपर्वत, कुबेर पर्वत, सुग्रीव पर्वत, लक्ष्मण घाट, स्वर्गद्वार होते हुए रामघाट आकर पूर्ण होती है।

अयोध्या का इतिहास, अयोध्या हिस्ट्री इन हिंदी आदि शीर्षको पर आधारित हमारा यह लेख आपको कैसा लगा हमे कमेंट करके जरूर बताए। यह जानकारी आप अपने दोस्तो के साथ सैशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते है।

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साकेत

वाल्मीकि रामायण से ज्ञात होता है कि श्रीराम के स्वर्गारोहण के पश्चात् अयोध्या उजाड़ हो गई थी। जान पड़ता है कि कालांतर में, इस नगरी के, गुप्तकाल में फिर से बसने के पूर्व ही साकेत नामक उपनगर स्थापित हो गया था। वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत के प्राचीन भाग में साकेत का नाम नहीं है। बौद्ध साहित्य में अधिकतर, अयोध्या के उल्लेख के बजाय सर्वत्र साकेत का ही उल्लेख मिलता है, यद्यपि दोनों नगरियों का साथ-साथ वर्णन भी है। गुप्तकाल में साकेत तथा अयोध्या दोनों ही का नाम मिलता है। इस समय तक अयोध्या पुन: बस गई थी और चंद्रगुप्त द्वितीय ने यहाँ अपनी राजधानी भी बनाई थी। कुछ लोगों के मत में बौद्ध काल में साकेत तथा अयोध्या दोनों पर्यायवाची नाम थे किंतु यह सत्य नहीं जान पड़ता। अयोध्या की प्राचीन बस्ती इस समय भी रही होगी किंतु उजाड़ होने के कारण उसका पूर्व गौरव विलुप्त हो गया था।

वेबर के अनुसार साकेत नाम के कई नगर थे।
कनिंघम ने साकेत का अभिज्ञान फ़ाह्यान के शाचे और युवानच्वांग की विशाखा नगरी से किया है किंतु अब यह अभिज्ञान अशुद्ध प्रमाणित हो चुका है। सब बातों का निष्कर्ष यह जान पड़ता है कि अयोध्या की रामायण-कालीन बस्ती के उजड़ जाने के पश्चात् बौद्ध काल के प्रारंभ में (6ठी-5वीं शती ई.पू.) साकेत नामक अयोध्या का एक उपनगर बस गया था जो गुप्तकाल तक प्रसिद्ध रहा और हिन्दू धर्म के उत्कर्ष काल में अयोध्या की बस्ती फिर से बस जाने के पश्चात् धीरे-धीरे उसी का अंग बन कर अपना पृथक् अस्तित्व खो बैठा।

ऐतिहासिक दृष्टि से साकेत का सर्वप्रथम उल्लेख बौद्ध जातककथाओं में मिलता है। नंदियमिग जातक में साकेत को कोसल-राज की राजधानी बताया गया है।
महावग्ग में साकेत को श्रावस्ती से 6 कोस दूर बताया गया है।

पतंजलि ने द्वितीय शती ई.पू. में साकेत में ग्रीक (यवन) आक्रमणकारियों का उल्लेख करते हुए उनके द्वारा साकेत के आक्रांत होने का वर्णन किया है, अधिकांश विद्वानों के मत में पंतजलि ने यहाँ मेनेंडर (बौद्ध साहित्य का मिलिंद) के भारत-आक्रमण का उल्लेख किया है।

कालिदास ने रघुवंश में रघु की राजधानी को साकेत कहा है-

‘जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामविनन्द्य सत्वौ, गुरुप्रदेयाधिकनि:स्पृहो र्थी नृपो र्थिकामादधिकप्रदश्च’ में राम की राजधानी के निवासियों को साकेत नाम से अभिहित किया गया है।

‘यां सैकतोत्संगसुखोचितानाम्’ में साकेत के उपवन का उल्लेख है जिसमें लंका से लौटने के पश्चात् श्रीराम को ठहराया गया था-

‘साकेतोपवनमुदारमध्युवास’ में साकेत की पुरनारियों का वर्णन है-

‘प्रासादवातायनदृश्यबंधै: साकेतनार्योन्चजलिभि: प्रणेमु:‘

उपर्युक्त उद्धरणों से जान पड़ता है कि कालिदास ने अयोध्या और साकेत को एक नगरी माना है। यह स्थिति गुप्त काल अथवा कालिदास के समय में वास्तविक रूप में रही होगी क्योंकि इस समय तक अयोध्या की नई बस्ती फिर से बस चुकी थी और बौद्धकाल का साकेत इसी में सम्मिलित हो गया था। कालिदास ने अयोध्या का तो अनेक स्थानों पर उल्लेख किया ही है। आनुषांगिक रूप से, इस तथ्य से कालिदास का समय गुप्त काल ही सिद्ध होता है।

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साकेत के अयोध्या बनने का इतिहास
बाबरी-मस्जिद राममंदिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट अब बौद्धों के दावे की भी सुनवाई होगी। दरअसल, अयोध्या के निवासी विनीत कुमार मौर्य ने दावा किया है कि विवादित ज़मीन पर दरअसल मंदिर या मस्जिद नहीं, बौद्ध धर्म से जुड़ा ढांचा था। याचिका में दावा किया गया है कि ए.एस.आई की खुदाई में मिले गोलाकार स्तूप, दीवार और खंभे बौद्ध विहार की विशिष्टता हैं न कि मंदिर या मस्जिद के। इसी के साथ, अयोध्या की ऐतिहासिकता भी चर्चा मे आ गई है। यह तथ्य है कि अयोध्या का पुराना नाम साकेत था। बौद्ध साहित्य में इसका काफ़ी उल्लेख है। इस संदर्भ में पढ़िए, इतिहास के शोधार्थी प्रद्युम्न यादव का विश्लेषण-

क्या हम जिसे अयोध्या समझते हैं वो वाकई राम की अयोध्या है ?
हज़ारो साल पहले वाल्मीकि ने अपनी किताब रामायण में राम को जन्म दिया और राम अस्तित्व में आये. रामायण के अनुसार राम त्रेतायुग के मानव थे और त्रेतायुग आज से लगभग 21 लाख साल पहले हुआ करता था. धरती के वैज्ञानिक इतिहास के हिसाब से देखें तो यह समय ‘प्लीयोसिन शक‘ का था जब महासागरों और महाद्वीपों को स्वरूप प्राप्त हुआ और धरती पर मानव का जन्म हुआ. इस समय के मानव के पास न भाषा थी न ही अपनी कोई संस्कृति और सभ्यता. वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा कुत्ते, बिल्ली, घोड़े, गदहे आदि होते हैं. आधुनिक मानव यानी होमोसेपियंस, जिस मानव प्रजाति के हम हैं उसने धरती पर जन्म ही नहीं लिया था. लिहाज़ा ये समझना आसान है कि त्रेतायुग और उस युग में किसी राम के होने की कहानी कपोल कल्पना मात्र है.

हम भारतीयों के साथ दिक्कत ये है कि हम वैज्ञानिक समझ के अभाव और इतिहासबोध की दरिद्रता के कारण कथा-कहानियों और उससे संबंधित काल्पनिक इतिहास और भूगोल पर आंख मूंदकर यकीन कर लेते हैं. उदाहरण के लिए रामायण जैसे महाकाव्य की सामान्य कहानी को कहानी की तरह लेने की बजाय उसे सच मानने लगते हैं और कई बार इसे लेकर हिंसक भी हो जाते हैं. सिर्फ इसलिए क्योंकि यह किताब और इसकी कहानी कथित हिन्दू धर्म का हिस्सा है और हम संयोग से इस कथित धर्म में पैदा हो गए हैं.

आइए आज रामायण के काल्पनिक भूगोल की पड़ताल करते हैं कि इसमें कितनी सच्चाई है और कितना झूठ है.
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काल्पनिक भूगोल वह अवधारणा जिसके तहत हम किसी गल्प अथवा कपोल कल्पित कथा के अनुसार स्थान, समय और व्यक्ति के वास्तव में होने का निर्धारण करते हैं. उदाहरण के लिए बनारस में काफी समय से रामलीला का मंचन होता है तो वहां उससे संबंधित रामनगर भी है और लंका भी. इतना ही नहीं वहां रामश्वेरम से समुद्र लांघने का अभिनय एक छोटे से तालाब को समुद्र मानकर किया जाता है. अब कुछ भी हो हम उस तालाब को समुद्र तो नहीं मान सकते हैं. न ही रामनगर के किसी टीले को संजीवनी बूटी वाला पहाड़ मान सकते हैं.

अयोध्या जिसे पूर्व में साकेत के नाम से जाना जाता था
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साकेत का नाम अयोध्या गुप्तकाल में पड़ा. इससे पहले भारत में कहीं भी कोई भी अयोध्या नहीं थी. क्योंकि गुप्त शासकों ने राम की कथा के बारे में सुन रखा था और वो उससे खासे प्रभावित थे ( खासकर स्कन्दगुप्त जो खुद को राम समान मानता था ) इसलिए उन्होंने राम से जुड़े काल्पनिक भूगोल की रचना की और साकेत को अयोध्या के रूप में चिन्हित किया. ऐसा करने वाले शासक का नाम ‘विक्रमादित्य‘ था. यह एक प्रामाणिक तथ्य है. लेकिन इतिहासकार अभी इस बात पर निश्चित नहीं हैं कि यह ‘विक्रमादित्य‘ वास्तव में कौन सा गुप्त शासक था. जो थोड़े बहुत उपलब्ध साक्ष्य हैं उनके आधार पर विक्रमादित्य की पहचान स्कन्दगुप्त के रूप में की जाती है. लेकिन यह भी पूरी तरह मान्य नहीं है. स्कन्दगुप्त से दो पुस्त पहले गुजर चुके चंद्रगुप्त द्वितीय के समय में रचित कालिदास की रचनाओं में साकेत के लिए अयोध्या का प्रयोग शुरू हो चुका था. मतलब ये कि साकेत को अयोध्या कहने वाला विक्रमादित्य चंद्रगुप्त गुप्त द्वितीय था. स्कन्दगुप्त के समय में यह तय हो चुका था कि साकेत को अयोध्या के रूप में बसाया जाएगा.

रामायण की कथा सुनने के बाद विक्रमादित्य के पास अयोध्या का काल्पनिक भूगोल रचने के लिए सबसे अहम सबूत था – पवित्र नदी सरयू की धारा और उसके किनारे महादेव को समर्पित मंदिर जिसे नागेश्वरनाथ के नाम से जाना जाता था. यहां शिव को समर्पित मंदिर ध्यान देने योग्य बात है. इसमें विष्णु की भक्ति, राम की परंपरा और उनसे संबंधित स्थानों का कोई उल्लेख नहीं है. लेकिन विक्रमादित्य को काल्पनिक भूगोल रचने का चस्का था इसीलिए उसके समेत बाद के विष्णु भक्त गुप्त शासकों ने साकेत को अपनी राजधानी बनाया और वहां राम, लक्ष्मण, सीता समेत अनेक हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिर बनवाये.

गौरतलब है कि गुप्तों के हस्तक्षेप के पहले साकेत को लंबे समय तक कोई पूछने वाला नहीं था. यहां शिव के मंदिर के अतरिक्त बौद्ध मठ थे जिन्हें गिरवाकर गुप्त शासकों ने राम, सीता, लक्ष्मण आदि के मंदिर बनवाये. 1860 के दशक में कार्नेगी ने बाबरी मस्जिद के आसपास पहले की इमारत के अच्छी तरह सुरक्षित स्तंभों के बारे में लिखा है – ”ये मज़बूत, ठोस प्रकृति के गहरे, स्लेटी या काले रंग के पत्थर हैं जिन्हें स्थानीय लोग कसौटी कहते हैं और जिनके ऊपर विभिन्न चिन्हों की नक्काशी हुई है. यह उन बौद्ध स्तंभों में मिलते हैं जिन्हें मैंने बनारस और दूसरे स्थानों पर देखा है. ”कार्नेगी के अतरिक्त वहां बौद्ध मठो के प्रमाण आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया द्वारा 1862-63 में दिया जा चुका है. इसके अलावा 1969-70 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के एके नारायण को भी उत्खनन में बुद्धिस्ट प्रमाण मिल चुके हैं.

वास्तव में विक्रमादित्य ने तुक्के से एक काल्पनिक भूगोल की रचना की तथा साकेत को अयोध्या का नाम दिया. यदि विक्रमादित्य का तुक्का आज़मगढ़, बहराइच, दोहरीघाट, बलिया, आरा या छपरा पर लगा होता तो आज इनमें से किसी को अयोध्या माना जाता और वहीं कहीं काल्पनिक राम की जन्मस्थली भी खोज ली जाती.

अभी कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के विनीत कुमार मौर्य के इस दावे को कि वहां मंदिर से सैकड़ों साल पहले बौद्धिस्ट मठ आदि थे, सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है. सुनवाई के बाद इस पर से पर्दे हटाना शुरू हो जाएंगे. उसके पहले आपको यह समझ लेना चाहिए कि काल्पनिक भूगोल को समझना कोई राकेट साइन्स नहीं है. इसके लिए सिर्फ वैज्ञानिक-तार्किक सोच साथ रखने और नाज़ुक धार्मिक भावना को परे रखने की जरूरत है.

मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में निष्पक्षता के साथ न्याय करेगा.
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सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री रामदास आठवले ने उज्जैन यात्रा के दौरान एक बयान में कहा था कि अयोध्या में जिस जमीन को लेकर झगड़ा हो रहा है असल में वह बौद्धों की है, जहां बौद्ध धर्म से जुड़े कला और शिल्प मिले हैं।

1981-1982 ईस्वीं में अयोध्या के सीमित क्षेत्र में एक उत्खनन किया गया था। यह उत्खनन मुख्यत: हनुमानगढ़ी और लक्ष्मणघाट क्षेत्रों में हुआ था जहां से बुद्ध के समय के कलात्मक पात्र मिले थे। माना जाता है कि यहां बौद्ध स्तूप था।यह बौद्ध स्तूप या विहार कभी भी राम जन्मभूमि पर नहीं रहा। अयोध्या के आसपास एक नहीं लगभग 20 बौद्ध विहार होने का उल्लेख मिलता है।

ऐसा कहते हैं कि भगवान बुद्ध की प्रमुख उपासिका विशाखा ने बुद्ध के सानिध्य में अयोध्या में धम्म की दीक्षा ली थी। इसी के स्मृतिस्वरूप में विशाखा ने अयोध्या में मणि पर्वत के समीप बौद्ध विहार की स्थापना करवाई थी। यह भी कहते हैं कि बुद्ध के माहापरिनिर्वाण के बाद इसी विहार में बुद्ध के दांत रखे गए थे।

वर्तमान में राजनीतिक के चलते यह भी दावा किया कहा जाता है कि यहां पर कौशल नरेश प्रसेनजित ने बौद्ध भिक्षु बावरी की याद में यहां बावरी बौद्ध विहार बनवाया था। इस विहार को पुष्यमित्र शुंग ने ध्वस्त कर दिया था। बाद में इस स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराया गया।

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दरअसल, यहां पर सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आया था। उसके अनुसार यहां 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे और यहां हिंदुओं का एक प्रमुख और भव्य मंदिर था। मललसेकर, डिक्शनरी ऑफ पालि प्रापर नेम्स, भाग 1, पृष्ठ 165 के अनुसार अयोध्यावासी हिंदू गौतम बुद्ध के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उन्होंने उनके निवास के लिए वहां पर एक विहार का निर्माण भी करवाया था। संयुक्तनिकाय में उल्लेख आया है कि बुद्ध ने यहां की यात्रा दो बार की थी। इस सूक्त में भगवान बुद्ध को गंगा नदी के तट पर विहार करते हुए बताया गया है। इसी निकाय की अट्ठकथा में कहा गया है कि यहां के निवासियों ने गंगा के तट पर एक विहार बनवाकर किसी प्रमुख भिक्षु संघ को दान कर दिया था। वर्तमान अयोध्या गंगा नदी के तट पर स्थित नहीं है।

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बाल्मीकि रामायण में अयोध्या का उल्लेख कोशल जनपद की राजधानी के रूप में किया गया है। पुराणों में इस नगर के संबंध में कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता है, परन्तु इस नगर के शासकों की वंशावलियाँ अवश्य मिलती हैं, जो इस नगर की प्राचीनता एवं महत्त्व के प्रामाणिकसाक्ष्य हैं। ब्राह्मण साहित्य में इसका वर्णन एक ग्राम के रूप में किया गया है। ऐसा वर्णन मिलता है कि सूत और मागध उस नगरी में बहुत थे। अयोध्या बहुत ही सुन्दर नगरी थी। अयोध्या में ऊँची अटारियों पर ध्वजाएँ शोभायमान थीं और सैकड़ों शतघ्नियाँ उसकी रक्षा के लिए लगी हुई थीं।

राम के समय यह नगर अवध नाम की राजधानी से सुशोभित था। अभी उपलब्ध बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अयोध्या पूर्ववती तथा साकेत परवर्ती राजधानी थी। भारतवर्ष के पवित्र स्थानों में इसका नाम मिलता है। प्रख्यात चीनी यात्री फ़ाह्यान ने इसका ‘शा-चें’ नाम से उल्लेख किया है,जो कन्नौज से 13 योजन दक्षिण-पूर्व में स्थित था।

एक इतिहासकार मललसेकर ने पालि-परंपरा के साकेत को सई नदी के किनारे उन्नाव ज़िले में स्थित सुजानकोट के खंडहरों से समीकृत किया है। नालियाक्ष दत्त एवं कृष्णदत्त बाजपेयी ने भी इसका समीकरण सुजानकोट से किया है। थेरगाथा अट्ठकथा में साकेत को सरयू नदी केकिनारे बताया गया है। अत: संभव है कि पालि का साकेत, आधुनिक अयोध्या ही हो।

अयोध्या के प्राचीन अभिलेख
शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र (द्वितीय शती ई. पू.) का एक शिलालेख अयोध्या से प्राप्त हुआ था जिसमें उसे सेनापति कहा गया है तथा उसके द्वारा दो अश्वमेध यज्ञों के लिए जाने का वर्णन है। अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुप्तवंशीय चंद्रगुप्त द्वितीय के समय (चतुर्थशती ई. का मध्यकाल) और तत्पश्चात काफ़ी समय तक अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। गुप्तकालीन महाकवि कालिदासने अयोध्या का रघु वंश में कई बार उल्लेख किया है। कालिदास ने उत्तरकौशल की राजधानी साकेत और अयोध्या दोनों ही का नामोल्लेख किया है,इससे जान पड़ता है कि कालिदास के समय में दोनों ही नाम प्रचलित रहे होंगे। मध्यकाल में अयोध्या का नाम अधिक सुनने में नहीं आता था। युवानच्वांग के वर्णनों से ज्ञात होता है कि उत्तर बुद्धकाल में अयोध्या का महत्त्व घट चुका था।

काव्य साहित्य में अयोध्या
अयोध्या का उल्लेख महाकाव्यों में विस्तार से मिलता है। रामायण के अनुसार यह नगर सरयू नदी के तट पर बसा हुआ था तथा कोशल राज्य का सर्वप्रमुख नगर था।

अयोध्या को देखने से ऐसा प्रतीत होता था कि मानों मनु ने स्वयं अपने हाथों के द्वारा अयोध्या का निर्माण किया हो।

अयोध्या नगर 12 योजन लम्बाई में और 3 योजन चौड़ाई में फैला हुआ था, जिसकी पुष्टि वाल्मीकि रामायण में भी होती है।

एक परवर्ती जैन लेखक हेमचन्द्र ने नगर का क्षेत्रफल 12×9 योजन बतलाया है जो कि निश्चित ही अतिरंजित वर्णन है।

साक्ष्यों के अवलोकन से नगर के विस्तार के लिए कनिंघम का मत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लगता है। उनकी मान्यता है कि नगर की परिधि 12 कोश (24 मील) थी, जो वर्तमान नगर की परिधि के अनुरूप है।

अयध्या हिन्दुओं और जैनियों का एक पवित्र तीर्थस्थलहै और इसका उल्लेख सप्तपुरियों में सर्वप्रथम किया जाताहै। पुराणों के अनुसार इन सात पुरियों या तीर्थों को मोक्षदायक कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवरण इस

प्रकार है-

‘काशी कांची चमायाख्यातवयोध्याद्वारवतयपि,

मथुराऽवन्तिका चैताः सप्तपुर्योऽत्र मोक्षदाः’;

‘अयोध्या-मथुरामायाकाशीकांचीत्वन्तिका,

पुरी द्वारावतीचैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।‘

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मैं बाबरी मस्जिद बोल रही हूँ : मेरी आवाज़ सुनो?
मोहम्मद जाहिद
मैं बाबरी मस्जिद हूं। जिसे आज ही के दिन 6 दिसंबर 1992 को शहीद कर दिया गया था। आज की मेरी शहादत के लिए ही सन् 1949 से मेरे खिलाफ़ जो साजिशें की गईं। उसको इतिहास और भारत सरकार के अभिलेखों में दर्ज मुकदमों, एफआईआर और सरकार के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के बयानों की रोशनी में देखा जाए तो मुझे शहीद करने के पहले की हुई साजिशों को समझा जा सकता है।

मुझे इस देश के मुगल बादशाह बाबर के कार्यकाल सन् 1528 में बनाया गया था। तब न तो आज की यह अयोध्या थी और न कहीं राम और दशरथ की मान्यता थी।
मेरे वजूद के 40 साल बाद बाबर के ही पोते अकबर के कार्यकाल में गोस्वामी तुलसीदास के लिखे ‘राम चरित मानस’ के बाद आज की अयोध्या का जन्म होता है, जहां मुझ से दो किलोमीटर दूर पर महाराजा दशरथ का पूरा राजभवन ‘जानकी महल’ मेरी आखों के सामने बनाया गया।

अयोध्या के पश्चिमी छोर पर रामकोट मंदिर बनाया और यह अयोध्या में पूजा का प्रमुख स्थान बना। यह सभी को पता है कि रामकोट मंदिर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यहीं पर रामचंद्र जी का जन्म हुआ। यह अयोध्या ही नहीं, अयोध्या आने वाला बच्चा-बच्चा जानता है।

राम और सीता का निज भवन, जिसे “कनक भवन” के नाम से जाना जाता है उसका निर्माण भी मेरी आँखों के सामने हुआ और ऐसा विश्वास है कि रामचंद्र जी और सीता यहीं रहते थे।

इसी अयोध्या में मेरी आँखों के सामने हनुमानगढ़ी मन्दिर का निर्माण हुआ जिसमें विराजमान हनुमान जी को वर्तमान अयोध्या का राजा माना जाता है। मेरी आँखों के सामने ही राघव जी मंदिर बनाया गया। आज भी इस विश्वास के साथ उस मंदिर में पूजा होती है कि सरयू में स्नान के बाद रामचंद्र जी उसी जगह एकांत में विश्राम करते थे।

अयोध्या में मेरी आँखो के सामने ही सीता रसोई और वे तमाम भवन बनाए गए। आज भी राजा दशरथ उनकी तीनों रानियों के कक्ष और दूसरे सभी महत्वपूर्ण स्थान उपस्थित हैं जिसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘राम चरित मानस’ में किया है।

मैं इन सभी महत्वपूर्ण धार्मिक इमारतों से दो किमी दूर हूं और अपने वजूद से 1885 तक अर्थात 350 वर्षों तक चुपचाप शांति से निर्विवाद अयोध्या को बदलते हुए देखती रही हूं।

दरअसल, यह अयोध्या भी मेरे वजूद के समय अयोध्या न होकर बुद्धकाल से ही ‘साकेत’ नाम की नगरी थी जिसका नाम परिवर्तित करके अयोध्या किया गया। गोस्वामी तुलसीदास की ‘राम चरित मानस’ की परिकल्पना का वास्तविक चित्रण किया गया।

मुझे लेकर विवाद की शुरुआत 1885 से होती है। और तब से ही 6 दिसम्बर 1992 और आज तक यानि की 6 दिसंबर 2016 तक की महत्वपूर्ण घटनाएं, जो सरकारी अभिलेख के अनुसार दर्ज है वह सुनाती हूं।

मुझे विवादित बनाने की गहराई में जाए तो पता चलता है कि मुझको लेकर यह झगड़ा आज का नहीं है बल्कि 1885 से चला आ रहा है। कुछ अतिवादी हिंदू संगठन के दस्तावेजों पर नजर डाली जाए तो उससे पता चलता है कि बाबर ने मंदिर तोड़ कर (श्रीराम जन्म भूमि पर बना मन्दिर तोड़कर) मुझे बनवाया। लेकिन इतिहास और अदालत के अभिलेख कुछ और ही कहते हैं। अभिलेखों के मुताबिक बाबर कभी अयोध्या आया ही नहीं।


अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया था। उसमें कहा गया था कि जन्म स्थान एक चबूतरा है जो मस्जिद से अलग उसके सामने है जिसकी लंबाई पूर्व-पश्चिम इक्कीस फिट और चौड़ाई उत्तरदक्षिण सत्रह फीट है। इस चबूतरे की महंत स्वयं और हिंदू इसकी पूजा करते हैं। इस दावे में यह भी कहा गया था कि यह चबूतरा चारों ओर से खुला है। सर्दी-गर्मी और बरसात में पूजा करने वालों को कठिनाई होती है। इस लिए इस पर मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। सरकार ने मंदिर बनाने से रोक दिया है इसलिए न्यायालय सरकार को आदेश दे कि मंदिर बनाने दे।

सरकारी अभिलेखों और अदालती कार्यवाही में दर्ज है कि 24 दिसंबर 1885 को फैजाबाद के सब जज पं. हरिकृष्ण ने महंत रघुवीरदास की अपील यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि बाबरी मस्जिद के सामने मंदिर बनाने की इजाजत देने से हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े और खून खराबे की बुनियाद पड़ जाएगी।
फैसले में यह भी कहा गया था कि मंदिर मस्जिद के बीच एक दीवार है जो दोनों पूजा स्थलों को एक-दूसरे से अलग साबित करती है। मंदिर और मस्जिद के बीच की यह दीवार 1857 से पहले बनाई गई थी। फैजाबाद के सब जज हरिकृष्ण के फैसले के खिलाफ ‘राम जन्म स्थान’ के महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल जे आर्य के यहां अपील की। इसके मुआयना करने के बाद 16 मार्च 1886 को उस अपील को खारिज दिया गया।
जिला जज के इस फैसले के खिलाफ महंत रघुवीर दास ने ज्यूड्शिनल कमिश्नर, जिसके पास पूरे अवध के लिए हाईकोर्ट के समान अधिकार थे, ने भी अपने फैसले के जरिए इस अपील को एक नवंबर 1886 को खारिज कर दिया। पूरे प्रकरण की कापी कोई भी अदालतों से प्राप्त कर सकता है।

इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद में नमाज अदा की जाती रही। राम जन्म स्थान चबूतरों पर हिन्दू पूजा अर्चना करते रहे। हिंदू-मुस्लिम के बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। साल 1934 में गो-वध को लेकर अयोध्या में एक दंगा हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद की एक दीवार को छति पहुंची। जिसे सरकार ने अपने खर्चे से बनवा दिया।
देश को आज़ादी 1947 को मिली और अंग्रेजी हुकूमत की दहशत कट्टरपंथी हिन्दू अतिवादी संगठनों के हृदय से भी दूर हुई। और यहीं से मेरे खिलाफ साजिशें शुरू हुईं, जो अंग्रेजों की हुकूमत में सम्भव नहीं था।

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साल 1949 की बात है। आजाद भारत की उम्र कुल मिलाकर दो साल ही हुई थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अभी भी भारत के विचार को साकार करने में लगे हुए थे और उनके सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल देश की सीमाओं को परिभाषित कर रहे थें। 1949 में देश भले ही आजाद हो गया था लेकिन विभाजित भारत के लोग अभी भी विभाजन की त्रासदी में तार-तार हुए सामाजिक ताने-बाने के चीथड़ो को समेटने की कोशिश कर रहे थे।
इन्हीं सबके बीच भारत में ज़हर फैलाने की ज़मीन तैयार की जा रही थी और उसके लिए चुना गया उत्तर प्रदेश की अयोध्या को, जहां बहुसंख्यकों के श्रद्येय भगवान पुरुषोत्तम राम का कभी शासन चलता था और जिसे लेकर सनातन धर्म के लोगों में जबरदस्त धार्मिक भावना रही है। उसी धार्मिक भावना का राजनैतिक दोहन करने के लिए 22 दिसंबर 1949 की रात को अयोध्या घेरने की तैयारी कर ली गई।

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मैं बाबरी मस्जिद बोल रही हूँ
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जैसा कि कहानी गढ़ी गई कि सुबह करीब 3 बजे अचानक से बिजली चमकी और श्रीराम बाबरी मस्जिद में प्रकट हो गए। चमत्कार मानकर विश्वास कर लिया गया।
यह वाक्या ‘राम जन्मभूमि को आजाद करवाने’ की दिशा ? या संघियों में हिंदुओं के भारत में ज़हर फैलाने की योजना में एक महत्वपूर्ण दाव साबित हुआ। दावा किया जाता है कि बाबरी मस्जिद को बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने साल 1528 ई. में श्रीराम जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर बनवाया था।
लेकिन इस वाकए से जुड़ी एक ज्यादा जमीनी व्याख्या 23, दिसंबर 1949 को दर्ज हुई एफआईआर में है। इस घटना की सूचना संबंधित थाने के कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी। उसमें अयोध्या के पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंचार्ज ने मुख्य रूप से तीन लोगों को नामजद किया था- अभिराम दास, राम शकल दास और सुदर्शन दास। इसके अलावा 50 से 60 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी दंगा भड़काने, अतिक्रमण करने और एक धर्मस्थल को अपवित्र करने का मामला दर्ज किया गया था।
इस एफआईआर का क्या हुआ आज तक किसी को पता नहीं। दरअसल ये वही लोग थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद में घुसकर विवाद को जन्म दिया।
उसके पहले श्रीराम जी के जन्मस्थान की चौहद्दी अलग-अलग स्थानों की बताई जाती रही। उसमें एक चौहद्दी ‘रामकोट’ की भी है। खुद देखिए उस एफआईआर की भाषा जो सरकारी अभिलेखों में दर्ज हुई। ध्यान रखियेगा कि यह अभिलेख स्वतंत्र भारत के सरकारी अभिलेख में दर्ज एक एफआईआर है, न कि मुगल औरंगजेब के शासन काल के अभिलेख में दर्ज कोई फरमान।

50 से 60 लोगों का एक समूह बाबरी मस्जिद परिसर के ताले को तोड़कर, दीवारों और सीढ़ियों को फांदकर अंदर घुस आए और श्रीराम की प्रतिमा स्थापित कर दी। साथ ही उन्होंने पीले और केसरिया रंग में सीता और रामजी आदि की तस्वीरें मस्जिद के भीतरी और बाहरी दीवारों पर बना दी। मस्जिद में घुसपैठ करनेवालों ने मस्जिद को नापाक किया।

इस घटना के कुछ समय बाद ही एक 6 फीट लंबे तुनकमिजाज साधु अभिराम दास को ‘उद्धारक बाबा’ के नाम से पुकारा जाने लगा। लेकिन क्या एक मस्जिद को मंदिर में बदलने का ये पुख्ता ब्राह्मणवादी प्लान बिना स्थानीय प्रशासक की मदद के बन पाना संभव था?
उस समय गुरुदत्त सिंह फैजाबाद के सिटी मैजिस्ट्रेट थे। उनके बारे में यह मशहूर था कि उन्होंने अपने ब्रिटिश आकाओं को खुश करने की खातिर अपने तौर-तरीके कभी नहीं छोड़े थे। उनके पोते शक्ति सिंह, जो कि फैजाबाद में बीजेपी के नेता हैं, ने एक पत्रिका ‘दी क्विंट’ को बयान दिया था कि उनके दादा गुरुदत्त ‘पक्के हिंदूवादी’ थे। गुरुदत्त सिंह शाकाहारी थे। कोई नशा नहीं करते थे और अपने कॉलेज के दिनों से ही रामभक्त थे।
उसी पत्रिका ‘दी क्विंट’ का एक दावा देखिए- गुरुदत्त सिंह के 86 वर्षीय बेटे गुरू बसंत सिंह पहले तो हमसे बात करने में हिचके लेकिन थोड़ी देर बाद उन्होंने उन खुफिया बैठकों के बारे में बताया जो उनके घर ‘राम भवन’ में हुआ करते थे। उस समय बसंत सिंह सिर्फ 15 साल के थें और मेहमानों को नाश्ता-पानी देने के लिए उन बैठकों में आते-जाते रहते थे। इन बैठकों में उनके पिता के अलावा जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर, पुलिस अधीक्षक कृपाल सिंह और जिला जज ठाकुर बीर सिंह शामिल थे।

शहर के चार बड़े अधिकारी बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्ति स्थापित करने की जिद पर थे। कौन करता इनका विरोध और उससे क्या हो जाता। उनकी गतिविधियों से लगता था कि वो सतर्क अधिकारी थे। लेकिन असल में वो भक्तों को छूट देते थे ताकि वो मस्जिद में घुस सकें और पूजा-पाठ कर सकें”-गुरू बसंत सिंह
लेकिन जो कुछ भी इन अधिकारियों ने किया उसे कबूल लेने की बजाय उन्होंने ‘चमत्कार’ की कहानी क्यों गढ़ी? पत्रिका के इस सवाल का जवाब गुरू बसंत सिंह के पास था। उन्होंने बताया कि इस घटना से आम लोगों को जोड़ने के लिए ऐसा किया गया। मस्जिद में स्वयं रामलला के प्रकट होने के दावे से बेहतर युक्ति क्या हो सकती थी।
गुरुदत्त सिंह के सीनियर और फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर एक मृदुभाषी मलयाली थे। कहा जाता है कि उनका झुकाव हिंदू महासभा की तरफ था, जो कि भारत की सबसे पुरानी हिंदूवादी राष्ट्रवादी पार्टी थी। जिस दिन बाबरी मस्जिद में घुसपैठ हुई, उस दिन के.के. नायर छुट्टी पर थे। लेकिन वो फैजाबाद छोड़कर नहीं गए।
इस योजना में के.के. नायर की मिली-भगत की इस बात से भी साबित होती है कि वो घटनास्थल पर सुबह चार बजे ही पहुंच गए थे, लेकिन उन्होंने लखनऊ में अपने वरिष्ठों को इस घटना की सूचना सुबह 10:30 बजे तक नहीं दी।

“बाबरी मस्जिद में हिंदू धर्म के कुछ लोग रात के अंधेरे में घुस आए और वहां भगवान रामलला की स्थापना की। जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक और पुलिस के जवान मौके पर पहुंच चुके हैं। स्थिति नियंत्रण में है। पुलिस पिकेट के 15 जवान, जो रात को ड्यूटी पर थे। उन्होने भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।” -संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लभ पंत को के.के. नायर का रेडियो संदेश
सुबह 4 बजे बाबरी मस्जिद पहुंच चुके नायर ने अगले पांच घंटे तक ना तो मस्जिद खाली कराने की कोशिश की और ना ही मूर्ति को हटाया। नायर बाद में जनसंघ में शामिल हो गए और चुनाव जीतकर सांसद भी बने।

प्रधानमंत्री नेहरू क्या कर रहे थे ? 26 दिसंबर, 1949 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत को टेलिग्राम भेजकर अपनी नाराजगी जाहिर की। लिखा कि वहां एक बुरा उदाहरण स्थापित किया जा रहा है जिसके भयानक परिणाम होंगे। इसके बाद 5 फरवरी, 1950 को उन्होंने पंत को एक और चिट्ठी लिखी और उनसे पूछा कि क्या उन्हें अयोध्या आना चाहिए? प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की यह यात्रा कभी नहीं हो पाई।

बाबरी मस्जिद के अंदर मूर्तियों की स्थापना के 66 साल बाद आज भी इस बात पर बहस जारी है कि 22 दिसंबर, 1949 को हुई यह घटना एक सुनियोजित साजिश थी जिसमें राष्ट्र में ज़हर फैलाने की योजना बनाने वाले नेता शामिल थे। पर जमीनी स्तर पर, इसे स्थानीय प्रशासन और मीडिया ने इसे एक स्थानीय सांप्रदायिक घटना के रूप में प्रस्तुत किया। 22 दिसंबर, 1949 को घटी इस घटना ने अंग्रेजों द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था को भी खत्म कर दिया जिसके अंतर्गत हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए मस्जिद के अंदर पूजा और नमाज पढ़ने की व्यवस्था की गई थी।

बाबरी मस्जिद परिसर, कानून की धारा 145 के तहत सभी के लिए बंद कर दिया गया। इससे जुड़े सिविल मामलों की सुनवाई में अदालत ने मूर्तियां हटाए जाने या पूजापाठ में किसी तरह की रुकावट पर रोक लगा दी। एक फरवरी 1986 को फैजाबाद के मजिस्ट्रेट एम. के. पांडे ने मस्जिद के ताले को खोलने का आदेश पारित कर दिया। छह दिसंबर 1992 तक मस्जिद के दरवाजे बंद रखे गए और अंदर आने की इजाजत सिर्फ उन पुजारियों को दी गईं जो रामलला की देखभाल और पूजापाठ करते थे।
वीएचपी, बीजेपी और कांग्रेस ने चार दशक बाद इस मामले को इस तरह उठाया जिसकी पहले कभी कल्पना नहीं की गई थी। बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा शुरू की, जो एक जन आंदोलन बन गया। मुलायम सिंह यादव ने मेरे सामने मेरे अपने भाईयों पर गोलियाँ चलवाईं और राजनैतिक फसल काटी। मुझे लेकर वह नफरत पैदा की गई जिसका अंत 6 दिसंबर, 1992 के दिन मेरी शहादत के साथ हुआ।

मुझे फिर से बनाने के लिए संसद में देश के प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी। यह भारत के इतिहास का ऐसी झूठी घोषणा थी जो संसद में बोली गई और फिर साज़िशों के कारण की गई घोषणा साबित हुई।
भारत की संसद में प्रधानमंत्री द्वारा बोला गया यह झूठा ऐलान हिन्दुस्तान की एक तारीख बनेगा जो साजिश के तहत बोला गया। ऐसी ही साजिश हुई इलाहाबाद उच्चन्यायालय में जब मेरी ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर चल रहे मुकदमें के फैसले में काग़जात और सबूत के आधार पर फैसला न करके आस्था के आधार पर मेरी ज़मीन को तीन टुकड़ों में बांट कर एक छोटा-सा टुकड़ा मुझे दे दिया गया।
सवाल यह है कि अगर वह ज़मीन जहां मैं खड़ी थी वहां श्रीराम जी पैदा हुए थे यह साबित किया गया तो वह छोटा-सा मेरी ही ज़मीन का टुकड़ा मुझे क्यों दिया गया?
मालिकाना हक के मुकदमे के फैसले में ज़मीन का मालिक एक पक्ष को ही अदालत घोषित करती है न कि बटवारा करती है। मैं बाबरी मस्जिद हमेशा साजिश की शिकार हुई और वैसी ही साजिश फिर होती दिख रही है जब अयोध्या में टनो-टन पत्थर क्रेन से उतारे जा रहे है।

मैं बाबरी मस्जिद गवाही देती हूं उनके साजिशों की जो देश को तोड़ने में लगे हैं। हिन्दुस्तान वालों मैं शहीद हो चुकी वह इमारत हूं जिसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता पर इस भारत की सीमाओं को शहीद करने से बचा लो!
यह संघी इस देश के दुश्मन हैं। साजिशदां हैं। नफरत और खूनखराबे के पुजारी हैं। इन्हें श्रीराम से क्या मतलब। श्रीराम को तो मैंने 450 साल करीब से देखा है। इसी अयोध्या में जो इन जैसों से विपरीत हैं। गोस्वामी तुलसीदास को देखा है जो इनके जैसे ज़हरीले नहीं थे। बल्कि प्रेम और गरिमा के सौन्दर्य में लिपटे राम के पुजारी थे। संभल जाओ ऐ हिन्दुस्तान वालों! कहीं ऐसा न हो ये संघी इस हिन्दुस्तान का हश्र मुझ जैसा कर दें।
आज के दौर के मुसलमानों से अपील है कि वह हर मस्जिदों को आबाद करें। नहीं तो ये देश में ज़हर फैलाने वाले हर एक को मेरे जैसे अंजाम तक पहुंचा सकते हैं। इनके झूठ इनके फरेब इनकी मक्कारी की मैं भुग्तभोगी हूं।
मैं इस देश के बहुसंख्यक आतंकवाद की भुक्तभोगी हूँ , मैं इस देश के बहुसंख्यकों , प्रशासन , न्याय और विधायिका के मिलीभगत के धोखे की भुक्तभोगी हूँ , मैं बाबरी मस्जिद हूँ , मैं बाबरी मस्जिद बोल रही हूँ।