नर्म युद्ध और वर्चस्ववाद : लक्ष्य,,,एक मन और दूसरा हृदय

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नर्म युद्ध और वर्चस्ववाद – 1

जैसाकि आप जानते हैं कि आदिकाल से ही मानव जाति जिन बातों से भयभीत रही है उनमें से एक, युद्ध का भय है।

ऐतिहासिक प्रमाण इस बात को सिद्ध करते हैं कि मनुष्य की उत्पत्ति से वर्तमान समय तक कोई भी एसा कालखण्ड नहीं गुज़रा जो युद्ध की विभीषिका से सुरक्षित रह सका हो। समय गुज़रने के साथ ही मानव समाज के लिए युद्ध के ख़तरे तो कम नहीं हुए किंतु इसकी शैलियों में परिवर्तन आता गया। हालिया दशकों में युद्ध की एक नई शैली सामने आई है जिसे नर्म युद्ध या साफ्टवार कहा जाता है। नर्मयुद्ध या साफ्टवार एसा युद्ध है जिसमें मनोवैज्ञानिक और प्रचारिक ढंग से किसी समाज या गुट को लक्ष्य बनाया जाता है। प्रचलित युद्ध शैली की भांति इसमें शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। साफ़्टवार के अन्तर्गत शत्रु, एक सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत अपनी संस्कृति, राजनीति, भावनाओं, व्यवहार, आस्था और अपनी सोच को दृष्टिगत समाज या राष्ट्र में प्रचलित करता है। नर्मयुद्ध को राष्ट्रों के मूल्यों और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे ख़तरनाक, जटिल और प्रभावी युद्ध माना जाता है। इसमें सैनिकों और शस्त्रों के प्रयोग के बिना ही युद्ध किया जाता है और सफलता अर्जित की जाती है।

कहा जाता है कि ब्रिटेन के सैनिक मामलों के टीकाकार एंव इतिहासकार फ़ाउलर ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने नर्मयुद्ध या साफ्टवार के विषय को पेश किया था। सन 1920 में उन्होंने इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध का नाम दिया था। हालांकि उस समय ब्रिटेन तथा अमरीका के सैनिक एवं वैज्ञानिक हल्क़ों में फ़ाउलर की ओर से प्रस्तुत किये जाने वाले मनोवैज्ञानिक युद्ध का कोई विशेष स्वागत नहीं किया गया। सन 1940 में अमरीकी कूटनीति में मनोवैज्ञानिक युद्ध जैसे शब्द का प्रचलन आरंभ हुआ था। उस समय लिखे गए एक लेख का यह शीर्षक था जिसके आधार पर मनोवैज्ञानिक युद्ध को इस प्रकार से परिभाषित किय गया था। मनोवैज्ञानिक युद्ध ऐसा युद्ध है जिसमें विशेष सेन्य लक्ष्य की प्राप्ति के अन्तर्गत सामने वाले पक्ष के मनोबल और व्यवहार को प्रभावित करने के लिए विभिन्न शैलियों को प्रयोग किया जाए।

सन 1950 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति दुमैन ने कोरिया में मनोवैज्ञानिक युद्ध आरंभ करने के उद्देश्य से “वास्वतिक युद्ध” नामक एक परियोजना शुरू की थी। इसके लिए 12 करोड़ 10 लाख अमरीकी डालर का बजट विशेष किया गया था। इस परियोजना के अन्तर्गत द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवों से लाभ उठाते हुए सैन्य टुकड़ियों के साथ ही साथ व्यापक स्तर पर मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए भी यूनिट बनाई गयी थीं।

हालांकि मनोवैज्ञानिक युद्ध जैसी शैली का प्रयोग अमरीका के एक विख्यात टीकाकार “जोज़फ़ नाए” द्वारा लिखे गए लेख के बाद अधिक प्रभावी ढंग से आरंभ हुआ। उन्होंने अपना लेख नर्मयुद्ध के शीर्षक के अन्तर्गत लिखा था। उनका यह लेख सन 1990 में अमरीकी पत्रिका फारेन पालिसी में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने अपने लेख में लिखा था कि संयुक्त राज्य अमरीका को बल प्रयोग करने के स्थान पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए दृष्टिगत देश या राष्ट्र के मेधावियों और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को प्रभावित करना चाहिए। इस लेख में जोज़फ़ ने लिखा था कि कूटनीति और नर्म युद्ध के माध्यम से हमें अपने दृष्टिगत क्षेत्र के मेधावियों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। इसके बाद उनके विचारों को स्मार्ट पॉवर का नाम देकर अमरीकी विदेश नीति में एक लाग्र किया गया।

सन 1991 में पूर्व सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही अमरीका के लिए नर्म युद्ध का महत्व अधिक स्पष्ट हुआ। अमरीकियों को पता चला कि विश्व के अन्य देशों में बिना हस्तक्षेप किये हुए बहुत कम ख़र्च से अपने सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद से अमरीकी, बहुत से दशों में नर्म युद्ध के माध्यम से अपने दृष्टिगत सत्ता परिवर्तित कर चुके हैं।

पूर्वी ब्लाक के कुछ देशों में आने वाली रंगीन क्रांतियां वास्तव में नर्म युद्ध का ही उदाहरण हैं। अमरीका ने नर्मयुद्ध का सहारा लेते हुए पोलैण्ड, जार्जिया, चेकस्लोवाकिया, क़िरक़ीज़िस्तान, यूक्रेन और ताजिकिसतान आदि देशों में सत्ता परिवर्तित की है। इन सभी देशों में बल प्रयोग के स्थान पर नर्मयुद्ध का ही प्रयोग किया गया जिसके माध्यम से वहां की सरकारें बदल दल गईं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद से विश्व की कूटनीति में नर्मयुद्ध या साफ़्टवार शब्द का प्रयोग अधिक होने लगा जिसके बाद उनको कई प्रकार से परिभाषित किया गया।

अमरीका के एक जानेमाने टीकाकार जान कॉलिन्ज़ ने इसको परिभाषित करते हुए लिखा है कि नर्मयुद्ध वह है जिसमें किसी सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत बहुत ही प्रभावी ढंग से शत्रु के वैचारिक केन्द्रों को लक्ष्य बनाया जाता है। अमरीकी सेना के घोषणापत्र के अनुसार नर्म युद्ध का मुख्य उद्देश्य, शत्रु की आस्था, उसके मनोबल और और उसकी भावनाओं को प्रभावित करना है। या फिर किसी देश में मौजूद अपने मित्र और समर्थक गुटों तथा वहां के तटस्थ लोगों को इस प्रकार से तैयार करना कि समय पड़ने पर वे हमारा साथ दें। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नर्मयुद्ध का मुख्य उद्देश्य यह है कि गुप्तचर, कूटनीतिक एवं सांस्कृतिक कार्यवाहियों पर आधारित गोपनीय एवं जटिल योजना के अन्तर्गत अपने दृष्टिगत देश में परिवर्तन कराया जाए। इस आधार पर नर्म युद्ध को मनोवैज्ञानिक युद्ध, सफेद युद्ध, संचार माध्यमों का युद्ध, नर्म क्रांति, नर्म सत्ता परिवर्त, मख़मली क्रांति या रंगीन क्रांति आदि कुछ भी कहा जा सकता है।

नर्म युद्ध में यह प्रयास किया जाता है कि किसी देश के महत्वपूर्ण केन्द्र जैसे वहां की शासन व्यवस्था की वैधता पर ही प्रश्न उठाया जाए और इस प्रकार उस देश की एकता, अखण्डता और सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया जाए। इसका अर्थ है उस देश की जनता में वहां की सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना। जब किसी देश की जनता की दृष्टि में उस देश की सरकार की उपयोगिता को महत्वहीन सिद्ध कर दिया जाएगा तो फिर सरकार के प्रति जन समर्थन कम हो जाएगा और उसको गिराना सरल हो जाएगा।

नर्मयुद्ध या साफ्टवार के अन्तर्गत वास्तव में दो चीज़ों को लक्ष्य बनाया जाता है। एक मन और दूसरा हृदय। इसका उद्देश्य हृदयों को अपनी ओर मोड़ना है। नर्म युद्ध में यह प्रयास किया जाता है कि संबोधक को इस प्रकार से प्रभावित किय जाए कि वह अपनी प्राथमिकताओं को उसी रूप में ढाल ले जैसा सामने वाला पक्ष उससे चाहता है अर्थात सामने वाले की प्राथमिकताओं को वह अपनी प्राथमिकता समझने लगे। इस प्रकार नर्म युद्ध के माध्यम से बिना किसी हिंसक कार्यवाही के समाजों के मूल्यों पर हमला करके अपने आदर्शों को लोगों पर थोपा जाता है। नर्म युद्ध का मुख्य लक्ष्य, किसी देश की जनता के मन में यह भावना उत्पन्न करनी होती है कि वह अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट हो जाए जिसके बाद वे स्वयं सरकार विरोधी कार्यवाहियों में सक्रिय हो सके।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने अपने एक भाषण में नर्म युद्ध की वास्तविकता की ओर संकेत करते हुए कहा था कि नर्म युद्ध का मुख्य लक्ष्य उसकी रणनीति में छिपा हुआ है। उन्होंने कहा कि लोगों के दिल व दिमाग़ में शक पैदा करना, आध्यात्म को मिटाना, अवसरों को धमकियों में बदलना, शासन के स्तंभों को कमज़ोर करना, लोगों के भीतर भ्रांतियां उत्पन्न करना, उनमें एक दूसरे के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना और समाज में मतभेद पैदा करने जैसे काम नर्म युद्ध का लक्ष्य हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि वर्चस्ववादी शक्तियां, नर्म युद्ध के माध्यम से यह प्रयास करती हैं कि सामने वाले पक्ष को अपनी सोच जैसा बना लिया जाए ताकि शासन व्यव्सथा को बदलने के लिए न तो युद्ध की आवश्यकता हो और न ही सीधे हस्तक्षेप की, बल्कि यह लक्ष्य स्वयं वहां की जनता पूरा कर देगी जो उनके दृष्टिगत है।

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नर्म युद्ध और वर्चस्ववाद-2

 नर्म युद्ध का मूल लक्ष्य वही है जो हथियारों के युद्ध का लक्ष्य है अर्थात एक राजनैतिक व्यवस्था को नियंत्रित करना और उसको उखाड़ फेंकना किन्तु सत्ता को उखाड़ फेंकने की यह शैलियां और साधन भिन्न है।

यदि सख़्त जंग या हथियारों वाले युद्ध में धरती पर क़ब्ज़ा कर लिया जाता है किन्तु इसका परिणाम एक राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के रूप में सामने आता है और एक देश का सुरक्षा और प्रतिरक्षा सिस्टम चरमरा जाता है, नर्म युद्ध में यह प्रयास किया जाता है कि एक राष्ट्र की आस्थाओं और उसके मूल्यों को प्रभावित करके एक देश के विचारों और आदर्शों के लिए जो एक राजनैतिक व्यवस्था को पहचान प्रदान करने वाला है, चुनौती खड़ी कर दी जाए।

जब शत्रु अपने लक्ष्य में सफल हो जाए, इस स्थिति में वास्तव में राजनैतिक व्यवस्था से जनता के विश्वास को समाप्त करके तख़्ता पलट की योजना का परिणाम सामने आएगा। इस युद्ध का का मुख्य हथियार नर्म शक्ति विशेषकर उनको विश्वास में लेने और उनको अपने साथ करने की शक्ति है जिसके लिए सामान्य रूप से संपर्क, मीडिया और मनोवैज्ञानिक तकनीक जैसा हथियार प्रयोग करने का प्रयास किया जाता है और समाज की पहचान में शंका पैदा कर दी जाती है। इस युद्ध का रणक्षेत्र, जिस समाज को लक्ष्य बनाना है उसकी विचारधारा, आस्था, विश्वास, मूल्य, रूचियां और रुझहान है जिसके अतिग्रहण के लिए हमलावर ने कार्यक्रम बनाया है और अंततः उस देश के लोगों की बुद्धि और उनके दिल पर क़ब्ज़ा कर लिया जाता है जिसको लक्ष्य बनाया गया है और इस प्रकार से ढांचे में परिवर्तन में सफलता प्राप्त की जा सकती है। दूसरे शब्दों में नर्म युद्ध, माडल को ख़राब करने का युद्ध है। इस युद्ध में हमलावर, एक राजनैतिक व्यवस्था के मूल आधारों और मूल्यों में संदेह पैदा करके, विभिन्न सामाजिक मंचों पर एक व्यवस्था के माडल को अनुपयोगी कर देता है।

विशेषज्ञों ने नर्म युद्ध के विभिन्न आयाम बयान किए हैं किन्तु उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण तीन मंच बयान किए हैं। सांस्कृतिक आयाम, राजनैतिक आयाम और सामाजिक आयाम। उनकी नज़र में राजनैतिक मंच पर नर्म युद्ध की भूमिका अर्थात मौजूद राजनैतिक व्यवस्था के माडल को अनुपयोगी बनाना, एक समाज की सांस्कृतिक पहचान पर सांस्कृतिक हमले करना है। इस आधार पर नर्म युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण युद्ध सांस्कृतिक युद्ध होता है क्योंकि इस युद्ध को छेड़ने वाले समाज के सांस्कृतिक आधारों और शैलियों को निशाना बनाते हैं अर्थात ईश्वरीय केन्द्रियता, दुश्मनों से दुश्मनी, न्याय प्रेम, आत्म विश्वास और मूल विचार अर्थात विदेशियों के बारे में विचार करना, इस बारे में सोचना कि सरकार किस प्रकार की होगी और किस प्रकार के सामाजिक संबंध होने वाले, सभी को परिवर्तित किया जाता है। सांस्कृतिक नर्म युद्ध का परिणाम, संस्कृतिक को तबाह और पहचान को बदल देना है।

राजनैतिक आयाम में नर्म युद्ध छेड़ने वाले, एक समाज की सरकार और उसकी राजनैतिक संस्था के मुक़ाबले में उस समाज के नागरिकों के विचारों, दृष्टिकोणों और प्रतिक्रियाओं को परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं और उन को हड़तालों, प्रदर्शनों और रैलियों जैसे माध्यमों से अपनी आपत्ति दर्ज कराने पर विवश करते हैं। दूसरे शब्दों में नर्म युद्ध के कारक नागरिकों को सरकार के विरुद्ध नागरिक अवज्ञा पर विवश करते हैं। इस प्रक्रिया में लक्षित देश में मौजूद राजनैतिक व्यवस्था के लिए चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। जब नर्म युद्ध आरंभ होता है तो उस समय देश में मौजूद भीतरी विरोधाभास और अधिक उभर कर सामने आते हैं। दूसरे शब्दों में नर्म युद्ध का मुख्य केन्द्र, सामाजिक व राजनैतिक शक्तियों का मार्गदर्शन करना है जो एक दूसरे से वैचारिक, समीक्षात्मक और आडिलोजिक विरोधाभास रखते हैं।

यह शक्तियां टकराव की स्थिति में अपनी दुश्मनी को राजनैतिक सांचे में ढाल देती हैं और इस प्रकार से ढांचे का भीतरी मतभेद भी और अधिक हो जाता है और इसके परिणाम में सरकार का व्यवहार, यहां तक कि सरकार का प्रकार, धीरे धीरे परिवर्तित होने लगता है और मौजूद राजनैतिक माडल की वैधता, लोकप्रियता और उपयोगिता में शंका पैदा हो जाता है। यही कारण है कि कुछ लोग रंगीन क्रांतियों को नर्म राजनैतिक युद्ध की श्रेणी में समझते हैं।

यूक्रेन में घटने वाली घटनाएं इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। बहुत से राजनैतिक टीकाकारों का कहना है कि अमरीका की उप विदेशमंत्री का बयान, अमरीका की ओर से इस देश में नर्म युद्ध को अस्तित्व में लाने की पुष्टि है। उन्होंने सीएनएन से वार्ता करते हुए कहा कि यूक्रेन के कुछ राजनैतिक व सामाजिक धड़ों को वाशिंग्टन ने अरबों डालर की सहायता की स्वीकारोक्ति की थी। उनका कहना था कि उनके देश ने यूक्रेन को 5 अरब डालर की सहायता दी जिसे उन्होंने मज़बूत व लोकतांत्रिक सरकार रखने के लिए यूक्रेन की जनता के समर्थन का नाम दिया। इससे पहले भी यूक्रेन के बारे में इस प्रकार की रिपोर्टें सामने आयी थीं। इन बयानों के आधार पर, यह सहायताएं सोवियत संघ के विघटन के साथ आरंभ हुईं और यह पश्चिम के निकट सामाजिक व राजनैतिक धड़ों को दी जाती थीं । समाचारों के आधार पर नैटों ने पिछले दस वर्ष के दौरान यूक्रेन के सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए बहुत अधिक पैसे ख़र्च किए और यही कारण था कि यूक्रेन की सेना ने कभी भी नैटो के विरुद्ध प्रदर्शन नहीं किया।

नर्म युद्ध का तीसरा आयाम है सामाजिक आयाम। नर्म युद्ध के सामाजिक आयाम में सामाजिक क्रियाकलाप, संपर्क, लेनदेन, संस्कार, आदर सत्कार और सामूहिक व्यवहार इत्यादि शामिल हैं। नर्म युद्ध छेड़ने वाले समाज के लोगों की पहचान पर वर्चस्व जमा कर, सामाजिक एकता , राष्ट्रीय आत्मा, सामाजिक पूंजी, आदर्श व्यवहार और राष्ट्रीय एकजुटता को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार से ऐसी स्थिति में जब सामाजिक व्यवस्था, शक्ति के पतन के साथ पहचान खोने लगती है। स्वभाविक रूप से वह शक्ति जो बिखरी हुई पहचान को व्यवस्थित करता है और सभी से महत्वपूर्ण यह कि वह शक्ति जो समाज की आस्था को एक धागे में बांध दे, पायी ही नहीं जाती और स्वाभाविक रूप से सुरक्षा का विषय जो हर सरकार की विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य होता है, कमज़ोर हो जाता है क्योंकि सामाजिक एकता, सुरक्षा उत्पन्न करने के लिए आवश्यक गुटों की भागीदारी और सहयोग के लिए आवश्यक भूमिका प्रशस्त करती है।

नर्म युद्ध के छेड़ने वाले इस बात के प्रयास में रहते हैं कि वह दीर्घावधि में अपने संबोधकों के व्यवहार और उनके विचारों को प्रभावित कर सके क्योंकि नर्म युद्ध की रणनीति का नियम यह होता है कि लक्षित देश की जनता, दुश्मनों के लक्ष्यों को व्यवहारिक बनाती है और इसके लिए ज़रूरी है कि लोगों के दिलो दिमाग़ पर नियंत्रण किया जाए, क्योंकि जिनका दिल और मन दूसरे के नियंत्रण में रहता है वह अपने शत्रुओं के लक्ष्यों को व्यवहारिक बनाने का काम करता है। नर्म युद्ध के कारक, जनता के इरादे और उद्देश्य को छीन कर उनके साथ मौजूद लोगों को निश्चेत कर देते हैं और उनको विरोधी जनसंख्या में बदल कर उनको नागरिक अवज्ञा के लिए उकसाने का प्रयास करते हैं और इस प्रकार से लोगों में मतभेद के बीज बो जाते हैं। इस स्तर पर नर्म युद्ध जनता द्वारा व्यवस्था की नीतियों का समर्थन करके प्रभावी हो सकता है।

अब यह प्रश्न उठता है कि लोगों को किस प्रकार से अपने नियंत्रण में किया जा है कि वह शत्रुओं के इशारों पर नाचते हैं और उनके लक्ष्य व्यवहारिक करते हैं?

समाजिक मनोचिकत्सकों के अनुसार, यह रास्ता बहुत साधारण और साथ ही बहुत कठिन है। यही कारण है कि नर्म युद्ध को छेड़ने वाले लोगों के दिलो व दिमाग़ को प्रभावित करने के लिए, भावनात्मक व पहचान के क्षेत्र में काम शुरु करते हैं। वह मन पर नियंत्रण करने के लिए संतुष्टि, सोच बदलने, ब्रेन वाशिंग जैसी मनोवैज्ञानिक शैलियों का सहारा लेते हैं ताकि अपने संबोधकों के विचारों, सोच, मन और पहचान की व्यवस्था को प्रभावित कर सके। भावनात्मक उत्साहिक आयाम में लक्ष्य दिल पर नियंत्रण करना तथा विशेष कार्य के लिए लोगों को उकसाना है। नर्म युद्ध के कारक संबोधक की भावनात्मक व्यवस्था और उसके विचारों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।

उदाहरण स्वरूप वह सरकार के संबंध में अपने संबोधकों की घृणा को भड़काना चाहते हैं और उनके प्रेम और उनकी रुचि को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास करते हैं। लोगों के दिलों पर नियंत्रण दो तरीक़े से हो सकता है एक उनको राज़ी करके और दूसरा उनको भड़का कर। लोगों को राज़ी करना, उनके दिलों पर नियंत्रण का कारण बनता है और वह समाज को भड़काने के लिए मानिसक शैलियों का प्रयोग करते हैं।

अबलबत्ता यह बात ध्यान रखना चाहिए कि नर्म युद्ध में केवल देश की जनता को ही निशाना बनाना पर्याप्त नहीं होता बल्कि नेताओं और बुद्धिजीवियों को भी निशाना बनाया जाता है। नर्म युद्ध का यह स्तर, देश का रणनैतिक स्तर है और यह देश के नेताओं तथा बुद्धिजीवियों के राजनैतिक व सामाजिक स्तर की ओर पलटता है, यह स्तर नर्म युद्ध का सबसे सर्वोच्च स्तर समझा जाता है। इस स्तर का मुख्य लक्ष्य, आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवियों की प्रभावी शक्ति को कम और कमज़ोर करना है। इस स्तर पर काम करने वाले जितना अधिक बुद्धिजीवियों के प्रभाव कम करने और उनको अपना बनाने में सफल होते हैं, उनकी सफलता की संभावना उतनी ही अधिक होती है। नर्म युद्ध के इस स्तर पर बुद्धिजीवियों की समझ बूझ को अपने रंग में ढाल कर, बुद्धिजीवियों की पहचान और उनकी सफलताओं पर हाथ साफ़ करते हैं, या उन पर मनोवैज्ञानिक कार्यवाही करके उनके संकल्प को डावांडोल कर दिया जाता है। इस क्षेत्र में नर्म युद्ध के छेड़ने वाले अच्छी समझ बूझ रखते हैं और इस शैली में लक्षित देश के लोगों और बुद्धिजीवियों को मामले पर संतुष्ट किया जाता है और उन्हें विशेष सूचनाएं दी जाती हैं ताकि उनके दिमाग़ पर वर्चस्व की भूमिका प्रशस्त हो।

हालिया दशकों में नर्म युद्ध के छेड़ने वालों के क्रियाकलापों पर नज़र डालने से यह पता चलता है कि यद्यपि नर्म युद्ध की प्रक्रिया, पूर्वी यूरोपीय देशों, मध्य एशिया, काकेशिया और मध्यपूर्व के देशों में भिन्न है किन्तु इन सब में यह विशेषता पायी जाती है कि लोगों की उत्तेजित भावनाओं की प्रक्रिया में सामाजिक गुटों को इनसे जो अपेक्षाएं हैं उनसे लाभ उठाकर यह लोगों को अपनी मनचाही राजनैतिक दिशा में मोड़ दें।