धार्मिक नहीं सामाजिक सन्त थे भय्यू महाराज

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Parvez Iqbal

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आज दोपहर में अपने केबिन में बैठा था तभी मेरे सहयोगी पांडेय जी ने आकर सूचना दी कि-‘भय्यू महाराज ने खुदको गोली मार कर आत्महत्या कर ली है’ मुझे यकीन नहीं हुआ,होता भी कैसे,जो शख्स अशांत,दुखी लोगों को निराशा के दलदल से निकाल कर जीने की राह दिखाता हो,जिसके सुदर्शन मुख पर हमेशा प्यारी सी मोहक मुस्कान क़ायम रहती हो वो खुद इतने नैराश्य में डूब जाएगा ऐसा कोई सोच भी कैसे सकता था..बहरहाल खबर सच्ची थी…थोड़ी ही देर में सोश्यल मीडिया पर भय्यू महाराज के शव की तस्वीरें वायरल होने लगीं…मेरी आंखों के सामने सहसा कुछ दिन पहले ही भय्यू महाराज से हुई मुलाकात और उनके साथ किये रात्री-भोज का मंजर घूम गया..इंदौर में लंबे समय से पत्रकारिता जीवन से जुड़ा होने के बावजूद मेरा कभी भय्यू महाराज से सीधा परिचय या मुलाकात नहीं हुई…5-7 साल पहले मेरे एक पत्रकार साथी ने मुझे भय्यू महाराज की पत्रिका”धर्मादित्य” की सम्पादकीय टीम का हिस्सा बनने का प्रस्ताव दिया था उस वक़्त में एक दैनिक में बतौर सम्पादक अपनी सेवाएं दे रहा था लिहाज़ा उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर पाया था…उसके बाद भय्यू महाराज से मेरा वास्ता उनसे सम्बंधित खबरों तक ही सीमित रहा…लेकिन हाल ही मैं इंदौर में सम्पन्न हुए ‘रिलीजन इन्क्लेव’ में भय्यू महाराज को देखने/सुनने का मौका मिला…आयोजकों से नजदीकी के चलते कार्यक्रम में देश भर से पधारे कई बुद्धिजीवियों जामिया इस्लामिया इशातुल उलूम के डायरेक्टर मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानी,प्रसिद्ध इस्लामी स्कॉलर अल्लामा सैयद अब्दुल्लाह तारिक़,अहिंसा विश्व भारती के लोकेश मुनि जी,गुरुद्वारा अमृतसर के श्री हरबन सिंह जी अलवर वाले,परमहंस दाती जी महाराज,बोहरा धर्मगुरु डॉ. अब्दे अली सैफुद्दीन,अजमेर दरगाह के गद्दीनशीं हाजी सैयद सलमान चिश्ती,प्रो.अख्तरुल वासे,अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के डीन सैयद मोहम्मद अली नक़वी,महंत प्रज्ञा भारती और ब्रह्मकुमारी उर्मिला देवी जैसे अनेकों धर्मगुरु/विद्वानों के साथ मुझे भी भय्यू महाराज के साथ रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया गया..भोज के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्ना हजारे जैसे लोगों को जूस पिलाने वाले हाथों से जब भय्यू महाराज ने मेहमानों के सामने थाली सजाई और अपने हाथों से परोसगारी शुरू की तो उनकी सादगी और मिलनसारिता ने यकीनन उन सभी के दिल मे जगह बनाई होगी जो मेरी तरह पहली बार उनका ये व्यवहार देख रहे होंगे..हो भी कियूं न जिस सन्त के अनुयायियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,Rss प्रमुख भागवत,लता मंगेशकर, उद्धव ठाकरे,राज ठाकरे सहित कई हस्तियां शामिल हो वो इतने सरल सहज रूप से अपने हाथों से मेहमानों को खाना परोस रहा हो और फिर मेहमानों के इसरार पर हम मेहमानों के बीच ही बैठ कर खुद भी भोजन करने लगे उसकी सरलता पर किसे शक हो सकता है..औरों की तरह मेरी सोच में भी सन्त यानी कट्टर धार्मिक विचारधारा वाली छबि के विपरीत भय्यू महाराज को जब रूबरू सुना तो लगा कि ये शख्स धार्मिक सन्त नहीं बल्कि सामाजिक सन्त थे…उनकी बातों से महसूस ही नहीं हुआ कि “उनका धर्म खतरे में है या कोई अन्य मज़हब खतरे की वजह है” उन्हें धर्म की बजाय इंसानियत पर मंडराते खतरे की ज़्यादा चिंता थी..किसी धार्मिक स्थल के निर्माण से ज़्यादा उन्हें गरीब के लिए मकान/स्कूल/अस्पताल का निर्माण ज़्यादा ज़रूरी लगता था…किसीको धार्मिक पाखण्ड की शिक्षा देने की बजाय वो पर्यावरण/शिक्षा/स्वास्थ्य के लिए कार्य करने का बोलते दिखे….कुल मिला कर मैं भय्यू महाराज को अगर धार्मिक सन्त की बजाय सामाजिक सन्त कहूँ तो ज़्यादा बेहतर होगा…सभी मेहमानों को दावत के बाद आश्रम की पार्किंग तक विनम्रता से विदाई देने वाले भय्यू महाराज से मैं इस कदर प्रभावित था कि उनसे जल्द ही दोबारा मिलने का वादा किया था..लेकिन किसे खबर थी कि वो खिलता मुस्कुराता चेहरा,वो मोहक मुस्कान,वो विन्रमता भरी आंखे मैं फिर कभी नहीं देख पाऊंगा…भय्यू महाराज…आप सचमुच के सन्त थे…ये मेरा दुर्भाग्य है कि एक ही शहर में रह कर भी मैं आपके सानिध्य का लाभ नहीं उठा सका… आपकी कमी इस समाज को हमेशा खलेगी..आपके शिष्यों को,अनुयायियों को,उन अनाथ बच्चों को जिन्हें अपने अपना नाम दिया,उन इलाकों को जहां अपने स्कूल,अस्पताल और तालाब बनवाए…और मुझ जैसे लोगों को भी जो आपके क्रांतिकारी,सामाजिक समरसता से ओत-प्रोत विचारों का लाभ उठाने से वंचित रह गए…आपका जाना सिर्फ राष्ट्र की नहीं बल्कि मानवता की क्षति है…आप निःसन्देह जीवन भर लोगों को ज़िन्दगी की प्रेरणा देते रहे उन्हें दुखों से उबरने के लिए शांति और सब्र का पाठ पढ़ाते रहे लेकिन आप खुद अंत मे अपने हो संघर्ष में पराजित हो गए..जीवन मे क्रांति का सन्देशवाहक खुद ज़िन्दगी की पेचीदगियों में उस कदर उलझ गया कि उसने उन पेचीदगियों से निकलने के लिए उस राह को चुन लिया जो मौत की तरफ जाती है..यकीनन आपका ये कदम हताश और निराशा से भरा है फिर भी मैं यही चाहूंगा कि समाज आपके इस हताश कदम को भूल कर आपकी समाजसेवा,आपके विचार,आपके नेक कार्यों को याद रखे…

®परवेज़ इक़बाल
सम्पादक-
साप्ताहिक ‘इण्डिया-Now’
राष्ट्रीय मासिक ‘जनमत’